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कौन से भारत में रहते हैं आप

विचार

 

कौन से भारत में रहते हैं आप

प्रीतीश नंदी


एक भारत वह है, जो मौजूद है और एक वह भारत है, जिसका सपना हम देखते रहते हैं. बेशक, एक और भारत है, जिसे दुनिया देखती है. तीनों भारत एकदम अलग हैं. हम बात एक भारत की करते हैं, लेकिन सोचते हैं किसी और भारत के बारे में. हम एक भारत के लिए बजट बनाते हैं और फिर इसे दूसरे भारत पर खर्च करने लगते हैं.

तिरंगा


हम एक भारत की तो चिंता करते हैं और दूसरे को लेकर शेखी बघारते हैं. भ्रम तो इस तथ्य से और बढ़ जाता है कि एक और भारत है, जो कभी हुआ करता था, जिसके लिए आज भी कुछ लोग बहुत व्याकुल हैं और लौटकर फिर उसी भारत में जाना चाहते हैं.

वास्तव में यह एशियाई दुविधा है. हम अपने धुंधले पड़ चुके भूतकाल को भूल नहीं सकते. हम वर्तमान से खुश नहीं हैं और हम हमेशा भविष्य के सपने देखते रहते हैं. हमें हमारे बारे में दूसरे क्या सोचते हैं, उससे भी निपटना होता है. सिर्फ निपटना ही नहीं है बल्कि प्रतिक्रिया भी देनी है.

कई बार हम गुस्सेभरी प्रतिक्रिया देते हैं और कई बार इसे बिज़नेस के अवसर के रूप में लेते हैं, इसलिए चाहे हम मुगल भारत को खारिज करते हों, लेकिन पर्यटन का हमारा सबसे बड़ा आकर्षण तो ताज़महल ही है.

मेरे जैसे लोग जो मौजूदा भारत में रहते हैं, उन्हें आमतौर पर रोना-रोने वाले कहा जाता है. मुझे ट्वीट करके पूछा जाता है कि क्या मुझे अपने आस-पास कुछ भी अच्छा नहीं दिखाई देता. उन्हें यह समझाना बहुत मुश्किल होता है कि, जिस भारत की वे शेखी बघार रहे हैं, यह वह भारत नहीं है, जिसमें मैं रहता हूं.

मुझे भी अपने भारत पर उतना ही गर्व है, लेकिन मेरे भारत को सुधार की जरूरत है. उसे पानी की जरूरत है. उसके जंगलों को संरक्षित रखने की जरूरत है. प्रजातियों को मारने की नहीं, पालने-पोसने की जरूरत है. इन सबसे बढ़कर तो यह है कि इसे उन सबके लिए अधिक करुणा दिखाने की जरूरत है, जो जिंदा रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

इसे दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था होने जैसे शेखीभरे दावों की जरूरत नहीं है, यह सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था हो भी सकती है. किंतु जब तक यह सबसे गरीब, सबसे कमजोर तबकों के लिए जिंदगी बेहतर नहीं बनाती तो उसकी वृद्धि का कोई अर्थ नहीं है. वृद्धि दर तो मूर्खतापूर्ण आकड़ा भर है.

किंतु मैं उन लोगों को दोष नहीं देता, जो मुझे हमेशा शिकायत करते रहने वाले शख्स के रूप में देखते हैं, क्योंकि वे एक अलग ही भारत में रहते हैं. यह ऐसा भारत है, जिसे अद्‌भुत राजनीतिक वादों और उस मीडिया ने बढ़ावा दिया है, जो इसमें ईंधन डालता है. सच कहूं तो मेरा भारत वह है, जो आप अपने आस-पास देखते हैं, वह नहीं, जिसके बारे में आप रूमानी कल्पनाएं करते हैं.

यह वह भारत है, जिसमें आप और मैं रहते हैं- थोड़ा टूटा हुआ, कुछ खोया हुआ, थोड़ा डरावना. यह सारे गलत कारणों से ही सुर्खियों में आता है. यह घोर गरीबी, दु:ख, खुदकुशी, दुष्कर्म के साये में रहता है. मेरे भारत के हीरो तो वे हैं, जो इस सबसे गुजरने के बाद भी सिर ऊंचा करके जिंदगी जी रहे हैं.

क्या केवल सरकारों को ही दोष दिया जाना चाहिए. शायद नहीं. हर राष्ट्र में फलता-फूलता मध्यम वर्ग है, जो उम्मीदों पर जी रहा है और राजनेता उन उम्मीदों को हवा देते हैं. वे झूठ बोलते हैं. वे उम्मीदों को रूमानी रंग देते हैं. वे गलत जानकारी देते हैं, गुमराह करते हैं और गलत दिशा में ले जाते हैं.

किंतु इस सारी प्रक्रिया में वे एक बहुत ही महत्वपूर्ण काम करते हैं. वे लोगों के सपनों का पोषण करते हैं, जिनकी जिंदगी में ऐसा और कुछ नहीं है, जिसे देखकर आगे बढ़ा जा सके. वे लोगों को नारे देते हैं. वे उन लोगों से नफरत करने के कारण देते हैं, जो उनसे अलग नज़र आते हैं. राजनीति और इतिहास ने बार-बार यह प्रदर्शित किया है कि प्रेम की बजाय क्रोध अधिक लोगों को एकजुट करता है.

प्रेम तो वह चीज है, जिसे हम आदर्श के रूप में देखते हैं. नफरत ही वह भावना है, जिस पर हम पलते हैं. लोगों को नफरत करने के लिए कोई अच्छा कारण दीजिए और वे तत्काल उसे लपक लेंगे. फिर चाहे उन्हें यह पता भी हो कि आप उन्हें अपने हिसाब से ढालकर गुमराह कर रहे हैं. प्रेम और राजनीति, दोनों में लोगों को खुद का इस्तेमाल किया जाना पसंद होता है.

किंतु वे लोग जो आपको बाहर से देख रहे होते हैं, उनका इस्तेमाल करना, उन्हें अपने हिसाब से ढालना आसान नहीं होता. यही वजह है कि एक और भारत का अस्तित्व है. वह भारत, जिस रूप में अन्य हमें देखते हैं. नहीं, मैं एनआरआई यानी अनिवासी भारतीयों की बात नहीं कर रहा हूं. उनकी विश्व दृष्टि तो अतीत-मोह से ग्रस्त है.

मैं तो व्यापक स्तर पर दुनिया की बात कर रहा हूं. वे उस भारत को देखते हैं, जो बिल्कुल भिन्न है. हो सकता है हम भारत को लेकर उनके विचार से सहमत न हों, लेकिन हम इसे नज़अंदाज भी नहीं कर सकते, क्योंकि हमारे बारे में उनकी धारणा से हमारा व्यापार चलता है, दुनिया में हमारा कद तय होता है और (सबसे महत्वपूर्ण) हमारा आत्म-सम्मान परिभाषित होता है.

हमें यह पसंद हो अथवा न हो, लेकिन हम हमेशा खुद को दूसरों की नज़र से देखना पसंद करते हैं. यही वजह है कि हम वेंडी डोनीगर या लेस्ली यूडविन या जेम्स लैन जैसे लोगों से गुस्सा हो जाते हैं. हमारा दावा तो यह होता है कि हमारे बारे में उनके पूर्वग्रह पर हमें गुस्सा आ जाता है, लेकिन सच तो यह है कि उनकी बातों से अपनी छवि के बारे में हमारे दिमाग में जो संदेह उभरते हैं, उसके कारण हम क्रोधित होते हैं.

इसके साथ ही हम उस भारत में भी रहते हैं, जो कई सदियों में एकसाथ रहता है. इससे स्थिति और भी जटिल हो जाती है. लोग अलग-अलग ढंग से अाराधना करते हैं. अलग-अलग ढंग से सोचते हैं. जिन बातों पर वे भरोसा करते हैं, वे भूतकाल का हिस्सा हैं, लेकिन हम हैं कि इसे स्वीकार नहीं करते.

हम अपने भूतकाल के साथ ऐसे रहते हैं, जैसे वह हमारा वर्तमान हो और उस पर हम भविष्य खड़ा कर सकते हैं, इसलिए उत्तरप्रदेश में राम मंदिर, तमिलनाडु में जलीकट्‌टू महत्वपूर्ण है. तीन बार तलाक धार्मिक पहचान का अभिन्न अंग है.

परिवार के सम्मान के नाम पर होने वाली हत्याएं, जातिगत पूर्वग्रह, महिला के खिलाफ हिंसा, तृतीयपंथियों का बहिष्कार, अल्पसंख्यकों की प्रताड़ना, तर्कवादियों की हत्या : ये सब सड़ चुके ऐतिहासिक एजेंडे के अंग हैं, जिन्हें हम अब भी आजमाने में लगे हैं, जबकि सपना हम विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनने का देख रहे हैं.

आप किस भारत में रहते हैं? आप किस भारत में रहना चाहते हैं? आप जिस ध्वज के नीचे खड़े हैं वह किस भारत में फड़फड़ा रहा है? संभव है इसका कोई स्पष्ट उत्तर न हो. लेकिन अपने दिल में झांकिए और आप उस भारत को पाएंगे, जिसे आप प्यार करते हैं.

23.06.2016
, 19.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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