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महंगाई के चक्रव्यूह में फंसा किसान

विचार

 

महंगाई के चक्रव्यूह में फंसा किसान

रघु ठाकुर


बाजार में टमाटर के दाम, अस्सी रुपये के आस-पास पहुंच गये है और इसी प्रकार अन्य हरी सब्जियों के दाम भी उछाल पर है समाचार पत्रों में लगातार इस आशय के समाचार छप रहे है तथा यदा-कदा सत्ता तंत्र के लोगों की भी चिंता बयानों के रुप में सामने आती रही है..

महंगाई


सरकार की ओर से यह सफाई भी दी जा रही है कि मानसून के विलंबित होने की वजह से तथा तेज गरमी पड़ने की वजह से हरी सब्जी की आवक कम हुई है इसलिये ये दाम वृद्धि हुई है.

दूसरी तरफ प्याज के चित्र (फोटो) और समाचार भी रोज अखबारों में प्रकाषित हो रहे है और किसानों के बयान भी आ रहे है कि उनकी प्याज की खरीद मंडियो में नही हो पा रही है. प्याज की आवक इतने बड़े पैमाने पर हुई कि उसके दाम गिर गये हालत यह हो गये कि किसान अपनी पैदावार को मंडी या मंडी के पास लावारिस छोड़कर जा रहा है.

म.प्र. सरकार ने कुछ दिनों पहले ये ऐलान किया था कि प्याज, सरकार छः रुपये प्रति किलो के भाव से खरीदेगी सरकार ने उत्पादित प्याज का कुछ हिस्सा खरीदा भी पंरतु अब सरकारी खरीद भी बंद हो गयी है क्योंकि खरीदी हुई प्याज के भंडारण की कोई व्यवस्था नही है और दूसरी तरफ जो प्याज खरीदी जा चुकी है उसका भी एक बड़ा हिस्सा मंडियों में खुला पड़ा है. अगर कुछ दिनों में उसकी व्यवस्था नही हुई जो कि संभव भी नही है तो यह प्याज सड़ जायेगी या मानसून के आते पूरी तरह बर्बाद हो जायेगी. अगर मानसून समय पर आ गया होता तो कितनी बर्बादी हो चुकी होती यह भी अकल्पनीय है.

कुछ दिनों पहले समाचार पत्रों में यह समाचार भी छपा था उनके खेतों में जो टमाटर पैदा हुआ था उसे उन्होंने बुला-बुला कर लेागों में बॅटवाया, क्योंकि पैदावर बहुत ज्यादा हुई थी और दाम नगण्य थे. मुख्यमंत्री पहले चाहे जैसे रहे हो पर अब आर्थिक रुप से समर्थ है इसलिये उन्हें यह आसान और संभव है कि वे अपने उत्पादन को मुफ्त में बॅटवा दे, परंतु आम किसान को यह संभव नही है. क्योंकि उसके समक्ष फसल बोते समय लिये जाने वाले कर्ज और उस पर ब्याज की चिंता है. कृषि उत्पादांे को लेकर ऐसी स्थितियॉ अभी या इसी वर्ष नही बल्कि लगातार बरसो से चली आ रही है परंतु न तो राज्य सरकारें, न केन्द्र सरकार इसको हल करने में समर्थ दिख रही है.

यही वह प्याज है कि जब फसल चले जाने के बाद इसके दाम बढ़ते है तो मीडिया के माध्यम से सारा देश हिल जाता है और प्याज जो छिलकर, छिलने पर आंख में आंसू लाती है मांग बढ़़ने पर सत्ताधीषों को जला देती है. एक नही अनेक सरकार प्याज की दाम वृद्धि की षिकार हो चुकी है और केन्द्र की हुकूमतें भी प्याज के दाम ने बदल दी है.

हांलाकि ये एक दुःखद स्थिति है कि प्याज या सब्जियों या अनाज के दाम बढ़ने पर सारा देश मंहगाई को लेकर रोता है पंरतु जब फसलों के दाम मिट्टी मोल हो जाते है तो किसान रोता है, और आत्महत्या करता है तब किसान को छोड़कर सारा देश मुस्कराता है. जैसे किसान देश का हिस्सा न हो और किसान की पीढ़ा से देश और समाज को कोई लेना देना न हो.
भंडारण को लेकर पिछले दो दशकों में देश में लगातार सरकारों के स्तर पर और मीडिया के स्तर पर चर्चा होती रही है. गाहे-बगाहे आंकड़े परोसे जाते रहे कि दुनिया में, अन्य देषों में भंडारण सुविधाएं होने से कितनी फसले कम नष्ट होती है और भारत में इसकी मात्रा कितनी अधिक है.

यह तथ्य भी है कि, हमारे देश में प्रति वर्ष लाखों टन गेहूं, चावल आदि कृषि उपज भंडारण के आभाव में नष्ट हो जाती है. और एक तरफ कृषि उत्पाद की बर्बादी और दूसरी तरफ भूखमरी के सही या गलत आंकड़े सर्वोच्च न्यायालय को परेशान करने लगते है तथा सर्वोच्च न्यायालय भारत सरकार को निःशुक्ल अनाज बांटने का र्निदेश दे देता है.

इतना ही नही न्यायालय के आदेश के बाद भारत सरकार मुफ्त बांटने हेतु अनाज आंवटन कर देती है और अधिकांश राज्य उस अनाज को उठाने में भी समर्थ नही होते और मालगाड़ियों का भाड़ा चुकाने में भी असमर्थता व्यक्त करते हैं या फिर केन्द्र सरकार से किराये में मुक्ति चाहते है. अभी हाल में दालों के दामों मे जो वृद्धि हुई उससे चिंतित होकर केन्द्र सरकार ने आदेश जारी किया है कि दाल खुले बाजार में एक सौ तीस रुपये किलो से अधिक भाव पर नही बिकना चाहिये.

भारत सरकार का ये आदेश कितना अमल में आयेगा और कितना व्यवहारिक है यह चर्चा का विषय हे. 44 रुपये किलो के भाव से किसान से जिस दाल को लिया गया उसे बाजार में एक सौ तीस रुपये किलो से क्यों बेचा जाना चाहिये, इसका उत्तर वित्त मंत्री जी को देश को अवश्य देना चाहिये. जो दालों को दबा कर रखने वाले कालाबाजारिये जो दाल ड़ेढ़ सौ रुपये किलो बेच रहे थे उन पर सरकार के आदेश का कोई फर्क नही हैं.

काला बाजारियें व उनकी सरकार दोनों इस आदेश से प्रसन्न है कि अब सामान्य उपभोक्ता को बिगड़ी टूटी फूटी दाल एक सौ तीस रुपये किलो के भाव में दे देगें और बड़े दामों की साबूत दाल बड़े लोग एक सौ पचास - साठ रुपये किलो के भाव में खा लेंगे, बाजार सरकार की और सरकार बाजार की जय-जयकार करेगी.

भंडारण को लेकर भी जो उपाय, पिछले बीस वर्ष में सरकारों ने किये है उसका अध्ययन और विष्लेषण जरुरी है. सरकारो ने भंडारण बनाने के लिये लगभग शत-प्रतिशत अनुदान देने का नियम बनाया और बैंक तथा व्यापारियों के सांठ-गांठ से इस अनुदान का लाभ केवल व्यापार जगत ने उठाया.

अगर सरकार इस बात का अध्ययन कराये कि कितने ऐसे किसानों को भंडारण क्षमता बढ़ाने के लिये अनुदान दिया है जो केवल कृषि पर निर्भर थे तो शायद ही कोई नाम सामने आये. भंडारण का अनुदान, बैंक अधिकारियों और व्यापारियों में बंट गया, फसलों का भंडारण तो नही हुआ किंतु अनुदान का भंडारण हो गया.

अब सोचना यह होगा कि आखिर इन प्रष्नों का हल क्या हो. मैं हॅू जानता कि सरकारों को गांधी व लोहिया के नाम से परहेज है और कुछ एक को एलर्जी भी है. परंतु इन समस्याओं का हल गांधी, लोहिया के बाहर संभव नही है.
1. डा. राममनोहर लोहिया कहते थे कि देश में दाम बांधो नीति होनी चाहिये यानि लागत खर्च और बाजार मूल्य में 50 प्रतिशत से अधिक का अंतर न हो. यह दाम बांधो नीति खेत खलियान, उद्योग, कारखाने सभी पर समान रुप से लागू होना चाहिये. अगर ये सरकार यह नीति स्वीकार कर लेती है तो सभी प्रकार की मंहगाई से निजात हो जायेगी.

2. अनाज का भंडारण व्यापार जगत के लिये मुफीद है, लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी और हम लेाग दशकों से कह रहे है कि फसलों का भंडारगृह किसान को ही बनाना चाहिये. यानि सरकारे बैंक के माध्यम से किसानों को जनसमर्थन मूल्य दे तथा किसान के घर और जरुरत पड़ने पर गांव में ही उसका भंडार हो. फसलों की सुरक्षा का दायित्व किसान की सुरक्षा का दायित्व, किसान या भंडार गांव का हो तथा इसके लिये उन्हें भंडार शुल्क बाद में दिया जाये. इन भंडार गृह में बैंक का सील और ताला हो, यह एक प्रकार में अमानती सामान हो.

3. महात्मा गांधी जब ग्राम स्वराज की बात कहते थे तो उसका एक अर्थ यह भी था कि गांव अपनी जरुरतों के लिये वह सब पैदा करे जो उसके लिये जरुरी हो न केवल प्रशासनिक सत्ता बल्कि आर्थिक स्वतंत्रता तथा उपभोग की आजादी भी गांव के पास हो. अगर इस लक्ष्य को सामने रखकर सरकार ये नीति बनाये कि अगर देश की कुल जरुरतों को विशेषकर खाद्यान्न जरुरतों को पॉच सौ या एक हजार उत्पादक क्षेत्रों में बांट दे और ये उत्पादक क्षेत्र, संबन्धित फसलों के लिये मिट्टी पानी आदि कि जरुरतो के आधार पर बनाये जाये तो, पैदावार और मांग में नया आनुपातिक संतुलन पैदा हो जायेगा, तथा भंडारण की समस्या, बाजार और काला बाजारी की लूट पर स्वंयमेव निंयत्रण हो जायेगा. न दामों के अभाव में किसान लूटेगा न फसलों की पैदावार से किसान टूटेगा. यह एक साहसिक निर्णय होगा परंतु क्या भारत सरकार इसे करने का साहस जुटा पायेगी.

प्रधानमंत्री नवाचार की बात करते हैं और किसानों की आमदनी पच्चीस फीसदी बढ़ाने की भी. उपरोक्त उपाय नवाचार भी होगे, क्योंकि इन उपायों से फसलों को सड़कों पर नही फैंकना पडेगा और बाजार दाम नियंत्रित होने से किसान और इंसान का जीवन खर्च घट जायेगा.

इसलिये लोहिया यह भी कहते थे कि दो फसलों के बीच का उतार-चढ़ाव तय होना चाहिये तथा फसल के आने और फसल के जाने के बाद कृषि उत्पाद में वृद्धि छः प्रतिशत से अधिक नही होनी चाहिये. किंतु अभी हालात यह है कि फसल आने और जाने के बाद दामों में एक हजार से दो हजार तक की वृद्धि होती है यानि पचास गुना से अधिक वृद्धि. फलस्वरुप इंसान लूट जाता है, किसान बिक जाता है, और बाजार बन जाता है.

17.
07.2016, 19.39 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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