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कालियाचक: तथ्यान्वेषण रिपोर्ट

विचार

 

कालियाचक: तथ्यान्वेषण रिपोर्ट

इरफान इंजीनियर


तुम्हारी रोज़मर्रा की जिंदगी ही तुम्हारा मंदिर और तुम्हारा धर्म है
खलील ज़िब्रान - द प्रोफेट

गत 3 जनवरी 2016 को पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में स्थित कालियाचक पुलिस स्टेशन पर एक भीड़ ने हमला किया. इस घटना की अखबारों में छपी रपटों में बताया गया कि यह मुसलमानों द्वारा किया गया सांप्रदायिक हमला था. पश्चिम बंगाल में भाजपा के एक मात्र विधायक के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल कालियाचक जाना चाहता था परंतु सरकार ने इसकी इजाज़त नहीं दी. चूंकि पश्चिम बंगाल में जल्दी ही विधानसभा चुनाव होने वाले थे इसलिए सभी पार्टियों ने इस घटना का इस्तेमाल अपने लाभ के लिए करने की पूरी कोशिश की.

कालियाचक


तृणमूल कांग्रेस ने कहा कि यह हमला सांप्रदायिक नहीं था. शुरूआत में भाजपा ने हमले को सांप्रदायिक बताया और उसके प्रवक्ताओं और पार्टी की बंगाल इकाई के प्रभारी महासचिव सिद्धार्थ नाथ ने कहा कि मीडिया एक बड़ी घटना को मात्र इसलिए कवरेज नहीं दे रहा है क्योंकि हमलावर मुसलमान थे. उन्होंने कहा कि धर्मनिरपेक्षतावादियों के दोहरे मानदंड हैं. इसके बाद मीडिया ने इस घटना को बढ़ाचढ़ाकर प्रस्तुत करना शुरू कर दिया और एक स्थानीय घटना को राष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित किया गया.

भाजपा को जल्दी ही यह समझ में आ गया कि बंगाल में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से उसे लाभ नहीं होगा क्योंकि वहां मुसलमानों की बड़ी आबादी है. बंगाल के रहवासियों में से लगभग 27 प्रतिशत मुस्लिम हैं. भाजपा ने भी बाद में इस बात से सहमति व्यक्त की कि कालियाचक पुलिस स्टेशन पर हमले के पीछे धार्मिक कारण नहीं थे. परंतु उसने तृणमूल कांग्रेस पर यह आरोप लगाना जारी रखा कि वह अपने ष्वोट बैंक को बचाने और अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण के लिए असामाजिक तत्वों को संरक्षण दे रही है.

आरोपों और प्रत्यारोपों के बीच सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसायटी एंड सेक्युलरिज्म व एएएमआरए की एक संयुक्त टीम ने कालियाचक जाकर स्थिति का अध्ययन करने और उस पर एक रपट तैयार करने का निर्णय लिया. टीम के सदस्यों ने हमले के पीडि़तों प्रत्यक्षदर्शियों अफसरों राजनेताओं व प्रमुख नागरिकों से बात की. टीम ने कालियाचक पुलिस स्टेशन में पदस्थ पुलिसकर्मियों से भी बातचीत करने का प्रयास किया परंतु उन्होंने इंकार कर दिया. जो टीम मालदा और कालियाचक पहुंची उसके सदस्य थे 1. इरफान इंजीनियर निदेशक सीएसएसएसए 2. सुभाप्रतिम राय चौधरीए एएएमआरएए 3. नसीम अख्तर चौधरी एक्शन एड व 4. अनुपम अधिकारी.

पृष्ठभूमि
रेडक्लिफ अवार्ड के अंतर्गत 17 अगस्तए 1947 को अर्थात स्वाधीनता के दो दिन बादए नक्शे पर एक लाईन खींचकर भारत का विभाजन की दिया गया. यह लाईन खून से खींची गई थी और इस विभाजन के पश्चातए मौत का जो नंगा नाच हुआ उसमें हज़ारों निर्दोषों का खून बहा और लाखों लोग अपने ही देश में शरणार्थी हो गए.

मालदा भारत का हिस्सा बन गया परंतु उसका एक अनुभाग नवाबगंज तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के राजशाही जिले में शामिल कर दिया गया. हिंदू और मुस्लिम शरणार्थियों के सीमा के इस पार से उस पार जाने के कारण इलाके का जनसांख्यिकीय परिदृश्य बदल गया. अब उत्तर मालदा में हिंदुओं का बहुमत है और दक्षिण में मुसलमानों का.

सन 2011 की जनगणना के अनुसारए मालदा जिले की आबादी में मुसलमानों का प्रतिशत 51.27 और हिंदुओं का 47.99 है. जिले में कई जनजातियों और भाषायी समूहों के लोग रहते हैं जिनमें खोटा पंजारा पोलिया शेरसबादिया व संथाल शामिल हैं. मालदा में रहने वाले अधिकांश बंगाली मुसलमान सुन्नी हैं और एहलेहदीस समुदाय से वास्ता रखते हैं.

मालदा के बंगाल से सटे ब्लॉक कालियाचक.1 में मुसलमानों का प्रतिशत 90 है जिसमें कई नस्लों व भाषायी समूहों के लोग शामिल हैं. यहां के मुसलमानों में शियाओं और सुन्नियों दोनों की खासी आबादी है.

कालियाचक.1 ब्लॉक की एक अनूठी भौगोलिक स्थिति है. जो नदियां गंगा के मैदान के पूर्वी भाग को सींचती हैं उनके बहाव की गति कम होने के कारण वे बड़ी मात्रा में तलछट निक्षेपित कर देती हैं. नदी किनारे रहने वाले समुदाय अपने जीवनयापन के लिए नदी पर निर्भर रहते हैं. फरक्का बांध बनने के बाद से इन समुदायों का रोज़गार और नदी.आधारित अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई. इसका कारण था बड़े पैमाने पर भूमि का कटाव.

पिछले तीन दशकों में मानिकचौक कालियाचक.1, 2 व 3 और रतुआ ब्लॉकों में करीब साढ़े चार लाख लोग बेघर हो गए. इस तरह कालियाचक की पारंपरिक कृषि.आधारित अर्थव्यवस्था खतरे में है. मोज़मपुर जादूपुर दरियापुर व कालियाचक.1 ब्लॉक के कुछ अन्य गांवों में मिट्टी के कटाव ने कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को लगभग नष्ट कर दिया है. यहां पर पहले कई तरह की सब्जियां धान जूट आदि की खेती होती थी परंतु उपजाऊ मिट्टी की ऊपरी परत बह गई और ज़मीनें रेत का ढेर बनकर रह गईं.

कालियाचक के बेघर और बेरोज़गार हो गए लोगों के पास इसके अलावा कोई रास्ता नहीं था कि वे सीमा पार बांग्लादेश के साथ मवेशियों और ड्रग्स के अवैध व्यापार में अपने लिए काम तलाशें. फैन्सीडिल नामक खांसी की एक दवाई जिसका बांग्लादेश में नशे के लिए इस्तेमाल होता है भारत से तस्करी के रास्ते वहां भेजी जाने वाली प्रमुख वस्तुओं में से एक है. बढ़ती तस्करी ने तस्कर, बीएसएफ, पुलिस, आबकारी विभाग, राजनेताओं के एक गठबंधन को जन्म दिया.

इसे और मजबूत बनाया इस इलाके में अफीम की खेती की शुरूआत ने. हमें बताया गया कि मुआजामपुर शहर में अपराधियों के दो गिरोह सक्रिय हैं. इनमें से एक का नेतृत्व असादुल्ला बिस्बास के हाथों में है और दूसरे का तुहुर बिस्बास के हाथों में. इन दोनों गिरोहों के बीच अक्सर विवाद होते रहते हैं. असादुल्ला बिस्बास एक समय वाम मोर्चे के साथ थे. अब वे टीएमसी से जुड़ गए हैं. जिस रैली के दौरान पुलिस थाने पर हमला हुआ उसमें भाग लेने के लिए मुआजामपुर से बड़ी संख्या में लोग आए थे.

तस्कर.बीएसएफ.पुलिस.आबकारी विभाग.राजनेता का गठबंधन सीमा के दोनों ओर धर्म के राजनीतिकरण को बढ़ावा दे रहा है. शाहबाग आंदोलन के बाद बांग्लादेश में कट्टरपंथियों ने तार्किकतावादियों पर बड़े पैमाने पर हमले किए और उनके कत्ल भी हुए. हिफाज़त.ए.इस्लाम नामक संगठन जिसमें जमात.ए.इस्लामी के नेताओं ने घुसपैठ कर ली है ने बांग्लादेश में तार्किकतावादियों पर हमलों मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. हिफाज़त.ए.इस्लाम बांग्लादेशी राष्ट्रीय पहचान का इस्लामीकरण करना चाहती है.

दूसरी ओर नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पश्चिम बंगाल में हिंदुत्ववादी शक्तियां आक्रामक हो उठीं. चुनाव के पहले भाजपा की आमसभाओं में तीन मुद्दों पर ज़ोर दिया गया. एक.गुजरात का विकास का मॉडल;जिसका खोखलापन उजागर हो चुका है दो.शारदा चिटफंड घोटाला व तीन.सांप्रदायिक ध्रुवीकरण जिसे करने के लिए यह प्रचार किया गया कि बंगाल की मुख्यमंत्री ममता दीदी मुसलमानों को प्रसन्न करने के लिए बांग्लादेशी आंतकवादियों को शरण दे रही हैं.
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