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दलबदल कानून में सुधार हो

विचार

 

दलबदल कानून में सुधार हो

रघु ठाकुर


आगामी 5 राज्यों में विधान सभा के चुनाव, केन्द्र की मोदी सरकार के लिए तीसरी परीक्षा की चुनौतियॉं हैं. पहली चुनौती दिल्ली विधान सभा का चुनाव की थी, जिसकी पराजय के बाद दूसरी चुनौती बिहार विधानसभा के चुनाव को लेकर थी, इसमें भी असफलता के बाद, अब तीसरी चुनौती पश्चिम बंगाल,केरल,तमिलनाडू,असम, पांडुचेरी आदि राज्यों की है. यह चुनाव एक प्रकार से देश में मोदी सरकार के बारे में जनमत संग्रह जैसे होगें तथा देश के लगभग 20 करोड मतदाताओं की राय की अभिव्यक्ति होगें..

दल बदल


इन चुनावों को जीतने के लिए मोदी सरकार ने जो समिति बनाई है वह कितनी कारगर होगी कहना कठिन है. परन्तु राजनीति की एक गलत परम्परा को बढाने का प्रयास और इसके तहत दल बदल के माध्यम से विरोधी सरकारों को गिराने का खेल शुरु किया गया है.

अरुणाचल एक छोटा प्रदेश है तथा वहॉं जिस प्रकार से सरकार को बहुमत से अल्पमत में बदला गया वह घोर अनैतिकता का खेल है. बडी संख्या में विधायकों को दल बदल के लिए प्रोत्साहित किया गया और राजभवन का इस्तेमाल पार्टी कार्यालय जैसा हो गया. यहॉं तक की सर्वोच्च न्यायालय की दखल को भी असफल करने का षडयंत्र हुआ

लगभग उसी तर्ज पर अब उत्तराखंड में खेल शुरु हुआ है और कांग्रेस की हरीश रावत सरकार को अल्पमत में बदलने के हथकंडे चले जा रहे हैं. विधायकों की हालत पंचायतों के चुनाव जैसी हुई है तथा जिन लोगों ने कांग्रेस से इस्तीफा दिया है उन लोगों को हरियाणा के गुडगांव में रखा गया है. इस आशय की सुचनाऐं मीडिया से मिल रही हैं कांग्रेस कि सरकार ने भी अपने विधायकों को भाजपा की तोडफोड से बचाने के लिए जिम कारवेट पार्क में सुरक्षित रखा है.

दलबदल का यह खेल भारतीय राजनीति में कोई पहली बार शुरु नहीं हुआ बल्कि इस की शुरुआत तो भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु के कार्यकाल में शुरु हो गयी थी. जब उन्होंने केरल की सोशलिस्ट पार्टी सरकार में दलबदल कराकर कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई थी, और उसके बाद अपने राजनैतिक हितों की पूर्ति के लिए तोडफोड और दलबदल कराकर सरकारें बनाना एक आम खेल हो गया.

1980 में स्व. देवीलाल को हटाने के लिए भजनलाल जो तत्कालीन जनता पार्टी के मुख्यमंत्री थे समूची सरकार के साथ दलबदल कर कांग्रेस में षामिल हो गये थे, और विधानसभा चुनाव के बाद अल्पमत में होने के वावजूद भी तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने उनकी बतौर मुख्यमंत्री शपथ करवाई थी.

आयाराम-गयाराम का जुमला हरियाणा से शुरु हुआ था जहॉं पर एक ही दिन में एक विधायक तीन-तीन बार दल बदल कर लेता था. कांग्रेस सरकार के जमाने में ही श्री षंकर सिह बघेला जो मूलतः संघ के ही थे दलबदल कर सरकार गिराने को आगे आये थे और उन्हें म.प्र. के खजुराहो में विधायकों सहित ठहराया गया था. कहा जाता है कि इस दलबदल के साधन और विमान आदि उस जमाने में मुकेश अंबानी ने उपलब्ध कराये थे.

कुल मिलाकर कांग्रेस और भाजपा दोनों ही समय-समय पर अपने राजनैतिक हितों को कायम रखने या हितों की पूर्ति के लिए दलबदल का खेल करते रहे हैं. और इस हथियार का प्रयोग अपने विरोधियों के विरुद्व करते रहे हैं. आज उसी हथियार से भाजपा उसे घायल कर रही है.

दलबदल फिर एक बार देश में आम चर्चा का विषय है दल बदल को रोकने के लिए भी राजनैतिक चिंतक लोग समय समय पर पहल व प्रयास करते रहे हैं. लोकनायक जयप्रकाश की अध्यक्षता में आजादी के बाद पहली कमेटी का गठन हुआ था और इस कमेटी ने अपनी सिफारिश में निम्न बिन्दु रखे थे:-
1. दल बदल करने वाले की सदस्यता समाप्त हो.
2. दल बदल कराने वाले दल को भी अपराधी माना जाए और उसकी मान्यता समाप्त हो.
3. दल बदल करने वाले को पॉंच वर्षों में से शेष बची अवधि तक कोई भी लाभ का पद न दिया जाए.

जयप्रकाश कमेटी की रपट को उस समय की सरकार ने स्वीकार नही किया था. हालांकि आपातकाल के बाद 1977 में बनी जनता पार्टी ने भी जो जयप्रकाश जी के मार्गदर्षन और नेतृत्व में बनी थी ने भी दलबदल के हथकंडे का प्रयोग किया था. श्री शरद पवार जो कांग्रेस पार्टी के विधायक चुने गये थे अपने साथ विधायकों के समूह को तोडकर जनता पार्टी के साथ आये थे और महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार को गिराकर उन्होंने सरकार बनाई थी.

इसके 10 वर्ष पूर्व भी म.प्र. में उस समय के प्रतिपक्ष दलों ने इस दलबदल के तरीके को अपनाया था तथा डी.पी. मिश्र के मुख्यमंत्री के मुख्यमंत्रित्व वाली सरकार से असंतुष्ठ विधायकों का एक समूह स्व. गोविन्द नारायण सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस से बाहर आया था और तत्कालीन जनसंघ और समाजवादी पार्टी ने उनसे मिलकर म.प्र. में सरकार बनायी थी.

कहने का तात्पर्य यह है कि लगभग सभी दल समय समय पर दल बदल के हथियार का प्रयोग करते रहे हैं फर्क केवल इतना है कि जब जिसकी सरकार गिरती है वह दल बदल की निंदा करता है और जब उसी पार्टी को दल बदल कराने का अवसर मिलता है तो वह अपने पुराने दुःख भूलकर उसी अनैतिक हथियार का इस्तेमाल करता है.

अब तो देश का मतदाता भी दलीय विचार निष्ठाओं के बजाए समूह निष्ठा में बदल गया है और उसे कोई दल बदल मुददा नहीं लगता है. अगर षंकर सिंह वघेला जो संघ के निष्ठावान सेवक थे दलबदल कर कांग्रेस के साथ आते हैं तो अल्पसंख्यक मतदाताओं को उन्हें धर्मनिरपेक्ष मानने में और वोट देने में कोई परहेज नही है और इसी प्रकार अगर कांग्रेस का नेता भाजपा समूह के साथ जाता है तो भाजपा के हिन्दु मानस के मतदाताओं को उसे वोट देने में कोई गुरेज नही है.

दलबदल विरोधी कानून को दलबदल की संभावित आकांक्षा से ग्रस्त होकर 1978 में श्री मुरारजी भाई की सरकार संसद प्रस्ताव में लाई थी. परन्तु जिन दलों के समर्थन के दावे का प्रस्ताव कानून की प्रस्तावना में किया गया था उन्हीं दलों के मुखिया ने संसद में अपनी असहमति व्यक्त की तथा प्रस्ताव विधिवत पेश नही हो सका.

1984 के लोकसभा चुनाव के बाद यद्यपि श्री राजीव गांधी के पास संसद में तीन चौथाई बहुमत था पर स्व. राजीव गांधी सरकार ने दलबदल कानून संसद में पेश किया था, और पारित कराया था.

इस कानून में यह प्रावधान किया गया था, कि अगर किसी दल के एक तिहाई सदस्य एकमुष्त दल छोडते हैं तो उसे दल बदल नही बल्कि दल का मत माना जायेगा और उनकी विधायकी सदस्यता बरकरार रहेगी, परन्तु अगर इससे कम संख्या के लोग दल छोडते हैं तो उसे दल बदल माना जाएगा तथा उनकी सदस्यता समाप्त की जायेगी. इस कानून में निम्न त्रुटियां थी:-

1. थोक दल बदल को वैधानिक अनुमति थी और व्यैक्तिक दलबदल को अपराध बताया गया था.
2. दलबदल के सम्बध में उसके उद्देष्य को निर्धारित करने के लिए कोई प्रावधान नही था.
3. व्यक्ति की आजादी और नीतिगत नैतिक मतभेद भी एक व्यक्ति को केवल संख्यात्मक कमी के कारण दलबदल का अपराधी बना देते थे. यह एक प्रकार से व्यक्तिगत आजादी और वैचारिक कारणों की हत्या करने वाला प्रावधान था. मसलन अगर कोई सरकार अपने घोषणा पत्र के विपरीत देश में जम्मूरियत या धर्म निरपेक्षता या ऐसा ही कोई संविधानिक मूल्य खत्म करने का प्रयास करे तो उस दल के सदस्य को उसका विरोध करने या दल के खिलाफ मतदान करने का अधिकार समाप्त हो गया.

4. इस कानून में दलबदल के संबंध में निर्णय करने का अधिकार विधानसभा अध्यक्षों को दिया गया था, और चूंकि विधान सभा अध्यक्ष एक दल विषेष के सदस्य होते हैं तथा उन्हें अपने दल व अपने आप को या अपने परिजनों को टिकिट या पद चाहिए होते हैं अतः वे निष्पक्ष नहीं रह पाते हैं.

अपवाद हो सकते हैं परन्तु आमतौर पर यही है इसीलिए कुछ देशों में यह संवैधानिक नियम बनाये गये है कि विधायिका का अध्यक्ष चुने जाने के बाद स्पीकर अपने दल से त्यागपत्र देता है तथा आगामी चुनाव में वह सभी दलों का समर्थन वाला उम्मीदवार होता है परन्तु भारत के कानून में निष्पक्षता की अपेक्षा राजनैतिक कुबार्नी की कीमत पर की गई है और इसलिए यहॉं स्पीकर अपनी दलीय प्रतिबधताओं से अरुणाचल और उत्तराखण्ड में भी इन प्रावधानों की कमियों का वखूबी इस्तेमाल हो रहा है तथा दलबदल सत्ता परिर्वतन और सत्ता हथियाने का खेल बन गया है.

मेरी राय में देश में अब दलबदल विरोधी कानून को पुनः प्रस्तावित करने की आवष्यकता है जिसके बिन्दु निम्न अनुसार हो सकते हैं:-

1. यदि कोई दल अपने घोषित कार्यक्रम का क्रियावयन न करे या उसके खिलाफ काम करे या संविधान के प्रावधानों के खिलाफ निर्णय करने का प्रयास करें तो उस दल की सरकार के विरुद्व मतदान या दल त्याग को दलबदल माना जाए ऐसी परिस्थियों में व्यक्ति के अंतर आत्मा को स्वतंत्र रहने का अधिकार हो.
2. यदि सरकार को गिराने, बचाने, पद लाभ पाने के लिए कोई दलबदल करता है या निर्वाचित जनप्रतिनिधि दलबदल करता है तो उसकी सदस्यता समाप्त होना चाहिए. विधायिका की कम से कम बकाया अवधि तक तो उसे कोई भी लाभ का पद नही दिया जाना चाहिए, तथा दल बदल कराने वाले राजनैतिक दल की मान्यता समाप्त किया जाना चाहिए.
3. चुनाव घोषणा के 3 माह पूर्व तक अगर कोई व्यक्ति दल बदल करता है तो उसके प्रत्याषी बनने पर रोक लगाना चाहिए.
4. मतदाताओं को भी अब इस राजनैतिक बीमारी को जो लोकतंत्र के लिए कैंसर जैसी बन गई है को समाप्त करने के लिए दृढप्रतिज्ञ होना होगा और यह निश्चित करना होगा, कि दलबदल वाले को वोट नहीं देंगे.

अपनी बात को समाप्त करते हुए मैं भाजपा से कहना चाहूंगा कि वह पुरानी अपदस्थ सरकारों के अनैतिक तरीकों की नकल करना बंद करे. जिस कांग्रेस ने 1950 के दशक में दल बदल की शुरुआत की थी आज अपने ही हथियार से घायल हो रही है और अभी भाजपा ने भी यही हथकंडे अपनाये तो भविष्य में उन्हें भी इसी का शिकार होना पडेगा. राजनीति को नैतिक मूल्यों के आधार पर पुनः स्थापित करने का प्रयास करें. सरकारें आती जाती रहती हैं परन्तु सामाजिक और नैतिक मूल्य ही स्थायी होते हैं.

28.04.2016 22.30 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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