पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
 पहला पन्ना > Print | Send to Friend 

आतंक का जवाब नहीं उन्माद

विचार

 

आतंक का जवाब नहीं उन्माद

प्रीतीश नंदी


इससे पहले कि हम आतंकवाद के मसले को भूलकर अपनी रोजमर्रा की मुश्किलों की ओर लौट आएं, यहां एक बात कहना मैं जरूरी समझता हूं कि आतंकी हमला कोई जंग का हिस्सा नहीं है, जैसा कि सलमान रुश्दी ने इसके बारे में कहा है. यह तो एक तरह से उकसाने जैसा कृत्य है. इसका मकसद आपको गुस्सा दिलाना, आपको उन्मादी बनाना है. असल में आपको इतना उन्मादी बनाना कि आप हरसंभव गलतियां करने लगें. यही गलतियां आखिरकार आपको इतना नुकसान पहुंचा सकती हैं, जितना कि खुद आतंकी हमलों से नुकसान नहीं होता.


आप खुद ही देख लें कि ओसामा ने महाशक्ति अमेरिका के साथ क्या किया? उसने अमेरिका के गौरव और सत्ता का प्रतीक न्यूयॉर्क स्थित ट्विन टावर्स को गिराने के लिए जेहादी लड़ाकों की टीम भेजी. उसकी इस हरकत से क्रोधित अमेरिका तब से ही अफगानिस्तान में बमबारी कर रहा है, लेकिन अब तक वह ओसामा को पकड़ नहीं पाया है. इसके बजाय, उसने हजारों मासूम नागरिकों को मार दिया है और मुसलमानों को इस कदर अलग-थलग कर दिया है कि ओसामा यदि अमेरिका पर दूसरे हमले की योजना बना रहा है, तो उसे इसके लिए आसानी से लड़के मिल सकते हैं.

 

इसके अलावा, कुछ अजीब कारणों के चलते, अमेरिका आतंकवाद से लड़ने के नाम पर बाहर निकला और इराक में एक बेतुकी और पूरी तरह से निरर्थक लड़ाई में जाकर उलझ गया. मुझे लगता है कि इसके पीछे सोच ओसामा को पकड़ने में मिली असफलता से लोगों का ध्यान हटाना था, जिसकी इस समय तक पाकिस्तान में छिपे होने की पूरी संभावना है. इसने उसे ऐसे जटिल हालात में उलझा दिया, जो लगातार बदतर होते जा रहे हैं और अब बेचारे ओबामा के पास अपने सैनिकों को वापस बुलाने के सिवा कोई चारा नहीं है, इससे पहले कि यह हारी हुई लड़ाई लगने लगे.


आतंकवाद के खिलाफ जंग के नाम पर अमेरिका ने अपने कुछ उच्च लोकतांत्रिक मूल्यों को भी ताक पर रख दिया. आतंकवाद की खिलाफत के नाम पर लोगों को ग्वांतानामो वे जैसी सुदूरवर्ती जगहों पर भी अवैध तरीके से हिरासत में रखा जा रहा है, उन्हें अमानवीय यातनाएं दी जा रही हैं और मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन हो रहा है. हां, वह यह सुनिश्चित करने में सफल रहा कि अब उसके यहां और कोई आतंकी हमला न हो, जो कोई छोटी उपलब्धि नहीं है, लेकिन किस कीमत पर? कई युवा अमेरिकियों ने सीमापार जंग लड़ते हुए अपनी जान गंवा दी है, इसने बुश को अमेरिकी इतिहास में निक्सन के बाद सबसे निंदनीय राष्ट्रपति बना दिया है.(दिलचस्प ढंग से, निक्सन अमेरिका को चीन के करीब लाए, जिस तरह बुश भारत को सुपर पावर लीग में लेकर आए. अन्यथा हम अब तक तीसरी दुनिया के महत्वाकांक्षी देश के रूप में रूस के साथ चिपके होते.)


इस नफरत को बरकरार रखने के लिए ये गुट दुनिया में अलग-अलग जगहों पर अमेरिकी लक्ष्यों को निशाना बना रहे हैं. जिन आतताइयों ने मुंबई के ताज और ट्राइडेंट होटल पर हमला किया, उन्होंने खासतौर पर अमेरिकी नागरिकों को अलग खड़े होने के लिए कहा और बाद में उन्हें गोली मार दी. इससे एक बार फिर यह साबित हो गया कि लड़ाई की परंपरागत तकनीकों के जरिए आतंकवाद से निपटना आसान नहीं है. आतंकियों के पास अपनी जान के अलावा गंवाने के लिए कुछ नहीं है और उनका इस कदर ब्रेनवॉश किया जाता है कि उन्हें इसकी परवाह नहीं होती. यही बात उनके बारे में किसी भी तरह के पूर्वानुमान को असंभव बनाती है. आप अमेरिका की तरह ताकतवर और इजरायलियों की तरह निडर हो सकते हैं, इसके बावजूद आप आतंकवादियों को खत्म नहीं कर सकते क्योंकि उन जैसे कई और लोग कतार में हैं जो जन्नत की टिकट पाने का इंतजार कर रहे हैं.


यही मेरे विचार से अहम बात है. हम 26/11 को लेकर ऐसी सहज प्रतिक्रियाएं नहीं दे सकते- मसलन आतंकी प्रशिक्षण शिविरों पर हमला कर दें या पाकिस्तानी क्रिकेट टीम पर प्रतिबंध लगा दें अथवा समझौता एक्सप्रेस रोक दें या फिर अंतिम रूप से जंग में उतर जाएं. आतंकवादी यही तो करवाना चाहते हैं. वे शत्रुता और अंधी उग्रता के माहौल में ही फलते-फूलते हैं. पाकिस्तान में नागरिक सरकार पहले ध्वस्त होगी और इसके बाद वहां सेना और आईएसआई का अधिकार होगा. यही जेहादियों के लिए मुफीद है. वे भारत को जंग में उलझाना चाहते हैं जिससे हमारी अर्थव्यवस्था को आघात लगे, विकास की रफ्तार धीमी हो, स्थानीय मुसलमान खुद को डरे हुए और असुरक्षित महसूस करें. असल में यह भय ही आतंकवादियों के उद्देश्य को पूरा करता है.


अतएव, हम पाकिस्तान को गर्त में नहीं जाने दे सकते. इसका मतलब होगा ज्यादा बेरोजगारी, ज्यादा गरीबी, ज्यादा जेहादी, कश्मीर में और समस्याएं, और बम धमाके, यहां, वहां, जहां-तहां. हमें संबंध-विच्छेद कर पाकिस्तान के लोगों के साथ अपने रिश्ते बिगाड़ने की कोई जरूरत नहीं है, जो हमने सालों में बनाए हैं, चाहे वह क्रिकेट के जरिए हों या रियलिटी शो के जरिए क्योंकि आतंकवाद को हर जगह अलग-थलग और दंडित करना जरूरी है, यहां तक कि पाकिस्तान में भी. यह बात सच है कि पाकिस्तानी सरकार कमजोर, दोगली है और अकाट्य सबूतों के बावजूद झूठ पर झूठ बोले जा रही है. उसे लगता है कि कठमुल्लाओं को खुश करने और सत्ता से चिपके रहने का यही एक रास्ता है. लेकिन इस बात को याद रखें कि यदि पाकिस्तान में फिर से लोकतंत्र नाकाम होता है तो भारत की समस्याएं और बढ़ जाएंगी.

आतंकवाद से लड़ने का एक ही तरीका है कि ऐसे मजबूत, समृद्ध, समतावादी भारत का निर्माण करें जहां शिक्षा और अवसरों से कोई वंचित न हो. यदि हम ऐसा करने में कामयाब होते हैं तो इससे न सिर्फ आतंकवाद को मुंहतोड़ जवाब मिलेगा वरन हम ऐसी महाशक्ति भी बन जाएंगे, जैसा हम बनना चाहते हैं. वर्ष 2009 में क्यों न हम इस पर ध्यान केंद्रित करें, बजाय जंग की बात करने और उन पाकिस्तानी रचनाकारों को प्रतिबंधित करने के, जिनमें से कई वास्तव में आतंकवाद के खिलाफ जंग में हमारे सहयोगी हैं?

 

08.01.2009,17.57 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   

 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in