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गुलदस्ते, जूते और बुश | राम पुनियानी

विचार

 

गुलदस्ते, जूते और बुश

राम पुनियानी


हाल में इराक में एक प्रेस कॉन्फ्रेन्स के दौरान ईराकी पत्रकार मुन्नतदर अल जैदी ने विरोध स्वरूप अपने जूते अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश पर फेंके. अपने हमलावर के इस अपमान से ईराकी जनता को बहुत खुशी हुई. ईराक पर अमरीकी हमले के बाद से ईराक की हालत बहुत खराब हो गई है.


अगर हम कुछ पीछे जावें, तो अमरीका पूरी दुनिया पर अपनी दादागिरी कायम करने के लिए एक के बाद एक देशों पर हमला करता रहा है. सोवियत संघ के पतन के बाद से अमरीका, खाड़ी के देशों के तेल संसाधनों पर कब्जा जमाने के अपने अभियान में जुटा हुआ है. इस अभियान के शिकार खाड़ी क्षेत्र के कई देश हुए हैं. कुवैत पर कब्जा करने के बाद से ईराक, अमरीका के निशाने पर रहा है. इसी ईराक का जब ईरान से युध्द चल रहा था, उस समय अमरीका ईराक का दोस्त था. उसने ईराक की भरपूर मदद की थी. उस दौर में, आयातुल्लाह खोमैनी के साथ जंग करने के अलावा, ईराक के तत्कालीन तानाशाह सद्दाम हुसैन, ईराक में कुर्दों पर भयावह जुल्म भी ढ़ा रहे थे. उस समय ईराक के सभी जुल्म और अन्याय अमरीका को इसलिए मंजूर थे क्योंकि उसके लिए ईरान बड़ा दुश्मन था. कारण यह कि आयातुल्लाह खोमैनी ने अमरीकी पिट्ठू रजा शाह पहलवी का तख्ता पलट दिया था.

 बुश पर फेंके गये जूते, दरअसल, ईराक के गुस्से के प्रतीक हैं. जूते फेंकने वाला पत्रकार देश का हीरो बन गया है. अमरीका का मानना था कि ईराक पर हमले करने पर उसे गुलदस्ते मिलेंगे. गुलदस्तों की जगह उसे जूते मिले हैं. और शायद वह इसी के लायक है

 


ईरान-ईराक युध्द सन् 1988 में खत्म हो गया. और तब अमरीका को लगा कि ईराक द्वारा खड़ी कर ली गई बड़ी और शक्तिशाली सेना, खाड़ी के तेल संसाधनों पर कब्जा करने की उसकी महत्वाकांक्षा के आडे आ रही है. खाड़ी क्षेत्र के अपने दोस्तों, सऊदी अरब और कुवैत के जरिए अमरीका ने तब ईराक के लिए आर्थिक समस्याएं खड़ी करना शुरू कर दी. इससे परेशान होकर ईराक ने कुवैत पर हमला करने का मन बनाया. जब सद्दाम हुसैन ने अमरीकी राजदूत एप्रैल ग्रास्पी को अपने इरादे के बारे में बताया तो उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि ''हमें आपके सीमा विवादों से कोई मतलब नहीं है''. दूसरे शब्दों में, अमरीका ने यह सन्देश दिया कि सद्दाम अपनी योजना को लागू करें, अमरीका उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा.


परन्तु जैसे ही ईराक ने कुवैत पर हमला किया और कुवैत को ईराक का 24वां राज्य घोषित किया, अमरीका इस झगड़े में कूद पड़ा. उसने कहा कि कुवैत के शाह की सार्वभौमिकता पर हमला हुआ है और अमरीका ईराक को सबक सिखायेगा. ईराक ने अपनी सेनांए कुवैत से वापस बुलाने का वायदा किया परन्तु इस वायदे को नजरअंदाज करते हुए अमरीका ने ईराक पर हल्ला बोल दिया. वापस जाने को तैयार ईराकी सेना का रास्ता रोक दिया गया. ईराक पर बमबारी की गई, उसकी बिजली आपूर्ति और सीवेज व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया गया. इस हमले और उसके बाद ईराक पर लगाये गये आर्थिक प्रतिबंधों के कारण लाखों ईराकी नागरिक मारे गये.


न्यूयार्क पर सन् 2001 में हुए आतंकी हमले और उसके बाद अमरीका के अफगानिस्तान पर आक्रमण से फुरसत पाकर अमरीका एक बार फिर दुनिया के तेल भण्ड़ारों पर कब्जा जमाने के अपने पुराने अभियान में जुट गया.


ईराक पर हमला करने के लिए उसने यह बहाना ढूंढा कि ईराक के पास महासंहारक अस्त्र (डब्ल्यू.एम.डी) हैं. संयुक्त राष्ट्र ने ईराक में इन अस्त्रों का पता लगाने के लिए अपने इंस्पेक्टरों का दल भेजा परन्तु ईराक में एक भी डब्ल्यू. एम.डी. नहीं मिला. परन्तु इससे भला अमरीकी साम्राज्यवाद के बढ़ते कदम कहीं रूकने वाले थे. अमरीका ने ईराक पर चढ़ाई करने की तैयारियां शुरू कर दी. डब्ल्यू. एम.डी. के अलावा, यह आरोप भी लगाया गया कि ईराक के अलकायदा से संबंध हैं.

 

यह सभी को पता था कि सद्दाम हुसैन का अलकायदा- जो अमरीका द्वारा ही बनाया गया था- से कोई लेना देना नहीं था. युध्द के बहाने ढूढंने के क्रम में अमरीका ने यह कहना शुरू कर दिया कि ईराकी जनता सद्दाम हुसैन के अत्याचारों से तंग आ चुकी है और सद्दाम से मुक्ति चाहती है. अमरीका के उप राष्ट्रपति डिक चैनी ने तो यह तक कह डाला कि ईराक में अमरीकी सेना का स्वागत मुक्ति सेना की तरह होगा और ईराक की जनता अमरीकी सैनिकों को गुलदस्ते देगी.


बहाने तैयार थे और हमले को मुक्ति अभियान का चोला पहना दिया गया था. अमरीका की हमलावर सेना का ईराक में विरोध हुआ परन्तु अमरीका की सैनिक ताकत के सामने विरोध ज्यादा दिन तक टिक नहीं सका. फिर भी, ईराक पर पूरी तरह कब्जा हो जाने तक छुट-पूट विरोध जारी रहा. अमरीकी सेना ने ईराकी जनता पर भारी जुल्म ढ़ाये और इन जुल्मात के लिए अमरीकी नेताओं को अपनी अर्न्तआत्मा की अदालत में जवाब देना होगा. इस अत्याचार का एक नमूना दुनिया ने अब्बू गरीब जेल में ईराकी सैनिकों को यंत्रणा दिये जाने के चित्रों में देखा था. उन्हें नंगा कर एक के ऊपर एक खड़ा कर पिरामिड बनाने पर मजबूर किया जा रहा था.


वियतनाम में बुरी तरह मुँह की खाने के बाद, अमरीका ने कुछ समय तक अपने सैनिकों को बाहर भेजने से तौबा कर ली थी. इस दौरान ही उसने अफगानिस्तान पर कब्जा जमाने की सोवियत संघ की कोशिश को नाकाम करने के लिए अल कायदा जैसे लड़ाकों के संगठन खडे क़िये थे.

 

पिछले तीन दशकों से, अमरीका ने न केवल कई देशों पर हमले किए वरन् संयुक्त राष्ट्र संघ का भी खुले आम अपमान किया. अमरीका ने संयुक्त राष्ट्र की साख और इज्जत को जो बट्टा लगाया है वह हमारी दुनिया की कई समस्याओं का कारण है. अमरीका ने अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए अपने अभियानों को धर्म का चोला पहनाया, ''सभ्यताओं के टकराव'' के सिध्दांत का निर्माण किया और मुसलमानों और इस्लाम का दानवीकरण किया. इस सबसे विश्व सभ्यता को अकल्पनीय नुकसान हुआ है.


जहां तक अमरीका के इस दावे का सवाल है कि वो जहां भी हस्तक्षेप करता है, वहां प्रजातंत्र लाता है, यह एकदम बकवास है. जिस समय यूरोप के देशों ने तीसरी दुनियां के राष्ट्रों को गुलाम बनाया था, उस समय भी उनका यह दावा था के वे जंगलियों में सभ्यता का प्रकाश फैला रहे हैं. अब, अमरीका ''प्रजातंत्र के निर्यातक'' का मुखौटा पहनकर दुनिया के तेल भण्डारों पर काबिज होने की कोशिश कर रहा है.


यह साफ है न तो प्रजातंत्र और न ही किसी ओर शासन या सामाजिक व्यवस्था का निर्यात किया जा सकता है. अपने अच्छे दिनों में सोवियत संघ भी समाजवाद का निर्यात करने का दावा करता था.

 

भारत को सभ्य बनाने का दावा करने वाले अंग्रेजों ने यहां साम्प्रदायिकता के बीज बोये और ईराक में प्रजातंत्र लाने की घोषणा करने वाले अमरीका ने वहां जातीय, कबीलाई, शिया-सुन्नी और अन्य विवादों को हवा दी, लाखों निर्दोषों को मार डाला और देश को आर्थिक रूप से बर्बाद कर दिया.


बुश पर फेंके गये जूते, दरअसल, ईराक के गुस्से के प्रतीक हैं. जूते फेंकने वाला पत्रकार देश का हीरो बन गया है. अमरीका का मानना था कि ईराक पर हमले करने पर उसे गुलदस्ते मिलेंगे. गुलदस्तों की जगह उसे जूते मिले हैं. और शायद वह इसी के लायक है.

 

01.01.2009, 19.07 (GMT+05:30) पर प्रकाशि

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Sahiram (sahiram@gmail.com) Delhi

 
 आज इसी तरह से जूता चिदम्बरम को मारा गया और मेरा मानना है कि चिदम्बरम भी इसी लायक है
इसी तरह जूता देशद्रोही अरुंधती राय को मारा गया.
इसी तरह जूते चलते रहें
 
   
 

shahnawaz (shahnawazquraishi@yahoo.com) Ranchi

 
 राम पुनियानी जी ने बेबाकी के साथ सच्चाई को बयान किया है. 
   

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