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सूखा पीड़ितों के प्रति संवेदना जरूरी

विचार

 

सूखा पीड़ितों के प्रति संवेदना जरूरी

देविंदर शर्मा


एक समय जब पूरा देश खाद्य संकट से जूझ रहा था, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने देशवासियों से सोमवार को उपवास करने का आग्रह किया था. वह 1965 का साल था, जब सूखा पड़ा था और तब भारत खाद्यान्न आयात पर निर्भर था. तब देश में हर आदमी भूखा नहीं सोता था, पर उपवास के लिए शास्त्री जी का आह्वान मुख्यतः लाखों भूखे लोगों के प्रति एकजुटता की अभिव्यक्ति था. 

सूखा


मुझे नहीं लगता कि उपवास से जितना खाद्यान्न बचाया गया, वह आबादी के एक छोटे-से हिस्से को भी खिलाने के लिए पर्याप्त था, लेकिन उसमें अंतर्निहित संदेश स्पष्ट था-राष्ट्र को अपने लोगों की परवाह थी और वह एक दिन का भोजन छोड़ने के लिए भी तैयार था, ताकि उसे भूखे लोगों के साथ साझा किया जा सके.

पचास वर्ष बाद बॉम्बे हाई कोर्ट को यह निर्देश देने की जरूरत पड़ी कि जल संकट से जूझ रहे लोगों के हित में आईपीएल के तेरह मैचों को सूखाग्रस्त महाराष्ट्र से बाहर आयोजित किया जाए. हाई कोर्ट निश्चित रूप से जानता था कि क्रिकेट पिच पर इस्तेमाल होने वाला पानी बचाकर जल संकट से जूझ रहे शहरों में से लातूर जैसे एक शहर की जरूरत भी पूरी नहीं की जा सकती, पर इस निर्देश का उद्देश्य मुख्य रूप से सरकार को एक सख्त संदेश देना था कि वह 'लोगों की दुर्दशा की अनदेखी नहीं कर सकती.'

इसके बाद मुंबई के होटल एवं रेस्तरां एसोसिएशन ने भी घोषणा की कि वह अपने ग्राहकों से अपील करेगा कि वे जब रेस्तरां में आएं, तो यह अपेक्षा न करें कि उन्हें जरूरत से ज्यादा पानी दिया जाएगा. इससे यह सुनिश्चित होगा कि वे आधा गिलास पानी छोड़कर नहीं उठें. इस कदम से भी सूखाग्रस्त महाराष्ट्र के लोगों की प्यास नहीं बुझेगी, पर यह साथी नागरिकों द्वारा झेले जा रहे मुश्किलों के प्रति संवेदनशीलता दर्शाती है.

जरूरी है कि सर्वोच्च न्यायालय सूखाग्रस्त इलाकों में रहने वाले लोगों की समस्याओं और दुर्दशा के प्रति सरकार को जगाकर दिखाए कि प्रशासन कितना संवेदनहीन बन गया है. एक अनुमान के मुताबिक, 70 करोड़ लोग गंभीर सूखे की चपेट में हैं, लेकिन सरकार और मुख्यधारा के मीडिया का एक हिस्सा इस गंभीर संकट से बेखबर था. दस राज्यों की बड़ी आबादी सूखे की चपेट में है. लगातार सूखे की मार से फसलें सूख गई हैं, किसानों ने पहले अपने पशुओं को त्यागा, फिर संकट बढ़ने पर पलायन के लिए मजबूर हुए.

महाराष्ट्र के मराठवाड़ा समेत कई क्षेत्रों में लगातार तीसरे वर्ष सूखा पड़ा है. महाराष्ट्र ने अपने कुल करीब 43,000 गांवों में से 14,708 गांवों को विगत अक्तूबर में ही सूखाग्रस्त घोषित किया था, जबकि कर्नाटक के 30 में से 27 जिलों के 127 ताल्लुका में विगत सितंबर में सूखा घोषित किया गया था. आंध्र प्रदेश के 196 मंडलों में सूखा घोषित किया गया है. पिछले छह वर्षों में झारखंड का पलामू जिला लगातार पांचवें वर्ष सूखे का सामना कर रहा है.

बुंदेलखंड में भी यही स्थिति है. सूखे की चपेट में आए लोगों के चेहरे दुर्दशा की कहानी खुद बयां कर रहे हैं. कम से कम पिछले चार वर्षों से बुंदेलखंड से सूखे की खबरें आ रही हैं. जब सूखे का दबाव पड़ता है, तो इसकी मार सबसे पहले पशुओं पर पड़ती है. महिलाएं पशुओं के माथे पर तिलक कर, उनका पैर छूकर उन्हें खुला छोड़ देती हैं. उसके बाद जब सूखे की स्थिति और भयानक होती है, तो पेयजल के स्रोत सूख जाते हैं. लोग अपना ज्यादातर समय मटका भर पानी इकट्ठा करने में बिताते हैं. और जब फसलें सूख जाती हैं, तो किसानों के सामने पलायन ही एकमात्र विकल्प बचता है.

महाराष्ट्र के लातूर में, जहां टैंकरों से पानी की आपूर्ति होती है, धारा 144 लागू करने की खबर यही दर्शाती है कि पेयजल की कमी से कैसी भयावह स्थिति उत्पन्न हो गई है. कपड़े धोने, स्नान जैसी रोजमर्रा की जरूरत के लिए पानी उपलब्ध न होने से लोगों की मुश्किलें भयावह हो गई हैं.

शहरों में रहने वाले लोगों को, जिन्हें नल खोलते ही पानी मिल जाता है और अपनी इच्छा से रेफ्रीजरेटर से ठंडा पानी निकालकर पी सकते हैं, नहीं मालूम कि जब दिन भर पानी नहीं मिलता, तो जीवन कितना कठिन हो जाता है! हाल ही में मैं बुंदेलखंड में एक किसान के घर गया था. मैंने जब स्नान करने की इच्छा जताई, तो परिवार की एक महिला ने बड़ी विनम्रतापूर्वक कहा, आप चाहें तो एक और लड्डू खा लें, लेकिन स्नान के लिए न कहें.

पिछले कुछ महीनों में ज्यादातर सूखाग्रस्त राज्यों का दौरा करने के बाद वहां की असमानता को देखकर मैं चकित हूं. कर्नाटक की राजधानी में गंभीर सूखे का कोई संकेत नहीं है, जबकि राज्य के 80 फीसदी से ज्यादा इलाके सूखे से प्रभावित हैं. इसी तरह मुंबई से गुजरते हुए गंभीर जल संकट का थोड़ा-सा भी आभास आपको नहीं होगा, जिससे पिछले दो वर्षों से राज्य जूझ रहा है.

मौजूदा गंभीर संकट के समय राष्ट्र को उस बड़ी आबादी के साथ एकजुट खड़ा होना चाहिए, जो एक-एक बूंद पानी के लिए तरस रही है. मुंबई की रेस्तराओं की तरह मैं उम्मीद करता हूं कि पांच सितारा समेत सभी होटल पानी की खपत को घटाने के लिए तत्काल उपायों की घोषणा करेंगे.

कम से कम वे अपने ग्राहकों को स्नान के लिए बाथटब का इस्तेमाल बंद कर केवल शॉवर का उपयोग करने के लिए तो कह ही सकते हैं. संकट की अवधि तक स्विमिंग पूलों को भी बंद रखना चाहिए. कारों की धुलाई और बगीचों की सिंचाई पर भी प्रतिबंध लगना चाहिए. जल संरक्षण के लिए स्कूल-कॉलेजों और सरकारी प्रतिष्ठानों को भी कदम उठाने की जरूरत है. सूखा प्राकृतिक आपदा है और राष्ट्र को इससे प्रभावित लोगों के साथ खड़ा होना चाहिए.

पानी का बेजा इस्तेमाल किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए. लेकिन मैं हैरान हूं कि आज अगर लालबहादुर शास्त्री जीवित होते, तो क्या वह संवेदनशून्य राष्ट्र के आगे करुणा की गुहार लगाते!

30.05.2016
,12.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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