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बलूचिस्तान मुद्दा उठाने के मायने

विचार

 

बलूचिस्तान मुद्दा उठाने के मायने

संदीप पांडे


प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में पाकिस्तान द्वारा उसके स्वतंत्रता दिवस, जो एक दिन पहले मनाया जाता है, को कश्मीर की आजादी को समर्पित करने के जवाब में बलूचिस्तान, गिलगित, बल्तिस्तान व पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के मुद्दे उठाए. .

modi


यह पहली दफा है जब भारत ने बलूचिस्तान का मुद्दा अधिकृत रूप से उठाया है. बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सरकार के प्रति असंतोष है. बलूचिस्तान में आजादी का संघर्ष चल रहा है तो गिलगित-बल्तिस्तान में नागरिक व लोकतंात्रिक अधिकारों की मांग हो रही है.

पाकिस्तान ने जवाब में कहा है कि यह भारत के बलूचिस्तान मामले में दखलंदाजी का सबूत है. भारत में लोगों को इस बाद का बहुत एहसास नहीं है किंतु पाकिस्तान में यह आम धारणा है कि जैसे पाकिस्तान कश्मीर के अलगाववादियों की मदद करता है उसी तरह से भारत भी बलूचिस्तान के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की मदद करता है.

पाकिस्तान में यह भी माना जाता है कि भारत अपनी खुफिया एजेंसी रॉ के माध्यम से अफगानिस्तान की सीमा से बलूचिस्तान के संघर्षरत लोगों के लिए हथियार व अन्य सामग्री भेजता रहता है. हाल ही में क्वेटा में एक आत्मघाती विस्फोट में मारे गए 80 लोगों की घटना के पीछे भारत का हाथ बताया जा रहा है जबकि संभवतः यह हमला तालीबान ने कराया है.

पाकिस्तान में इस तरह की अफवाह उतनी ही आम है जितना कश्मीर में किसी भी हिंसा अथवा भारत में घटित किसी भी आतंकी कार्यवाही के लिए पाकिस्तान को दोषी ठहराया जाता है.

मोदी ने बुरहान वानी की मृत्यु के बाद हुई हिंसा जिसमें 60 से ऊपर लोग मारे जा चुके हैं के लिए पाकिस्तान द्वारा राहत सामग्री की घटिया पेशकश के जवाब में प्रतिक्रिया व्यक्त की है. लम्बे समय से भारत-पाकिस्तान संबंधों में ईंट का जवाब पत्थर से देने की ही परम्परा चली आ रही है. इसमें तो कुछ भी नया नहीं.

बलूचिस्तान को लेकर नई बात यह हुई है कि यदि ये सिर्फ मोदी की प्रतिक्रिया नहीं थी तो भारत को अब बलूचिस्तान, गिलगित, बल्तिस्तान व पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में होने वाले मानवाधिकार हनन के मामलों को जिम्मेदारी के साथ उठाना पड़ेगा.

भारत ने यदि नैतिक आधार पर अपनी भूमिका तय की है तो उसे बलूचिस्तान, गिलगित, बल्तिस्तान व पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के लोगों के साथ भी उसी तरह से खड़े रहना पड़ेगा जैसे कि वह वर्षों से तिब्बती शरणार्थियों के साथ चीन की नाराजगी झेलते हुए भी खड़ा रहा है.

लेकिन फिर सवाल यह खड़ा होगा कि यदि भारत को पाकिस्तानी सेना द्वारा किए जा रहे मानवाधिकार उल्लंघन की इतनी ही चिंता है और वह बलूचिस्तान, गिलगित, बल्तिस्तान व पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की आजादी का समर्थक है तो वह अपने कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन क्यों करता है?

एक सम्प्रभु राष्ट्र के रूप में बिलकुल यह भारत का अधिकार है कि वह संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग को अपने यहां आने की इजाजत न दे लेकिन तभी जब वह अपने लोगों के साथ जिम्मेदारी से पेश आए.

अपने लोगों पर छर्रे वाली बंदूकों का इस्तेमाल करना, जिस भीड़ में महिलाएं व बच्चे भी हों, यह किसी परिपक्व राष्ट्र, जो अपने नागरिकों के मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशील हो की पहचान तो कतई नहीं.

दक्षिण पंथी राष्ट्रवादी मोदी को पाकिस्तान को करारा जवाब देने के लिए बधाई दे रहे हैं किंतु लम्बे समय में इस तरह का आक्रामक रवैया नुकसान ही पहुंचाएगा. यदि हम इस सच्चाई को स्वीकार कर लें कि वार्ता न कि युद्ध से भारत-

पाकिस्तान झगड़े का हल निकलना है तो मोदी हमको दोनों देशों के बीच मैत्री व शांति स्थापित करने से दूर ले गए हैं. इस स्थिति के लिए पाकितानी नेता भी कम जिम्मेदार नहीं हैं जिन्होंने मोदी को उकसाने का काम किया.

एक तरह से मोदी ने वाजपेयी द्वारा किए गए को दोहराया है. वाजपेयी सरकार द्वारा किए गए पोकरण परमाणु परीक्षण से पहले पारम्परिक सैन्य शक्ति में भारत पाकिस्तान से मजबूत स्थिति में था. किंतु परमाणु परीक्षण के बाद युद्धोन्माद की स्थिति पैदा करने से पाकिस्तान को भी अपना परमाणु परीक्षण करने का मौका मिला.

परमाणु हथियारों की होड़ में शामिल होने से लगभग एक जैसी घातक शक्ति हासिल कर लेने के बाद अब दोनों मुल्कों एक-दूसरे को समान रूप से तहस-नहस कर सकते हैं. जब तक भारत ने अपने आप को कश्मीर मामले तक सीमित रखा था तो पाकिस्तान को बाहर से हस्तक्षेप करने वाले के रूप में देखा जाता था और अंतराष्ट्रीय स्तर पर भारत अपने पक्ष में समर्थल जुटाने में कामयाब रहा था.

कश्मीर को भारत का अभिन्न हिस्सा बताने वाली भारतीय भूमिका अब कमजोर पड़ेगी क्योंकि अब दोनों देश एक दूसरे के ऊपर अपने आंतरिक मामले में हस्तक्षेप करने का आरोप लगाएंगे. मोदी ने कश्मीर पर भारतीय दावे की नैतिक स्थिति को कमजोर किया है. चाहें हम स्वीकार करें या न पाकिस्तान ने कश्मीर के लोगों के दिमाग पर कुछ असर तो डाला ही है जबकि भारत का बलूचिस्तान के लोगों से कोई नाता नहीं है. हम बलूचिस्तान में चल रहे संघर्ष को दूर से सिर्फ नैतिक समर्थन देने की ही स्थिति में हैं.

भारत को तमिल नाडू के दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों से इस सवाल का सामना करना पड़ेगा कि श्रीलंका में जब सिन्हाला वर्चस्व वाली सरकार तमिलों का कत्ले आम कर रही थी तो भारत चुप क्यों रहा? श्रीलंका के तमिलों का तो भारतीय तमिलों से सांस्कृतिक रिश्ता है जबकि बलूची लोगों का भारत के किसी भू-भाग के लोगों से कोई रिश्ता नहीं. बलूची ईरान व अफगानिस्तान में रहे रहे बलूची लोगों के साथ मिलकर एक नए मुल्क के सृजन का सपना संजोए हुए हैं.

भारत को नैतिक दृष्टि से बलूचिस्तान, गिलगित, बल्तिस्तान, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के लोगों के मानवाधिकारों का उसी तरह समर्थन करना चाहिए जैसा उसने तिब्बती लोगों का किया है. किंतु उसे श्रीलंका के तमिलों का भी समर्थन करना चाहिए.

यदि कश्मीर के लोगों का दिल जीत पाने में अपनी असफलता को स्वीकार न कर हम कश्मीर में होने वाली हर गड़बड़ी के लिए पाकिस्तान को ही दोषी मानेंगे तो समस्या का हल नहीं निकलेगा. जैसे जैसे कश्मीरी भारत से दूर जाते रहे वैसे वैसे पाकिस्तान की दखलंदाजी वहां बढ़ती गई.

जिस तरह पाकिस्तान द्वारा बलूचिस्तान, गिलगित, बल्तिस्तान, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के लोगों को संतुष्ट न रख पाने के कारण अब भारत को इनका मुद्दा उठाने का मौका मिल गया है. पाकिस्तान और भारत दोनों के ही राजनीतिक नेतृत्व को समझना चाहिए कि हम किसी प्रतिस्पर्धा में शामिल नहीं जिसमें एक दूसरे के खिलाफ युद्धोन्मादी टिप्पणियां कर हमें एक दूसरे को पछाड़ना है.

भारतीय कश्मीर, बलूचिस्तान, गिलगित, बल्तिस्तान, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर व तमिल नाडू में जिंदा लोग रहते हैं. दोनों सरकारों को अपसी सहयोग से इन इलाकों में रहने वाले लोगों की महत्वाकांक्षाओं को संतुष्ट करते हुए यहां समाधान निकालने होंगे.

एक दूसरे को नीचा दिखाने की नीति से हम सिर्फ इन इलाकों में रहने वाले लोगों की जिंदगियां और उनकी संवेदनशीलता को ही दांव पर लगा सकते हैं.

22.08.2016
, 18.30 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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