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बराबरी का समाज चाहते थे अंबेडकर

विचार

 

बराबरी का समाज चाहते थे अंबेडकर

रघु ठाकुर


आज इस पर चर्चा महत्वपूर्ण है कि अगर बाबा साहब जिंदा होते तो अपनी मान्यताओं ,विचारों व स्थापनाओं की रक्षा के लिये, उन्हें किन-किन शक्तियों से जूझना पड़ता. मैं समझता हूं कि बाबा साहब को सर्वाधिक निराशा या अंतःसंघर्ष उन लोगों से ही करना पड़ता जिनकी तरक्की व मुक्ति के लिये उन्होंने आजीवन संघर्ष किया.

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वे अपने जीवन के अंतिम दिनों में कहते भी थे कि मुझे सबसे ज्यादा षिकायत उन अपने ही लोगों से है जिन्होंने मेरी बातो को या तो नजर अंदाज किया या फिर मुझे केवल पूजने की प्रतिमा बना दिया है.

अकसर देश या दुनिया में ऐसी धारणा बनी है कि बाबा साहब केवल दलितों के नेता थे या उन्होंने केवल दलित उत्थान के लिये कार्य किया परन्तु यह आंषिक सत्य हैं. निःसंदेह बाबा साहब दलितों के उत्थान व उन्हें बराबरी दिलाने के लिये एक सतत संघर्षशील सेना नायक थे परन्तु उन्होंने समूचे समाज को बराबरी का तथा प्रगतिशील व मानवीय समाज बनाने के लिये अपना जीवन लगा दिया. उन्हें केवल दलितों का नेता या मसीहा कहा जाना उन्हें जाति के अंदर सिकोड़ना होगा.

बाबा साहब ,जिन्हें आमतौर पर संविधान निर्माता या संविधान षिल्पी कहते है,अपने द्वारा प्रस्तुत किये गये संविधान की सीमाओं को बेहतर जानते थे. इसीलिये उन्होंने संविधान पारित होने के तत्काल बाद विधि मंत्री के नाते अपने प्रथम साक्षात्कार में कहा था कि ’’आज हम अंतर्विरोध के एक नये युग में प्रवेश कर रहे हैं जिसमें राजनैतिक समानता तो होगी यानी एक व्यक्ति-एक वोट परन्तु आर्थिक व सामाजिक समानता नहीं होगी.’’

उनका नैराश्य इस सीमा तक पहुॅचा था कि उन्होंने संसद में गृहमंत्री श्री काटजू व अन्य सदस्यों की टीका-टिप्पणी का उत्तर देते हुये कहा था कि ’’श्रीमान मेरे मित्र कहते हैं कि भारत का संविधान मैने बनाया है परन्तु मैं यह बात कहने के लिये तैयार हूं कि मैं ही इसे जलाने वाला प्रथम व्यक्ति होऊॅगा. मैं इसको नही चाहता क्योंकि यह किसी के लिये भी नही है.’’

बाबा साहब ने संविधान की जिन सीमाओं केा उसके पारित होने के कुछ ही दिनों बाद पहचाना था, आज देश उन संवैधानिक समस्याओं से रुबरु हो रहा है. पिछले कुछ वर्षो से देश की सर्वोच्च न्यायपालिका व विधायिका तथा सत्ता के टकराव के जो मामले सामने आ रहे है, वे इसी का घोतक है. संविधान का मूल खंड भी अपने लक्ष्यों में लगभग असफल जैसा हो गया लगता है.

बाबा साहब यह जानते थे कि परिवर्तनशीलता का गुण विकास के लिये जरुरी है. उन्होंने इसीलिये’इमर्सन को उद्वत करते हुये कहा था कि स्थिरता गधे का गुण है. उन्होंने अपने विचारों में भी समय-समय पर बड़े परिवर्तन किये जो उनके अनुभवों पर आधारित थे.

बाबा साहब में भारतीयता गहरे तक थी. उनके दो ही लक्ष्य थे एक भारत महान बने और दूसरा ’’सामाजिक अन्याय समाप्त हो’’ . जो लोग उन पर यह आरोप करते है कि वे भारत की आजादी के पक्ष में नही थे, वे उनका गलत विष्लेषण करते है. वे भारत को आजाद देखना चाहते थे परन्तु उसके पूर्व या साथ में अपनी दलित कौम की भी आजादी चाहते थे.

उनके मन में यह संशय अवश्य रहता था जो कि स्वाभाविक भी था कि कहीं ऐसा न हो कि देश तो आजाद हो जाये परन्तु देश की अनुसूचित जातियॉ ,उच्च जातियों की गुलाम बनी रह जायें. इसीलिये उन्होंने 1938 में बंबई विधानसभा में कहा था कि ’’मुझे अकसर गलत समझा जाता है. इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिये कि मैं अपने देश से प्यार करता हूं लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह बात भी साफ-साफ बता देना चाहता हूं कि मेरी एक और निष्ठा है जिसके लिये मै प्रतिबद्व हूं. यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमें मैने जन्म लिया है और मैं इस सदन में पूरे जोर-षोर से कहना चाहता हूं कि जब कभी देश हित और अस्पृष्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृष्यों के हितेां को तरजीह दूंगा. मेरे अपने हित और देश हित के साथ टकराव होगा तो मै अस्पृष्यों के हितों को तरजीह दूंगा. मेरे अपने हित और देश हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश हित को तरजीह दूंगा.’’

बाबा साहब के मन में भारतीय राष्ट्रवाद बहुत स्पष्ट था. वे भाषावार प्रांतो के विरोध में थे क्योंकि वे महसूस करते थे कि भाषावार प्रांत आगे जाकर किसी दिन क्षेत्रवाद व देश के विभाजन के कारण बन सकते हैं. उनके ही शब्दों में ’’भाषावार प्रांतो में छोटे-छोटे समुदायों अर्थात अल्पसख्ंयक जातियों का क्या भविष्य है?क्या ये विधायिका में चुने जाने की आशा रखें ? क्या उन्हें राज्य सेवा में कोई पद मिलने की आशा है ? उनकी आर्थिक उन्नति के लिये क्या कोई ध्यान देने वाला हैं ?

इन परिस्थितियों में भाषायी प्रांत के गठन का अर्थ होगा स्वराज को किसी एक बहुसंख्यक समुदाय के हाथों सौप देना. जो लोग समस्या के इस पहलू को नहीं समझते या समझना नहीं चाहते वे इसे तभी भली भांति समझेंगे जब हम भाषायी राज्य जैसे शब्द का प्रयोग न कर जाट राज्य,रेड्डी राज्य या मराठा राज्य कहेंगे. जो ऐसे समेकन या एकीकरण की मांग करते है उनसे पूछा जाना चाहिऐ कि क्या वे अन्य राज्यों के साथ युद्व करने जा रहे है ? यदि समेकन से पृथकता का भाव पुष्ट होता है तो आगे चलकर हमारा भारत ठीक उसी स्थिति में पहुंच जायेगा जैसी स्थिति इस देश की मौर्य साम्राज्य के पतन या बिखराव के बाद हुई थी. क्या भाग्य हमें उसी और धकेल रहा है?
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