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इक्कीसवीं सदी का कचरा

विचार

 

आत्महत्याओं पर रोक जरूरी

राघु ठाकुर

आत्महत्या


पिछले कुछ समय से देश में आत्महत्याओं का दौर बढ़ता जा रहा है और विशेषतः महिलायें व छात्र भी अब आत्महत्याओं के रास्ते पर चल पड़े है. मैं मानता हूं किसानों की समस्यायें है और निंरतर सूखा या प्राकृतिक आपदा से वह कर्जदार बन गया है. कही-कही बड़ी हुई लागत के कारण उनकी बहुगणित क्षति ही ने उन्हें निराश कर आत्महत्या की और ढकेला. दरअसल पहली हरित क्रांति विदेशी खाद और विदेशी बीज के आधार पर शुरु हुई थी.

हाईब्रीड बीज जो लाखों रुपये की कीमत वाला था और सैकड़ों गुना पैदा करने वाला था ने किसानों को इस भारी मुनाफे वाली खेती की और आर्कशित किया. आंरभ के वर्षो से किसानों ने भरपूर पैसा कमाया और उसे बरबाद भी किया. जब घाटा हुआ वह भी इतना ज्यादा था कि वे उसे बरदास्त नही कर पाये और आत्महत्या के रास्ते पर चल पड़े.

नई तकनीक, उच्च क्षमता वाले बीज का इस्तेमाल करने वाले किसानो की आत्महत्या 90 के दशक में मुख्तः आंध्रप्रदेश से शुरु हुई थी परन्तु इन आत्महत्याओं के दौर और प्रचार ने आत्महत्याओं की प्रवृति को फैला दिया तथा कांलातर में महाराष्ट्र का विदर्भ और फिर म.प्र. तथा उ.प्र. का बुन्देलखण्ड किसानों की आत्महत्याओं के प्रमुख केन्द्र बने. 18 वीं और 19 वीं सदी के मध्य राजस्थान, हरियाणा काफी हद तक स्थाई वर्षो और सूखे के शिकार होते थे. और वहॉ के किसान गर्मी के दिनों में अपने जानवरों के साथ पलायन करके म.प्र. के मालवा क्षेत्र की ओर आते थे, जिसे कहा जाता था कि ’’पग पग रोटी डग डग नीर मालव धरती गुरु गम्भीर’’.

मुझे याद है कि जब स्व.देवीलाल जो उस समय हरियाणा के मुख्यमंत्री थे 1988 में इंदौर सभा करने आये थे तो उन्होंने हम से पूछा था कि ये महू कहॉ पर है फिर उन्होंने बताया कि वे और उनके परिवार के लोग वर्षाभाव और जलाभाव से बचने के लिये अपने जानवर के साथ पैदल चलकर महू पहॅुचते थे.

1943-44 का अकाल भारत के इतिहास में एक खौफनाक घटना के रुप में दर्ज है जिसमें लाखों लोग भूख से मरे थे. परन्तु 18-19वीं सदी के दौर में किसी किसान ने आत्महत्या की हो यह जानकारी या सूचना कहीं दर्ज नही है. जबकि उस समय सरकारी मदद या बैकों की मदद लगभग नही थी. केवल निजी साहूकारो के मनमाने ब्याज वाले कर्ज पर ही लोग जिंदा थे. परन्तु व्यक्ति के तौर पर किसान में इतना साहस था कि वह इन सब प्राकृतिक विवदाओं का मुकाबला करता था, आत्महत्या नही.

21 वी सदी के आरंभ से आत्महत्याओं का सिलसिला तेजी से बढ़ा है और किसानों के साथ-साथ छात्रों और महिलाओं की आत्महत्याओं में तेजी से बढ़ोतरी हुई है. अभी जब 12 वीं का परीक्षा परिणाम आया तो उसी दिन एक दिन में 8 छात्रों ने आत्महत्या कर ली. इसी प्रकार 10 वीं के रिजल्ट के आने के बाद 8 छात्रों ने आत्महत्या कर ली. उनमें से एक ने तो सिर्फ इसलिये आत्महत्या कर ली कि उसके अंक 75ः से कम थे. एक के पिता ने कहा कि बेटा अगर ठीक पढ़ लेते तो शायद यह स्थिति नही होती.

इतने मात्र से बच्चों ने आत्महत्या कर ली, अगर किसी छात्र को उम्मीद से कम नम्बर मिलते है तो वह आत्महत्या के रास्ते पर चल देता है. कुछ दिनों पूर्व एक छात्र ने इसी प्रकार अपने पिता को मार्मिक पत्र लिखा और आत्महत्या कर ली. अभी कुछ दिनो पूर्व म.प्र. के सागर जिले के बीना कस्बे की छात्रा दीपका चौबे ने अपने आत्महत्या के नोट में लिखा जो अखबारों ने छापा कि पापा अंग्रेजी विषय में, मैं कमजोर हूॅ पास नही हो पाऊॅगी और फांसी लगा ली इसी प्रकार होंशगाबाद के छात्र अभिशेक साहू ने नीतिशास्त्र के पर्चे से भयभीत होकर आत्महत्या कर ली.

दामपत्य जीवन के रिष्तों में थोड़े बहुत तनाव आने पर ही अक्सर समाचार पत्रों में महिलाओं के द्वारा आत्महत्या करने के समाचार प्रकाशित होते रहते है. कई बार तो दैनिक अखबार एक ही दिनों में कई-कई आत्महत्याओं की घटनाओं से भरे रहते है. विचारणीय प्रष्न यह है कि इंसान इतना कमजोर क्यों हो रहा है कि वह थोड़ा भी मानसिक तनाव या असफलता के सहने या उसका मुकाबला करने केा तैयार नही है.

हालाकि यह आत्महत्याओं का और दौर अमेरिका में ही शुरु हुआ है वहॉ आत्म हत्या करने वालों की संख्या में 24ः की वृद्वि हुई है. सम्भवतः एक कारण तो यह भी है कि मॉ-बाप अपने बच्चो को कमाऊ गाय जैसा देखते है और अपनी अपेक्षाओं को निंरतर उनके दिमाग में भरते रहते है. जो अपेक्षायें उसकी क्षमता के अनुकूल नही होती. या फिर किसी असफलता को वह अपने जीवन की निरर्थकता मान लेता है.

माता-पिता परिवार उसे असफलता व कठिनाईयों का मुकाबला करने के लिये तैयार करने के बजाय अपनी अपेक्षाओं के बोझ से इतना दवा देते है या भयभीत कर देते है कि वह थोड़ा सा भी बरदास्त नही कर पाता. हमारे देश के प्रचार तंत्र ने ऐसी घटनाओं को अपने बाजार के लिये अत्यधिक प्रचार देकर ग्लोमराइस कर दिया है और आत्महत्यायें भी कई बार इन बच्चों को आत्महत्या के लिये प्रेरणा बन जाते है.

निजाम विष्वविद्यालय हैदराबाद के छात्र रोहित वेमुला ने छात्रवृति बंद होने व कुछ आर्थिक कठिनाई से आत्महत्या कर ली, जबकी वह अपने आप को अम्बेडकरवादी मानता था. अम्बेडकर का कहना था शिक्षित बनो, संगठित हो, संर्घष करो. बाबा साहब ने यह नही कहा कि आत्महत्या करो. वेमुला आत्महत्या के बाद देश में काफी लोगों और विशेषतः अनेकानेक दलों के राजनेता वेमुला आत्महत्या के बाद देश भर में समर्थन में उतरे. अगर वे पहले ही उसके साथ होने वाले भेद भाव व अन्याय के खिलाफ खड़े होते तो शायद उसे न्याय मिल जाता और वह आत्महत्या जैसे कमजोर रास्ते पर नही जाता.

परंतु कई बार ऐसा लगता है कि हमारे देश की राजनीति इतनी क्रूर हो गई है कि वह अपने राजनैतिक लक्ष्य के लिये मौतो का इंतजार करती है. शशि थरुर और सुंनदा पुष्कर के रिष्तों की चर्चा सुंनदा पुष्कर की आत्महत्या रुपी मौत के बाद न केवल देश में बल्कि दुनिया के प्रचार तंत्र में हुई है. निःसंदेह सुंनदा पुष्कर के लिये कुछ तनाव के कारण रहे होगे.

उनकी भावनाओं को कुछ ठेस पहॅुची होगी. परन्तु थरुर के साथ उनकी यह संभवतः दूसरी शादी थी और थरुर की भी उनके साथ. पॉच सितारा संस्कृति के हमारे पष्चिमी मुखी समाज में विवाह और पुनः विवाह, तलाक और पुनः विवाह आम घटनायें है. और ऐसे समाज में रिष्तों की ईमानदारी के जजबात् व इस कारण आत्महत्या कुछ समझ में नही आती. दरअसल परिवार जो व्यक्ति को रोजगार के खतरों, जीवन के रिष्तो के संकट, और किसी भी कठिनाई के समय सुरक्षा की गांरटी देता है वह अब बिखर रहा है.

वैष्वीकरण और इस अर्थमान सभ्यता ने इन्सान को कमाने वाली मशीन के रुप में देखना शुरु कर दिया है. टी.वी. की बंदी महिलाओं और बच्चो को टी.वी. ने समाज से इतना दूर कर दिया है कि वे सदैव अपने आपको अकेला पाते है. टी.वी.-इंटरनेट-फेसबुक-व्हाट्सएप-ट्रिवटर आदि नई तकनीक के माध्यमो ने समाज में भयावह बीमारी व विकृतियों के रुप में तेजी से अपना जाल फैलाया है और इनमें घुसा हुआ आदमी भले ही इस वैष्विक दुनियॉ का उपभोक्ता सदस्य है परंतु वह एक अकेला मशीन के पुर्जे के समान है और इसलिये उसमें मुकाबला करने का साहस खत्म हो गया है.

भारतीय समाज को इन सवालों पर सोचना होगा. इनका हल तकनीक-प्रचार तंत्र या वैष्वीकरण से नही होगा बल्कि परिवार के पुनः जीवन और परिवार को समाज की एक आदर्ष इकाई के रुप में पुनः जीवित करने से होगा. लोगो को अपनी सामाजिकता और समाजिक जीवन की और लौटना होगा.

राजनैतिकों को घटनाओं के बाद क्रिया या प्रति क्रिया-अखबारी षोक और आरोप पत्र के बजाय मानवीय संघर्षो में मददगार और अन्याय के विरुद्व संघर्ष की सहयोगी संस्था के रुप में खड़ा होना होगा. वर्ना इक्कीसवी सदी तकनीक के विकास और आत्महत्या के चरमोत्कर्ष की सदी बन कर जायेगी.


01.06.2015, 11.53 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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