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राजनीति का पीके सिंड्रोम

विचार

 

राजनीति का पीके सिंड्रोम

रघु ठाकुर


मई 2014 लोकसभा चुनाव में श्री नरेन्द्र मोदी की जीत की रणनीति का श्रेय उनके विश्वस्त श्री प्रशांत किशोर को दिया गया था. ऐसा बताया गया कि श्री मोदी की चाय पर बात और अबकी बार मोदी सरकार जैसे नारे और कार्यक्रम उन्ही के बनाये हुये थे. उसके बाद से चुनावी बाजार में प्रशांत किशोर की मांग बढ़ गई, और चुनाव जीतने के लिये लालयित और तैयारी करने वाले दल प्रशांत किशोर के पीछे घूमने लगे.

prashant kishor


यबिहार चुनाव में भी श्री नीतीश कुमार की जीत का श्रेय प्रशांत किशोर को ही दिया गया और वे चुनाव जीतने के प्रंबधन के जेम्स बांड बन गये. अब उ.प्र. पंजाब के चुनाव में भी उनकी सेवायें कांग्रेस पार्टी प्राप्त कर रही है और प्रशांत किशोर के चुनावी प्रंबधन के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने की तैयारी कर रही है.

इसके पहले भी चुनाव नारो को गढ़ने वाले और नेताओं की छवि निर्माण करने वाली एंजेसियों का प्रयोग और चर्चा होती रही है. 1980 के लोक सभा चुनाव में स्व.श्रीकांत वर्मा का गढ़ा हुआ एक नारा ’’न जात पर न पात पर इंदिरा जी की बात पर मुहर लगेगी हाथ पर’’ बहुत चर्चित हुआ था, और प्रचार तंत्र तथा एक विशिष्ठ वर्ग ने 1980 में इंदिरा जी की जीत को इस नारे की जीत बता दिया था.

1985 के बाद से हमारे देश में भी यूरोप और अमेरिका की तर्ज पर प्रचार एंजेसियों का प्रयोग शुरु हुआ जो भारी भरकम राशि लेकर नेताओं की छवि निर्माण का कार्य करने लगे थे. इसका एक अर्थ यह हुआ है कि 1980 के दशक से ही ऐसे व्यक्तियों का देश का नेता बनने का सिलसिला शुरु हो गया जो उसके पहले न तो देश के नेता थे न वे उसके काबिल थे. परंतु इन कम्पनियों ने अपने तकनीकी और प्रचार कौशल से उन्हें देश का नेता बनाकर खड़ा कर दिया. ये

प्रचार कम्पनियॉ लगभग राजनीति की दुल्हनों को सजाने और रंग-रोगन करने की ब्यूटी पार्लर जैसी बन गयी. सजावट की इस बीमारी से बाद में स्वः राजीव गांधी और श्री अटल बिहारी बाजपेयी भी अछूते नही रहे. जबकि राजीव गांधी की पहचान उनको परिवार से मिली थी, और श्री अटल बिहारी जी की पहचान उनके दीर्द्य कालिक राजनैतिक जीवन से मिली थी. दरअसल यह कम्पनियां प्रचार के लिये झूठ के सूत्र खोजकर प्रचारतंत्र को लगभग खरीद कर एक कृत्रिम छवि गढ़ने वाली कम्पनियां थी.

इस मर्म को समझकर 1987-88 के बाद अपने पंसद के व्यक्तियों को या कहा जाये कि अपने हित पोषक व्यक्तियों को देश की जनता के ऊपर आक्रमक प्रचार माध्यम से थोपने का सिलसिला शुरु हो गया. 87-88 के दौरान देश के तमाम वरिष्ठ राजनेताओं और जनाधार वाले नेताओं को दरकिनार कर अपने प्रचार तंत्र के माध्यम से देश का नेता बनाने का सिलसिला शुरु हुआ.

स्वः विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसे लेाग इसी आक्रामक प्रचार तंत्र की पैदायस थे. प्रचारतंत्र की मालिक शक्तियों ने अपने आर्थिक हितो को सुरक्षित रखने के लिये यह प्रयोग शुरु किया और वे इसमें सफल भी हुये. हांलाकि इस सफलता के पीछे प्रचार तंत्र के मारक प्रचार के सामने खड़े होने के लिये उनमें आत्मविश्वास की कमी भी थी यद्यपि उनके क्षेत्रो का जनाधार उनके साथ था.

अगर 1989 के पूर्व इस मारक प्रचार तंत्र के मानसिक दबाव में स्व.देवीलाल, बीजू पटनायक, कर्पूरी ठाकुर, जैसे जनाधार वाले क्षेत्रीय नेताओं ने प्रचारतंत्र के समक्ष आत्म समपर्ण नही किया होता तो पूंजीवादी प्रचार तंत्र हारता तथा उसके द्वारा खडे़ किये हुये या गढ़े हुये नेता कोई विषेष परिणाम नही दे पाते. परंतु प्रचार तंत्र के प्रचार से वे घबड़ा गये और उन्होंने प्रचार तंत्र आक्रामक की कोख से जन्मे व्यक्ति को ही नेता स्वीकार कर लिया. हांलाकि सत्ता के षीर्ष पर पहॅुचने के कुछ ही समय बाद यह नकली और बौना नेतृत्व असफल साबित हुआ, परंतु जनमत को धोखा हो चुका था.

अब प्रचार तंत्र और प्रंबधन लगभग दोनो ही आर्थिक शक्तियो के नियंत्रण में रहते है इनके द्वारा चुनाव जीतने का अंतिम अस्त्र प्रंबधन है, यह सिद्व करने का नया खेल शुरु हुआ है. श्री नरेन्द्र मोदी की जीत केवल प्रबंधन की जीत नही है बल्कि संघ का संगठन, भाजपा की राजनैतिक शक्ति, कार्पोरेट का पैसा व समर्थन तथा दूसरी तरफ मुख्य विरोधी कांग्रेस पार्टी का एक के बाद एक भ्रष्टाचार के आरोपो से छवि का गिरना ही था.
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