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अंबेडकर और राष्ट्रवाद

विचार

 

अंबेडकर और राष्ट्रवाद

इरफान इंजीनियर


जिन राजनैतिक दलों ने डॉ. बाबासाहब अंबेडकर के समानता, सामाजिक न्याय, स्वतत्रंता और बंधुत्व के एजेण्डे को सुनियोजित ढंग से कमज़ोर किया, वे ही दल राजनैतिक लाभ के लिए बाबासाहब का 125वां जन्मदिवस धूमधाम से मना रहे हैं..
 

दरअसल, वे बाबासाहब की विरासत पर कब्ज़ा करना चाहते हैं और अंबेडकर को अपने राजनैतिक मंतव्यों के समर्थक के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं. तथ्य यह है कि अंबेडकर के विचार, इन पार्टियों की नीतियों, कार्यक्रमों और विचारधारा के एकदम उलट थे.

हिंदू राष्ट्रवादी कभी भी अपनी विद्वता के लिए नहीं जाने जाते थे परंतु उनकी समझ इतनी कम होगी, इसका बहुतों को अंदाज़ा नहीं था. या फिर कहीं ऐसा तो नहीं कि यह भलीभांति जानते हुए भी कि बाबासाहब उनके एजेण्डे के घोर विरोधी थे, वे उनके नाम का इस्तेमाल हिंदू राष्ट्रवाद को देश पर थोपने के लिए करना चाहते हैं.

बाबासाहब को ‘राष्ट्रवादी’ या ‘देशभक्त’ बताना, तथ्यों के साथ खिलवाड़ होगा. बाबासाहब एक उदारवादी प्रजातांत्रिक थे जो सामाजिक न्याय के साथ स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों के हामी थे. अपनी पुस्तक ‘‘पाकिस्तान ऑर द पार्टिशन ऑफ इंडिया’’ में बाबासाहब ने देश के विभाजन से जुड़े मुद्दों का राष्ट्रवादी परिप्रेक्ष्य से नहीं बल्कि तार्किक और वस्तुनिष्ठ परीक्षण किया है. इस पुस्तक में बाबासाहब ने मुसलमानों की पाकिस्तान की मांग और हिंदुओं के उसके विरोध का निष्पक्ष विश्लेषण किया है.

पुस्तक के 1946 में प्रकाशित संस्करण में बाबासाहब ने उसमें खंड 5 जोड़ा और इस विषय पर अपने विचारों को इस नए खंड के अध्याय 13 और 14 में प्रस्तुत किया. उन्होंने कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, पूर्वी आयरलैंड और स्विट्जरलैंड में धार्मिक, नस्लीय और भाशायी टकरावों का विश्लेषण किया और यह बताया कि ये देश किस तरह उपयुक्त प्रणालियां और शासन का ढांचा विकसित कर इन टकरावों का प्रबंधन कर रहे हैं. उनका निष्कर्ष यह है कि अल्पसंख्यकों को एक अलग देश की मांग करने की बजाए देश के संवैधानिक ढांचे में अपने हितों की रक्षा के लिए समुचित प्रावधान किए जाने की मांग करनी चाहिए. यहां यह ध्यान देने योग्य है कि बाबासाहब ‘‘अल्पसंख्यकों के हितों’’ की बात करते हैं, ‘राष्ट्र’’ के हितों की नहीं.

बंबई में 6 मई, 1945 को ऑल इंडिया शिड्यूल्ड कास्टस फेडरेशन के अधिवेषन को संबोधित करते हुए बाबासाहब ने आत्मनिर्णय के सिद्धांत का समर्थन करते हुए कहा कि ‘‘मैं पाकिस्तान के खिलाफ नहीं हूं. मैं यह मानता हूं कि पाकिस्तान की मांग, आत्मनिर्णय के सिद्धांत पर आधारित है और इस सिद्धांत पर प्रश्नचिन्ह लगाने के लिए अब बहुत देरी हो चुकी है. मैं उन्हें इस सिद्धांत का लाभ देने के लिए तैयार हूं...’’.

बाबासाहब का मानना था कि मुसलमान, पाकिस्तान की मांग की बजाए उनके प्रस्ताव को स्वीकार कर लेंगे क्योंकि उससे उन्हें बेहतर सुरक्षा उपलब्ध हो सकेगी और अपनी इसी सोच के चलते वे देश के विभाजन के विरोधी थे. इसके विपरीत, कोई राष्ट्रवादी देश के विभाजन के प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर देता और आत्मनिर्णय के सिद्धांत की बात करना, उसके लिए ‘‘राष्ट्रविरोधी’’ और गुनाह होता. आज भी ‘आत्मनिर्णय’ शब्द का उच्चारण मात्र करने वाले व्यक्ति पर हिंदू राष्ट्रवादियों की भीड़ हल्ला बोलने के लिए हरदम तैयार रहती है. संक्षेप में, बाबासाहब का प्रस्ताव यह था कि विधायिका और कार्यपालिका में अल्पसंख्यकों का पर्याप्त

प्रतिनिधित्व सुनिष्चित करने के लिए उपयुक्त प्रावधान किए जाएं. वे लिखते हैं, ‘‘बहुसंख्यकों का शासन सिद्धांतः अस्वीकार्य और व्यवहार में अनुचित होगा. बहुसंख्यक समुदाय को प्रतिनिधित्व में आपेक्षिक बहुमत तो दिया जा सकता है परंतु वह कभी पूर्ण बहुमत का दावा नहीं कर सकता.’’ बाबासाहब यह नहीं चाहते थे कि विधायिका में बहुसंख्यक समुदाय का प्रतिनिधित्व इतना अधिक हो कि वह छोटे अल्पसंख्यक समुदायों की मदद से अपना शासन स्थापित कर ले.

बाबासाहब के अनुसार, भारत में विधायिका में बहुमत का अर्थ, सांप्रदायिक बहुमत होगा. यह स्थिति इंग्लैंड से एकदम अलग है जहां के सभी नागरिक मुख्यतः एक ही धर्म का पालन करते हैं और एक ही भाशा बोलते हैं. जहां तक भारत का सवाल है, यहां आनुपातिक प्रतिनिधित्व की बात तो दूर रही, किसी ऐसी सकारात्मक कार्यवाही की बात, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि अल्पसंख्यक विकास की दौड़ में पीछे न छूटें और उनके साथ भेदभाव न हो, करने मात्र से हिंदू राष्ट्रवादियों की भृकटियां तन जाती हैं और वे ऐसे किसी भी प्रयास को ‘‘अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण‘‘ बताते हैं.

अगर भारत के संविधान में विधायिका में आनुपातिक प्रतिनिधित्व और अल्पसंख्यकों के लिए पृथक मताधिकार की व्यवस्था नहीं है तो इसका कारण यह नहीं है कि बाबासाहब सिद्धांतः इसके खिलाफ थे बल्कि ऐसा इसलिए है क्योंकि संविधानसभा की अल्पसंख्यक व मूल अधिकार परामर्षदात्री समिति के अध्यक्ष सरदार पटेल ने अल्पसंख्यकों को सफलतापूर्वक पृथक मताधिकार की मांग न करने के लिए राज़ी कर लिया था और यह एक सही कदम था. विभाजन के बाद भारत में जो अल्पसंख्यक बच गए उन्हें ऐसा लगा कि उन्हें बहुसंख्यक समुदाय का सद्भाव अर्जित करना चाहिए {कांस्ट्यिूएंट असेम्बली डिबेट्स, खंड पांच (14.08.1947 से 30.08.1947), 2003, पृष्ठ 198-200}.
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