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अमानवीय पेशे छोड़ें दलित

विचार

 

अमानवीय पेशे छोड़ें दलित

संदीप पांडे


गुजरात में हाल ही में अहमदाबाद से उना, जहां 8 जुलाई को कुछ दलितों को अपमानित कर उनकी इसलिए पिटाई की गई क्योंकि वे एक मृत गाय की खाल निकाल रहे थे, 31 जुलाई से 15 अगस्त के मध्य उना दलित अत्याचार लड़त समिति द्वारा एक यात्रा निकाली गई.
 

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स्वतंत्रता दिवस पर प्रतीक रूप में दलितों ने यह मांग की उन्हें मृत गायों के निस्तारण जैसे अमानवीय पेशों से मुक्त करने के लिए जमीनें आवंटित की जाएं ताकि वे खेती कर, जो अपेक्षाकृत उनके पारम्परिक पेशे से ज्यादा सम्मानजनक पेशा है, अपनी आजीविका चला सकें.

वैसे भी भूमिहीन दलितों को ग्राम पंचायतों द्वारा जमीनों के पट्टे होने चाहिए. अतः कोई नई मांग नहीं की जा रही. बल्कि जो व्यवस्था है उसे ही लागू करने की मांग की जा रही है. जहां कहीं दलितों को जमीनें मिली भी हैं तो कई जगह जमीनों पर उनका कब्जा नहीं है. दलितों की जमीनों पर अतिक्रमण आम बात है. पुलिस-प्रशासन भी सवर्ण-दबंग लोगों, जो दलितों की जमीनों पर काबिज हों, का ही पक्ष लेता है, जैसा कि उसने उना में भी किया जहां पुलिस की उपस्थिति में दलितों की पिटाई हुई.

डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने भूमि के राष्ट्रीयकरण की मांग की थी. चूंकि भूमि हदबंदी कानून लागू होने के बावजूद भूमि सुधार साकार नहीं हुआ है और लोगों को डर है कि अतिरिक्त जमीनें निजी कम्पनियों को दे दी जाएंगी, यह विचार ठीक ही है कि डॉ. अम्बेडकर की भूमि के राष्ट्रीयकरण की मांग को पुनर्जीवित किया जाए. भूमि के समान बंटवारे का कोई तो रास्ता होना चाहिए. इससे दलितों को अमानवीय पेशों के छुटकारा पाने में सहूलियत होगी.

समिति के नवजवान संयोजक जिगनेश मेवानी कहते हैं कि वे आंदोलन को सिर्फ दलितों तक सीमित नहीं रखना चाहते. वे चाहेंगे कि दलित मुक्ति के काम में अन्य प्रगतिशील ताकतें भी सहयोग करें. वे अपने भाषणों में भगत सिंह को उद्धत करते हैं. अंतर्जातीय व अंतर्धार्मिक विवाहों को प्रोत्साहन देने के साथ दलित-मुस्लिम एकता की बात भी कही जा रही है क्योंकि मुसलमान भी गौ रक्षा के नाम पर शिकार हो चुके हैं. बल्कि जब तक हमला सिर्फ मुसलमानों पर था तब तक तो प्रधान मंत्री चुप रहे. जब उना की घटना से भाजपा सरकार की बदनामी होने लगी और आगामी पंजाब व उत्तर प्रदेश के चुनावों में उसका बुरा प्रभाव पड़ने की आशंका दिखी तो नरेन्द्र मोदी ने गौ रक्षकों को फटकार लगाई और उन्हें असामाजिक तत्व तक कह डाला.

किंतु ऐसा प्रतीत नहीं होता कि प्रधान मंत्री के वक्तव्य का गौ रक्षकों पर कोई प्रभाव पड़ा. कर्नाटक में हिन्दू जागरण वेदिके के लोगों ने भाजपा के ही कार्यकर्ता प्रवीण पुजारी, जिसपर गाय को कत्लखाने ले जाने के लिए तस्करी का आरोप लगाया गया, को जान से मार डाला. शायद नरेन्द्र मोदी का गुस्सा दिखाने के लिए ज्यादा और गौ रक्षकों के हमलों को रोकने के लिए कम था. वैसे भी विश्व हिन्दू परिषद एवं अन्य हिन्दुत्ववादी संगठनों ने प्रधान मंत्री के उस बयान की आलोचना की है जिसमें उन्होंने कहा कि 80 प्रतिशत गौ रक्षक रात को असामाजिक काम करते हैं. गौ रक्षक कानून को अपने हाथ में लेने का अपराध तो करते ही हैं. उन्हें भारत के संविधान से ज्यादा अपनी आस्था पर भरोसा है.

दलित अस्मिता यात्रा को गुजरात में अच्छा समर्थन मिला और दलितों को उसने एक मंच प्रदान किया जहां से वे अपने अधिकारों की बात कर सकते थे. मृत गायों को यों ही छोड़ देने का जो विरोध का तरीका उन्होंने चुना वह इस पेशे के दर्द को बयां करता है. मेहसाना जिले के 19 गांवों में दलितों ने इस अमानवीय पेशे को छोड़ दिया है. जब तक उनके बच्चे विद्यालय नहीं जाते तब तक पीढ़ी दर पीढ़ी वे अपने पारम्परिक व्यवसाय में ही फंसे रहेंगे.

अब चमड़े के उत्पाद इस्तेमाल करने वालों को सोचना पड़ेगा कि मृत गाय का चमड़ा कैसे निकालें ताकि चमड़ा उद्योग को कच्चा माल मिल सके. गौ रक्षकों ने गाय के चमड़े का इस्तेमाल विभिन्न उत्पादों के निर्माण के लिए करने का भी विरोध किया है. जब से गुजरात में दलितों ने बड़े पैमाने पर मृत गाय का चमड़ा निकालने से मना कर दिया है सरकार के लिए यह एक बड़ी समस्या बन गई है. वह चमड़ा निकालने व मृत शरीर के निस्तारण हेतु मशीनों का इस्तेमाल कर रही है. चमड़ा उद्योग को गौ रक्षकों केे अति उत्साह से बड़ा खतरा है और भाजपा की सरकार हिन्दू भावना को ठेस भी नहीं पहंुचाना चाहती.

दलितों द्वारा किए जाने वाले अपमानजनक कार्य, जैसे सीवर में उतर कर उसे साफ करना, का तो वर्षों पहले मशीनीकरण हो जाना चाहिए था. दलित अस्मिता यात्रा के समापन से एक दिन पहले हैदराबाद के माधापुर इलाके में चार लोगों की सीवर में घुसने के बाद दम घुटने से मृत्यु हो गई. यह बड़े शर्म की बात है कि आधुनिक युग में जबकि ज्यादातर मेहनत वाले व अपनामजनक कामों का मशीनाकरण हो गया है सीवर नालियों की सफाई हेतु कोई प्रौद्योगिकी सहज उपलब्ध नहीं है और हम जिंदा इंसान को सीवर नाली में उतरने के लिए मजबूर करते हैं. दलितों को इस काम से भी मुक्ति मिलनी चाहिए.

जब दलितों को उपर्युक्त अमानवीय पेशों से मुक्ति मिलेगी तभी उनके बच्चों को शिक्षा के उपरांत अन्य सम्मानजनक वैकल्पिक पेशों से जुड़ने का मौका मिलेगा. जहां दलितों को मौका मिला है वहां उन्होंने अपमानजनक पेशों को छोड़ा है. किंतु दलित परिवारों के साथ दिक्कत यह है कि वे इतनी गरीबी में जीते हैं कि वे वैकल्पिक पेशों के बारे में सपना भी नहीं देख सकते. शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009, भी सभी दलित बच्चों को विद्यालय में नहीं खींच पा रहा है.

जब 2015 में 23 वाल्मीकि व 8 मुस्लिम बच्चों को इस अधिनियम के तहत लखनऊ के सबसे चर्चित विद्यालय सिटी मांटेसरी स्कूल में दाखिले का आदेश हुआ तो विद्यालय ने उन्हें दाखिला न देने के लिए ऐड़ी चोटी का जोर लगा दिया. न्यायालय के आदेश से 13 वाल्मीकि बच्चों का दाखिला अंततः हुआ. स्कूल इस वर्ष भी इन बच्चों से छुटकारा पाना चाह रहा था.

सर्वोच्च न्यायालय ने जगदीश गांधी को फटकार लगाकर कहा कि बच्चे कोई फुटबाल नहीं कि वे जब चाहें उन्हें इस स्कूल से उस स्कूल में भेज दें. समाज के संभ्रांत वर्ग ने गरीब बच्चों के रास्ते में कदम कदम पर व्यवधान उत्पन्न कर उनकी जिंदगी को नर्क बना दिया है.

31.08.2016, 19.39 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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