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विश्वविद्यालय देशभक्ति प्रदर्शन के लिए नहीं

विचार

 

विश्वविद्यालय देशभक्ति प्रदर्शन के लिए नहीं

राम पुनियानी


शिक्षण संस्थाओं में देशभक्ति का भाव जगाने की बात, वर्तमान सरकार के सत्तासीन होने (मई 2014) के तुरंत बाद शुरू हो गई थी. सरकार द्वारा प्रतिष्ठित राष्ट्रीय शैक्षणिक संस्थानों में अनुचित हस्तक्षेप की कई घटनाएं एक के बाद एक हुईं. आईआईटी मद्रास में ‘पेरियार-अंबेडकर स्टडी सर्किल‘ पर प्रतिबंध लगाया गया.
 

कन्हैया कुमार

मकेंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय की दादागिरी से त्रस्त होकर आईआईटी, बाम्बे के निदेशक प्रोफेसर शेवगांवकर ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. इसी तरह के अनाधिकार हस्तक्षेप से परेशान होकर आईआईटी, बाम्बे के शासी निकाय के अध्यक्ष प्रोफेसर अनिल काकोड़कर ने भी अपना त्यागपत्र दे दिया था.

फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, पुणे का मामला भी लंबे समय तक सुर्खियों में रहा. यहां के विद्यार्थी आरएसएस-भाजपा की विचारधारा में यकीन रखने वाले बी ग्रेड फिल्म कलाकार गजेन्द्र चौहान की संस्थान के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति का विरोध कर रहे थे. विद्यार्थियों ने आठ महीने तक हड़ताल की परंतु जब सरकार अड़ी रही और उसने उनकी मांग पर विचार तक करने से साफ इंकार कर दिया, तब, मजबूर होकर विद्यार्थियों ने अपना आंदोलन वापस ले लिया. इलाहाबाद विश्वविद्यालय और पुणे के फरग्यूसन कॉलेज में भी इसी तरह का घटनाक्रम हुआ.

हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय (एचसीयू) व जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के घटनाक्रम ने देश के विद्यार्थी समुदाय को गहरा धक्का पहुंचाया. इन दोनों मामलों में केंद्र सरकार, सत्ताधारी भाजपा और संघ परिवार के उसके साथियों ने राष्ट्रवाद और देशभक्ति के नारे उछाल कर इन दोनों विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों को बदनाम करने का कुत्सित अभियान चलाया.

एबीव्हीपी की एचसीयू शाखा के कहने पर स्थानीय भाजपा सांसद ने केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री को लिखित में यह शिकायत की कि विश्वविद्यालय परिसर में राष्ट्रविरोधी व जातिवादी गतिविधियां संचालित की जा रही हैं और कहा कि इन पर रोक लगाने के लिए अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन (एएसए) के खिलाफ कार्यवाही की जानी चाहिए. एबीव्हीपी ने अपने राजनैतिक एजेंडे के अनुरूप, एएसए द्वारा विश्वविद्यालय में आयोजित कई कार्यक्रमों का विरोध किया था. इनमें शामिल थे उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर में हुई सांप्रदायिक हिंसा पर बनी फिल्म ‘‘मुजफ्फरनगर बाकी है’’ का प्रदर्शन’ और ‘‘बीफ उत्सव’’ का आयोजन.

रोहित वेम्यूला ने अपनी फेसबुक वाल पर लिखा कि उन्होंने इस उत्सव में इसलिए भागीदारी की क्योंकि वे उन लोगों से अपनी एकजुटता दिखाना चाहते थे, जो बीफ का सेवन करते हैं. एएसए ने अफज़ल गुरू को मौत की सज़ा दिए जाने का भी विरोध किया. एएसए का तर्क यह था कि मौत की सज़ा अमानवीय है और किसी भी सभ्य समाज में इसके लिए कोई स्थान नहीं है.

इसके बाद, मंत्रालय के दबाव में, कुलपति ने वेम्यूला को छात्रावास से निष्कासित कर दिया और उनकी शिष्यवृत्ति बंद कर दी. इसी ने उन्हें आत्महत्या की ओर धकेला. जेएनयू के मामले में सुनियोजित तरीके से देशभक्ति का मुद्दा उठाया गया. जेएनयू छात्रसंघ द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में कुछ नकाबपोशों ने जबरन प्रवेश कर भारत-विरोधी नारे लगाए. कन्हैया कुमार और उनके दो साथी नारे लगाने वालों में शामिल नहीं थे. यह दिलचस्प है कि पुलिस अब तक उन लोगों का पता नहीं लगा पाई है जिन्होंने ये निंदनीय नारे लगाए थे.

उलटे, पुलिस ने कन्हैया कुमार, अनिरबान भट्टाचार्य और उमर खालिद को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. कुछ टीवी चैनलों में एक ऐसा वीडियो बार-बार दिखाया गया जो नकली था. बाद में यह स्पष्ट हो गया कि जिन छात्र नेताओं को गिरफ्तार किया गया था, उनका भारत-विरोधी नारेबाजी से कोई लेनादेना नहीं था. जिस कार्यक्रम में ये नारे लगाए गए थे, वह अफज़ल गुरू की बरसी पर आयोजित किया गया था.

इस मसले पर भाजपा के दोगलेपन के बारे में जितना कहा जाए, उतना कम है. भाजपा ने काफी प्रयास कर कश्मीर में पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बनाई है. पीडीपी, अफज़ल गुरू को शहीद मानती है और यह भी मानती है कि उसके साथ न्याय नहीं हुआ. यह स्पष्ट है कि भाजपा, जेएनयू मामले को एक भावनात्मक रंग देने पर आमादा है.
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