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स्मार्ट सिटी से ग्राम उदय तक

विचार

 

स्मार्ट सिटी से ग्राम उदय तक

रघु ठाकुर


केन्द्र सरकार में पहुंचने के बाद प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अपने पहले बजट में देश में 100 स्मार्ट सिटी बनाने का लक्ष्य रखा था और केन्द्र सरकार की तरफ से तथा राज्य सरकारों की तरफ से लगातार एक वर्ष स्मार्ट सिटी को लेकर काफी कवायत, प्रश्न-उत्तर और जनसंवाद तथा परीक्षाओं का आयोजन होता रहा है. जगह-जगह पर केन्द्रीय मंत्री से लेकर केन्द्रीय सचिवों के दौरे होते रहे और कई महीनों की मसकत के बाद कुछ स्थानों के चयन की घोषणा हुई.
 

स्मार्ट विलेज

भले ही भारत सरकार ने यह घोषणा की हो कि स्मार्ट सिटी के चयनित स्थानों को विकास के लिये 100 करोड़ रुपये अतिरिक्त दिये जायेंगे, परन्तु इस 100 करोड़ की राशि के लिये जो आपाधापी मची वह हमारे सामाजिक चरित्र की द्योतक है. जिन शहरों का नाम स्मार्ट सिटी के लिये चयनित हुआ वहॉ जश्न और स्वागत सत्कारों के बेन्ड-बाजे बजने लगे और जिन शहरों के नाम नही आ सके वहॉ के राजनेता ऐसे हताश हो गये जैसे आम तौर पर विधवा भी नही होती.

स्मार्ट सिटी को लेकर भी विचित्र स्थितियॉ है, क्योकि स्मार्ट सिटी शहर के किस हिस्से में बनेगी, उसका क्या होगा, उसका स्वरुप क्या होगा, प्रश्न यथावत है. स्मार्ट सिटी नई बनेगी या पुराने को ही स्मार्ट बनाया जायेगा यह भी अस्पष्ट है. स्मार्ट सिटी के बारे में अपनी-अपनी कल्पना और व्याखाऐं है. प्रधानमंत्री ने कहा कि स्मार्ट सिटी के लिये स्मार्ट लोग होना चाहिये, अब इस स्मार्ट की व्याख्या कौन करें. मंत्री ने कहा कि स्मार्ट सिटी के लिये कुछ आधार बनाये गये है, जैसे उस नगर निगम क्षेत्र में करों की वसूली आदि.

जब स्मार्ट सिटी की घोषणा हुई थी तब भी भारत सरकार ने यह स्पष्ट नही किया कि कोई नये शहर बनेंगे या पुराने को ही बदला जायेगा,पर बाद में जानकारी मिल रही है कि भोपाल और भोपाल जैसे अन्य शहरों के ही कुछ हिस्सों को स्मार्ट सिटी में बदला जायेगा. इनका स्थानीय लोेगों के द्वारा विरोध भी हो रहा है क्योंकि इस नवीनीकरण प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर वृक्षों की कटाई सम्भावित है और आबादी को नये निर्माण के लिये पुनः बसावट की भी जरुरत होगी. बहरहाल स्मार्ट सिटी की कल्पना छः अंधों और एक हाथी की कहानी बन गई, जिसमें हर अंधा हाथी के जिस अंग को छूता है वैसा ही हाथी को मानता है.

मोटे तौर पर देश में स्मार्ट सिटी की कल्पना का विरोध ही हुआ है. देश के शहर अभी सिंगापुर या टोकियो बन जायेगे यह कल्पना लोगों के समझ के परे है, और इस पर लोगों को विष्वास भी नही हैं. दूसरा पक्ष कि 100 स्मार्ट सिटी मुश्किल से देश की चार-पॉच करोड़ आबादी का प्रतिनिधित्व करेगी, पर देश के 125 करोड़ की आबादी का अधिकांश हिस्सा तो आज भी सात लाख गॉवो में बसता है.

गांधी जी कहते थे कि देश का विकास का मतलब गॉव का विकास और अगर सरकार 7 लाख गांव की कीमत पर 100 शहरों के विकसित टापू खड़े करे तो यह कोई देश का विकास नही होेगा. बीते दो वर्षो में स्मार्ट सिटी की चर्चा के स्वर कुछ मंद पड़ गये है, और इस प्रश्न का भी सरकार कोई ठोस उत्तर नही दे पाई कि अभी सड़क, पानी, बिजली, की व्यवस्था पहले से जो है, तो फिर स्मार्ट सिटी बनाने के नाम पर सरकार क्या करेगी? इस घोषणा का सरकार को लाभ हुआ है, कि बगैर कुछ करे सरकार कुछ करती नजर आने लगी है.

भारी-भारी विज्ञापनों, समाचारों ने भी यह मिथ्या भाव पैदा करने में योगदान किया है. यदि विकास का मतलब अमीरी के टापू खड़े करना है तो यह क्षेत्रीय न्याय के सिद्वातों के प्रतिकूल है और न्याय के भी सिद्वांत के. होना तो यह चाहिये कि सरकार पहले उन अविकसित क्षेत्रों का विकास सरकार करे जो आजादी के 68 वर्षों के बाद भी विकास की उम्मीद में बैठे है.

आजकल विकास के ढ़ॉचे की कल्पना विषमता और सरकारी खजानों की लूट पर टिकी है. पिछले दिनों जो नये प्रदेशों का गठन हुआ है वहॉ नई राजधानियॉ बन रही है और उनके निर्माण के लिये सैकड़ों गॉवो की जमीन अधिग्रहण करके उन्हें हटाया जाता है. इसमें न केवल सरकारों की तरफ से धनराशि खर्चे की जाती है, बल्कि कर्ज लेकर भी उनके निर्माण पर पैसा खर्च होता है.
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