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उरी हमले से सबक ले सरकार

विचार

 

उरी हमले से सबक ले सरकार

रघु ठाकुर


जम्मू कश्मीर के उरी में पिछले दिनों जो सैन्य केन्द्र पर आंतकवादी हमला हुआ वह पाक द्वारा एक नियोजित हमला था. इस हमले में भारतीय सेना के 18 जवान जो केम्प में विश्राम कर रहे थे वे ग्रेनेड से भारे गये. इन सोते हुये जवानो को नींद से जगने का अवसर तक नही मिला और इस धोखे की मौत के शिकार हो गये. भारतीय सेना के केन्द्र पर यह आंतकवादी हमला कोई पहली बार नही हुआ है बल्कि कुछ माह पूर्व पठान कोट के सेना केन्द्र पर भी आंतकी हमला हुआ था, जिसमें अनेकों जवान मारे गये थे.
 

उरी

पठान कोट के आंतकी हमले के समय भी प्रधानमंत्री से लेकर सरकार, के रक्षामंत्री के बयान पढ़ने को मिले थे कि अब बर्दास्त नही किया जायेगा. जॉच भी बिठाई गई थी परन्तु आज तक जॉच की रपट और उसके निष्कर्ष देश के समक्ष नही रखे गये.

हमारे देश की संसद राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषय पर कितनी गम्भीर है इसका प्रमाण इससे मिल जाता है कि पठानकोट हमले इसकी जॉच रपट और उसके बाद सुरक्षा के उठाये कदमो के बारे में कोई चर्चा भारत की संसद में नही हुई.


उरी बेस पर आंतकी हमला कई कारणो से अत्यंत चितांजनक है -
1. सैन्य गुप्तचर शाखा और राजनैतिक गुप्तचर संस्थाये गोपनीय सूचनाओं को इकठ्ठा करने को करोडो रुपये खर्च करती है. जिनका खर्च भी गोपनीय रखा जाता है परन्तु शायद ही कभी कोई ठोस सूचनायें इन संस्थाओं ने सेना को दी हो. परम्परा के तौर पर एक चलताऊ सी सूचना भेज दी जाती है कि सीमा पर आंतकवादी हमला हो सकता है. ये सूचनायें लगभग मौसम विभाग की भविष्य वाणी जैसी होती है. जिस प्रकार मौसम विभाग घोषणा करता है कि इस बार मानसून जल्दी आ सकता है समय पर आयेगा और फिर मानसून डे़ढ माह विलम्ब से आ सकता है तो सफाई देता है कि बीच में अल नेनो आ गया.

2. उरी सैन्य केन्द्र की सुरक्षा व्यवस्था इतनी कमजोर क्यों थी कि आंतकवादी सीमा पार कर केन्द्र के पास तक पहॅुच गये. थोड़ी देर को कल्पना करें कि उनके पास अगर कोई और मारक हथियार बम होते तो क्या स्थिति होती?

यह सुरक्षा की चूक कोई मामूली चूक नही है. उरी घटना के बाद समाचार पत्रों में निरंतर बैठको और रिपोटो के समाचार छप रहे है. प्रधानमंत्री ने शिष्टाचार बतौर सर्वदलीय बैठक बुलाई. वह भी महज औपचारिक थी. सोशल मीडिया और मीडिया पर एक प्रकार से राजनैतिक संघर्ष जारी है जो सरकार समर्थक लोग है वे एक प्रकार के दुस्साहस के साथ यह कह रहे है कि सरकार को बदला लेना चाहिये, युद्ध करना चाहिये. एक भारतीय जवान के बदले में 10 पाकिस्तानी सिर लाना चाहिये.

हालांकि यह भी एक तथ्य है कि पाक जवानो के सिर आयें या न आये ये मित्र सरकार के साथ ही खड़े रहेंगे. हमारे देश के गृहमंत्री श्री राजनाथ सिंह जी ऐसे जुमलो का इस्तेमाल करते रहे है कि पहली गोली हम नही चलायेगे परन्तु वाद में गिनती नही गिनेगे. आम सभाओं में ऐसे भाषणों से लोग उत्साहित होकर ताली बजाते है, परन्तु जमीन पर ऐसे जुमलो का कोई अर्थ नही होता.

मीडिया-वाद के अस्त्र के रुप में एक प्रचार यह भी चलाया जा रहा है कि पाकिस्तान विष्व समुदाय से अलग-थलग पड़ गया. इसमें कोई दो-मत नही है कि इस समय यूरोप, और अमेरिका, इस्लामिक कटटर पंथ के शिकार और उससे अशंकित है. और इसलिये फांस,जर्मनी, ब्रिटेन, अमेरिका, पाक आंतकवाद के खिलाफ है और भारत के साथ है.

रुस के राष्ट्रपति श्री पुतिन को बधाई दी जाना चाहिये कि उन्होंने तुरंत निर्णय कर रुस, और पाक के संयुक्त सैन्य अभ्यास को रोक दिया. परन्तु ऐसा कोई राजनैतिक निर्णय अभी तक यूरोप, अमेरिका, की ओर से घोशित नही हुआ. जहॉ तक पाकिस्तान को उपदेश देने का सवाल है तो अमेरिका यह उपदेश वर्षानुवर्ष से दे रहा है और सभी यह जानते है कि ऐसे उपदेशों से कुछ हल नही निकलता. दूसरे भारत को अपनी समस्या का हल स्वतः करना होगा.

देश के राजनैतिक धड़ो का एक हिस्सा जो भीतर से इस्लामिक कटटरपंथ से या हिंसक अंादोलन और संगठनो से मधुर रिष्ते रखते है सदा के अनुसार हिंसा और अंहिसा की बहस शुरु कर देते है. वे आंतकवाद, हिंसा के सार्वजनिक रक्षक बन जाते है तथा कई प्रकार के तर्को से सारे मुद्दो और बहस को मोड़ने और धार विहीन बनाने का प्रयास करते है. मैं सदैव भारत, पाक के रिश्तों और महासंघ का समर्थक रहा हॅू परन्तु मैं यह भी स्पष्ट तौर पर कहता हॅू कि अहिंसा में विश्वास रखते हुये कई बार ऐसे अवसर आ सकते है जब अहिंसा प्रभावकारी न हो.

आखिर भारत कब तक ऐसे हमलो का शिकार होता रहेगा और क्या अंहिसा के पाठ से कुछ हल निकल सकता है? यह अंहिसा के छदम् समर्थक जो समूची दुनियॉ में अनेक युद्वों के समर्थक रहे है यह तर्क देते है कि युद्ध के समर्थको को सीमा पर जाकर लड़ना चाहिये. यह हास्य व्यंग हो सकता है. चुटकुले वाजी हो सकती है परन्तु मूल प्रष्न के विपरीत है? क्या दुनिया में हर युद्ध का समर्थन करने वाले स्वतः युद्ध लड़ने जाते है या जाना चाहिये?

युद्ध के भी अनेक हिस्से होते है. जिनमें देश को अपने अपने ढ़ंग से सहयोग मिलता है. जब सीमा पर जाने वाले जवानो को माता-बहनें राखी बांधकर या सत्कार के साथ विदा करती है तो उत्साह वर्धन होता है. जो लोेग ऐसे अवसरो पर राष्ट्रीय कोष को सहयोग करते है वह भी एक प्रकार से युद्ध में सहभागिता होती. मैं नही कह रहा हॅं कि युद्ध ही करना चाहिये या युद्ध नही करना चाहिये. यह निर्णय हमें सरकार और सेना पर छोड़ देना चाहिये जो इसका बेहतर निर्णय कर सकती है. परन्तु अब हमें समस्या का अगर स्थाई नही तो दीर्घ कालिक हल खोजना होगा.

मेरी समझ है कि भारत सरकार ने बलूचिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर के प्रष्न का जिस ढ़ंग से दुनिया के समक्ष उठाया है वह एक सफल कूटनीति है. परन्तु इतने मात्र से ही संतुस्ट हो जाना हल नही है. हम लोग कारगिल युद्ध की चर्चा करते है (हांलाकि मेरी राय में कारगिल कोई युद्ध नही था बल्कि देर से उठाया गया एक रक्षात्मक और कुंठाग्रस्त कदम था)

जब वाजपेयी सरकार ने अन्तरराष्ट्रीय दबाव में उन घुसपैठियो को सुरक्षित वापिस जाने की अनुमति दी थी, जो चारो और से घिर चुके थे और जिनके के गोला बारुद खत्म हो चुके थे. तब यह एक भयानक भूल थी. परन्तु तत्कालीन सरकार ने अपनी कमजोरी और भूल को छिपाने के लिये मीडिया के माध्यम से कारगिल युद्ध का आक्रमक प्रचार चलाया. मरने वाले जवानो को भारी भारी सरकारी मदद की घोषनायें कर देश में एक कृत्रिम वातावरण बनाया और देश उसमें बह गया.

ऐसी ही घटना तब हुई थी जब तत्कालीन प्रधानमंत्री के द्वारा संसद पर आंतकी हमले के बाद आरपार के जुमलो का इस्तेमाल कर भारतीय सेना को कई महीनो तक सीमा पर तैनात रखा गया था और फिर बगैर किसी कार्यवाही के वापिस बुला लिया गया था. उस घटना से देश और सेना का मनोबल बहुत गिरा था. सरकारो और सरकारी दलो की राजनीति का या तो युद्ध उन्माद तैयार नही करना चाहिये अन्यथा फिर युद्ध का साहस करना चाहिये .

यह सवाल हिंसा अंहिसा का नही बल्कि देश की सुरक्षा और स्थायित्व का है जिसके साथ कोई भी खिलवाड़ करना एक राष्ट्रीय अपराध है.

23.09.2016, 20. 15 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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