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देश जगाओ-भारत बचाओ

विचार

 

देश जगाओ-भारत बचाओ

रघु ठाकुर


कुछ ही दिनों में वर्ष 2016 का पन्द्रह अगस्त आयेगा तथा केन्द्र व प्रदेश की सरकारें धूमधाम के साथ स्वाधीनता दिवस मनायेगी व अपने-अपने कार्यो के गुणगान विज्ञापनो व भाषणों के माध्यम से करेंगी. परन्तु एक भारतीय के नाते हमें सोचना होगा कि क्या हम वास्तव में स्वतंत्र है. क्या हम वास्तव में स्वाधीन हैं?

तिरंगा


स्वतंत्रता का तथा स्वाधीनता का क्या अर्थ है? स्वतंत्रता एक व्यवस्थागत आजादी का बोध कराता है, मसलन स्वतंत्र याने हमारे देश का अपना प्रशासन-अपनी शासन-प्रशासन प्रणाली. परंतु स्वाधीनता उससे कुछ ज्यादा व्यापक अर्थ देता है. जिसमें किसी भी प्रकार की किसी दूसरे या बाहरी की अधीनता न हो. एक देश के रुप में हम अपने ही अधीन हो-एक नागरिक के रुप में, हम अपनी अर्न्तआत्मा के अधीन है. अब प्रश्न यह है कि आज की स्थितियॉ क्या इस प्रकार की है.

भारत की जनता को इस बात का तो साधुवाद देना होगा कि इन 69 वर्षो में, हमने अपने लोकतंत्र को बरकरार रखा है तथा अपने मत से समयबद्ध चुनाव के अधिकार का हनन नहीं होने दिया. 41 वर्ष पूर्व जब श्रीमती इंदिरा गांधी ने इस व्यस्क मतदान के अधिकार का, प्रेस की आजादी का, मौलिक अधिकारो को समाप्त करने का प्रयास किया तो लगभग समूचा देश एक जुट होकर इसके खिलाफ निर्णायक मतदाता बना तथा सरकारी पार्टी को पराजित कर तत्कालीन व भावी शासकों को भी संदेश दे दिया कि लोकतंत्र से खिलवाड़ को सहन नही करेगी.

यह भी भारतीय लोकतंत्र का महत्वपूर्ण पक्ष है कि जब लगभग समूचे एशिया मंे या तो लोकतंत्र नहीं है या समाप्त हो गया. कहीं कहीं सेना द्वारा नियंत्रित लोकतंत्र है भारत में कम से कम लोकतंत्र के जो संवैधानिक प्रावधान रखे गये थे, वे यथावत् है तथा कार्य कर रहें है. परंतु हमारा विचारणीय प्रश्न यह है कि जो हमारा लोकतंत्र है क्या वह स्वस्थ्य या वास्तविक लोकतंत्र कहा जा सकता है. तो हमारे सामने भारतीय लोकतंत्र और राजनीति में जन्म ले रही, फलफूल रही विकृतियॉ भी आ जाती है.

लोकतंत्र केवल साधन नही वरन साध्य भी है. लोकतंत्र केवल प्रणाली नहीं वरन आर्दश भी है. लोकतंत्र या जनतंत्र याने जिसमें तंत्र का नियंत्रण लोग या जन के पास हो. परंतु यह आज के हालात में केैसे संभव है. जब एक मतदाता के रुप में हमने स्वतः अपने आपको विकृतियों का दास बना दिया है तो आर्दश लोकतंत्र कैसे आएगा.

आज भारतीय राजनीति में जातिवाद-सम्प्रदायवाद-परिवारवाद-पूंजीवाद-बाजारवाद की बीमारियों का संक्रमण व्यापक रुप से फैला है. परिवारवाद-लोकंतत्र की मूल अवधारणा के खिलाफ है. परिवारवाद-राजतंत्र परंपरा है. लोकतंत्र व्यक्ति की आजादी की व्यवस्था है. परंतु आज तो लगभग सभी राष्ट्रीय या क्षेत्रीय दल परिवारवाद के पक्षधर बन रहें है.

कतिपय राजनेता तो सार्वजनिक रुप से यह तर्क देते है कि अगर डाक्टर का बेटा डाक्टर-वकील का बेटा वकील बन सकता है तो नेता का बेटा नेता बने इसमें क्या बुरा है. दरअसल यह तुलना तर्क संगत नहीं है. वषांनुगत उत्तराधिकर संपत्ति का या संपत्ति कमाने का औजार हो सकता है, परंतु राजनीति समाज के निर्माण की क्रिया है. डा. लोहिया कहते थे कि राजनीति अल्पकालिक धर्म है और धर्म दीर्धकालिक राजनीति. अब अगर राजनीति या धर्म का उत्तराधिकार वंश के आधार पर होगा तो दोनों के गुण व मूल्य समाप्त हो जाएगे.

राजनैतिक पद का आधार किसी व्यक्ति का, देश के प्रति न्याय या कुर्बानी होना चाहिए. न कि माता-पिता की हैसियत या सत्ता की ताकत. अगर भारत की आजादी के अंादोलन का मूल परिवारवाद होता तो फिर हजारों वर्षो के राजतंत्र को समाप्त ही क्यों करते. संविधान में, जनता द्वारा निर्वाचित सरकार का प्रावधान क्यों करते? परिवारवाद एक सीढ़ी है जो अयोग्य को श्रेष्ठ और योग्य को हीन बनाता है. परिवारवाद जड़ता का पर्याय है, जो परिवर्तन को रोकता है.

यह लोकतंत्र की मूलरचना का भी विरोधी है. साथ ही उन हजारों दलीय या अन्य कार्यकर्ताओं का भी अपमान है जो किसी व्यक्ति को सांसद या विधायक बनाने के नींव के पत्थर होते है. यह कैसी विंडवना है कि जिन सैकड़ो, हजारों कार्यकर्ताओं के कंधे पर चढ़कर, जिन लाखों मतदाताओं के विष्वास पर जब कोई व्यक्ति विधायक/सांसद/या फिर बाद में मंत्री आदि बनता है, वह निर्वाचित होतें ही विशिष्ठ व शक्तिशाली हो जाता है.

दरअसल परिवारवाद को बल देने के लिये ही सत्ता प्रतिष्ठानों ने निर्वाचित व्यक्ति को इतना शक्तिशाली बना दिया हैं ताकि वह अपनी सत्ता के कारण आमजन से श्रेष्ठ दिखने लगें. उसे विशिष्ठ या अतिविशिष्ठ के तगमों से जड़ दिया जाता है. और फिर धीरे-धीरे वह राजनैतिक, प्रशासनिक व धन/शक्ति का संचय करते-करते नया राजा बनने लगता है.

आज देश में हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था , पांच वर्ष में केवल एक दिन लोकतांत्रिक रहती है याने चुनाव के दिन. उसके बाद वह नवसामंतवाद या लोकतांत्रिक राजतंत्र में बदल जाती है. निंसदेह इस विकृति के लिये निर्वाचित सत्ताधीश/प्रतिनिधि तथा आमजन दोनों ही जबाबदार है क्यांेकि जन प्रतिनिधियों या नेतृत्व का कार्य आदर्श प्रतिपादित करना है. न कि जनमानस की कमजोरियों को ढाल बनाकर इस्तेमाल करना. तथा लोकतंत्र में अंतिम शक्ति तो मतदाता के पास ही है.

अगर मतदाता परिवारवाद के प्रतीकों को हराने का निश्चय कर ले तो एक क्षण में परिवारवाद का अंत हो जायेगा. जातिवाद हमारे लोकतंत्र की दूसरी बड़ी बिमारी बन गई है. पहले सत्ताधीषों व राजनेताओं ने अपनी सुविधा के लिये चुनाव में बगैर परिश्रम, त्याग, या योग्यता सिद्ध किये जाति को चुनाव प्रचार का हिस्सा बनाया. अब लोगो ने अपनी इस जातिप्रथा को मजबूती से थाम लिया है. जातिवाद दिन व दिन इस प्रकार बढ़ रहा है कि देश की संवैधानिक संस्थाऐं संसद, विधानसभा, न्यायपालिका व प्रशासन सभी उससे प्रभावित हो गये है या हो रहे है.

जातिवाद के वायरस ने अतीत में भी योग्यता को नष्ट किया है और आज भी कर रहा हेै. यह सही है कि जातिवाद कोई आज या 1947 के बाद पैदा नही हुआ बल्कि यह भारतीय समाज व्यवस्था की हजारों नही तो सैकड़ो वर्षो की बीमारी है. इसी जातिप्रथा के कारण भारत को लगभग 300-400 वर्ष बाहरी हमलावरों या शासकों की गुलामी में बिताना पड़े. जातिवाद ने आमतौर पर जन्मना अयोग्यता को योग्यता व श्रेष्ठता में बदला तथा देश की बड़ी आबादी की योग्यता को पनपने का अवसर ही नही दिया.
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