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गाँधी का उत्तराधिकारी कौन

बहस

 

गांधी का उत्तराधिकारी कौन

राम पुनियानी

 

अभी हाल में भाजपा अध्यक्ष श्री राजनाथ सिंह ने कहा कि गाँधीवादी मूल्य अब केवल संघ परिवार में जिन्दा बचे हैं. उन्होंने यह भी फरमाया कि आरएसएस-भाजपा और संघ परिवार के अन्य संगठन गाँधीजी के काम को आगे बढ़ा रहे हैं.

गांधी जी


इस दावे से बड़ा झूठ क्या कुछ हो सकता है? इस दावे के खोखलेपन का सबसे बड़ा सुबूत तो यह है कि गाँधीजी का हत्यारा एक प्रशिक्षित आरएसएस प्रचारक था. गाँधीजी की हत्या इस आरोप में की गई थी कि वे मुसलमानों का तुष्टिकरण कर रहे हैं. इसके कई दशक बाद आरएसएस प्रमुख राजेन्द्र सिंह ने कहा कि गोडसे के “लक्ष्य'” तो उचित थे परंतु लक्ष्य प्राप्ति के “साधन” गलत थे.

आरएसएस ने कभी यह स्वीकार नहीं किया कि नाथूराम गोडसे संघ प्रचारक था. गोडसे का भाई गोपाल गोडसे, जो गाँधीजी की हत्या के षड़यन्त्र में शामिल था, ने बिना किसी लाग-लपेट के लिखा है कि “ वे (गाँधी) अपनी तुष्टिकरण की नीति सभी कांग्रेस सरकारों पर लाद रहे थे और इसी ने मुसलमानों को अलगाववादी आंदोलन शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया और अंतत: पाकिस्तान बन गया. तकनीकी और सैद्धांतिक अर्थों में वे (नाथूराम) सदस्य (आरएसएस के) थे परंतु बाद में उन्होंने आरएसएस के लिए काम करना बंद कर दिया था. उन्होंने अदालत में यह इसलिए कहा कि उन्होंने संघ छोड़ दिया है ताकि संघ के कार्यकर्ताओं को गिरफ्तारियों से बचाया जा सके. चूंकि वे समझते थे कि वे (संघ कार्यकर्ता) उनके, स्वयं को संघ से अलग कर लेने से सुरक्षित रहेंगे, इसलिए उन्होंने खुशी-खुशी ऐसा किया.”

आरएसएस की विचारधारा का केन्द्रीय तत्व है “हिन्दुत्व”, जो ब्राहम्णवादी और पितृसत्तात्मक मूल्यों पर आधारित है. उसमें जाति और लिंग के आधार पर भेदभाव को मान्यता है. “हिन्दुत्व”, आर्य नस्ल, ब्राहम्णवादी संस्कृति और संस्कृत भाषा को श्रेष्ठतम मानता है. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम-जो दुनिया का सबसे बड़ा जनांदोलन था; से संघ ने न केवल दूरी बनाए रखी वरन उसकी निंदा भी की. सन् 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान तत्कालीन संघ प्रमुख गुरू गोलवलकर ने न केवल अपने समर्थकों को आंदोलन में भाग न लेने की सलाह दी वरन् सभी शाखाओं को सर्कुलर जारी कर यह निर्देश दिया कि ऐसा कुछ भी नहीं किया जाना चाहिए जिससे अंग्रेजों को कोई परेशानी हो.

गाँधीजी के विचारों का मूल तत्व था भारतीयता के धागे में सभी देशवासियों को पिरोना. आरएसएस का फोकस संकीर्ण, साम्प्रदायिक, हिन्दू राष्ट्र पर है. इस अर्थ में संघ के “हिन्दू राष्ट्र ” और मुस्लिम लीग की “इस्लामिक राष्ट्र” की परिकल्पनाओं में बहुत समानता है. आरएसएस ने मुसलमानों के प्रति घृणा फैलाई और मुस्लिम लीग ने हिन्दुओं के प्रति. नतीजा था भयावह साम्प्रदायिक हिंसा. और इसने हमारे ब्रिटिश शासकों को “ बांटो और राज करो” की अपनी नीति को लागू करने का भरपूर मौका दिया. अंतत: भारत विभाजित हो गया और साम्प्रदायिक हिंसा के दानव ने एक बार फिर हजारों निर्दोष पुरूषों, महिलाओं और बच्चों की बलि ले ली.

गाँधीजी, संघ की विध्वंसात्मक विचारधारा से भली-भाँति परिचित थे. एक बार जब वे आरएसएस की शाखा के पास से गुज़र रहे थे तो उनके काफिले के किसी सदस्य ने उनसे कहा कि देखिए, आरएसएस कितना अनुशासित संगठन है. जवाब में गाँधीजी ने कहा कि जर्मनी के नाज़ी और इटली के फासिस्ट भी इतने ही अनुशासित हैं. गाँधीजी की इस टिप्पणी का सच आज हम सबके सामने है.

सच तो यह है कि गाँधीजी और संघ के विचार परस्पर विरोधी हैं. गाँधीजी का भारत धर्मनिरपेक्ष था, जिसमें धर्म हर व्यक्ति का निजी मसला था. संघ ने केवल धर्म के आधार पर घृणा फैलाई जिसका नतीजा देश को साम्प्रदायिक हिंसा के रूप में भुगतना पड़ा. गाँधीजी का उद्धेश्य साम्प्रदायिक सद्भाव की स्थापना और साम्प्रदायिक हिंसा को रोकना था. संघ का काम फिरकापरस्ती फैलाना है और वो हिंसा को भी उचित ठहराता है.

गाँधीजी के शब्दों में “ उस भारत, जिसे बनाने के लिए मैंने जीवन भर काम किया है, में सभी लोग- चाहे वे किसी भी धर्म के हों-बराबर होंगे. राज्य को पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष होना होगा ” (पृष्ठ 87, गाँधी एण्ड कम्यूनल हारमोनी, सीएसएसएस, 1994). वे यह भी कहते हैं, “ धर्म, राष्ट्रीयता का पैमाना नहीं है. वो तो व्यक्ति और उसके भगवान के बीच का निजी मसला है”. और, “ धर्म हर व्यक्ति का निजी मामला है और धर्म का राजनीति और देश के मसलों से घाल-मेल नहीं होना चाहिए.”

जहाँ संघ परिवार मंदिर बनाना चाहता है वहीं गाँधीजी देश को बनाना चाहते थे. वे मंदिर निर्माण नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण में रूचि रखते थे.


महात्मा गाँधी बहुत धार्मिक थे परंतु वे कभी मंदिर-मस्जिद के झगड़ों में नहीं पड़े.

आरएसएस लॉबी चाहती थी कि सरकार सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करे. गाँधीजी का मत था कि हिन्दू समुदाय मंदिर बनाने में सक्षम है और सरकार को इस पचड़े में नहीं पड़ना चाहिए. जहाँ संघ परिवार मंदिर बनाना चाहता है वहीं गाँधीजी देश को बनाना चाहते थे. वे मंदिर निर्माण नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण में रूचि रखते थे.

गाँधीजी धार्मिक पहचान से जुड़े मुद्दों से दूर रहते थे.
आडवानी बैंड पूरे समय राम मंदिर की धुन बजाता रहता है. अहिसा और साम्प्रदायिक सद्भाव गाँधीजी के सिद्धान्त, मूल्य और लक्ष्य थे. संघ, घृणा और हिंसा की नींव पर हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहता है. गाँधीजी और आरएसएस दो विपरीत ध्रुव हैं और श्री राजनाथ सिंह एण्ड कम्पनी के कुछ भी कहते रहने से यह सच नहीं बदल सकता.

 

20.02.2009, 05.56 (GMT+05:30) पर प्रकाशि

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

tyagi ()

 
 पुनियानी जी, आप धर्म परिवर्तन क्यों नहीं करवा लेते ?  
   
 

dixit (bijayamd@gmail.com) US

 
 पुनियानी जी,
आप को गांधी की हत्या का जितना दर्द है, उससे कहीं ज्यादा दर्द गोडसे को उन करोड़ों हिंदूओं की दुर्दशा, हत्या, बलात्कार की चिंता थी, जिसकी कोई चिंता गांधी-नेहरु को नहीं थी. गांधी की आत्मकथा में उनके सेक्स जीवन की अपनी गाथा है.

Who was responsible for the partition of India and the horror faced by trillions of Hindus, all over Pakistan? Without any homework Pakistan was created. There was no clear demarcation of the territory. British did population survey all over India but after the creation of Pakistan how many Hindus were butchered or fled to India?

Nehru government did not publish the data and we know nothing about the exact refugees migrated from Pakistan or millions of those who were butchered. India kept more Muslims than in Pakistan to always use them as a vote bank for Nehru dynasty, why?? As a Hindu you have no pity for the millions who were brutally murdered, raped and tortured; were compelled to leave their native land? Who were responsible and was the main culprit for those human atrocities horrors and tragedy?

In 1857 British crushed the revolution, ruled with iron fist and in 1947 they gave up without firing a shot? It’s because Britain was completely destroyed economically and more than fifty percent of its population were lost in WWII. British were not able to retain their colonies due to lack of resources and manpower. Netaji Subash Chandra Bose fought with handful of POWs and won the battle with the British army in Imphal. This gave a clear message to the Indian army, why they were fighting for the British and slowly Indian Army was on the verge of revolt.

Twenty thousand marine soldiers’s disobeyed British command but Nehru-Gandhi urged British to compel them to surrender. British intelligence reported that the massive Indian Army which was well equipped and prepared for WWII were no longer loyal to the British command, that's why British left India honorably. Granting Swaraj not full freedom in 1947.

If you have guts produce the accord signed between Indian National Congress and the British in which you have promised that Indians will always be loyal to the British crown and its people; Netaji Subash Chandra Bose was declared a traitor and "will be handed over to the British government when ever and where ever he be arrested". Please convince UPA government to publish all the historical documents about Swaraj. If you cannot publish historical documents, rather sing your tune, it will further prove that you are quite cunning in fabricating the history!
 
   
 

Om Prakash Pal (omi_pal@yahoo.co.in) Indore

 
 प्यारे देशवासियों, गांधी जी और गोडसे जी दोनों चले गये. अब इंसानियत के नाते देशहित में बातें करो, भ्रष्टाचार से लड़ो, आतंकवाद से लड़ो, लोगों को शिक्षित करो तो कोई बात बने और हमारा प्यारा देश महान बने. जय भारत, जय जवान,जय किसान,जय विज्ञान, जय हिंद. 
   
 

A.K.SHARMA (anilsharma83@yahoo.co.in) CHANDIGARH

 
 ऐसा प्रतीत होता है कि राम पुनियानी संघ परिवार से घृणा में इतने अंधे हो गये हैं कि इतिहास को ही भूल गये. ऐतिहासिक तथ्य है कि नाथूराम गोडसे का गांधी जी से कोई व्यक्तिगत विद्धेष नहीं था. गोडसे जैसे भारत माता के परम भक्तों ने गांधी जी की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीतियों को बहुत सालों तक सहन किया. किंतु जब गांधी जी ने सरदार पटेल द्वारा 55 करोड़ रुपये देने से इंकार करने पर मरण व्रत रखने की धमकी दी तो राष्ट्रभक्तों से सहन नहीं हुआ औऱ उनको गांधी जी को देश के व्यापक हितों के विरुद्ध आचरण की सज़ा देनी ही पड़ी.

राम पुनियानी गोडसे को संघ परिवार का सदस्य बताकर माननीय उच्चतम न्यायालय की भी अवमानना कर रहे हैं, क्योंकि माननीय उच्चतम न्यायालय ने संघ परिवार को निर्दोष करार दे दिया था. जहां तक गांधी और गोडसे का संबंध है तो वास्तविकता के धरातल पर अगर निरपेक्ष विश्लेषण किया जाये तो साबित होगा कि गांधी जी ने पाकिस्तान की खातिर प्राण गंवाये और गोडसे देश हित में शहीद हुये.

ये बात और है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद कांग्रेस सत्ता में आई और उन्होंने गांधी जी को देश का शहीद बना दिया और गोडसे को गांधी जी का हत्यारा करार दे कर फांसी पर लटका दिया. आने वाला समय जब इतिहास का निरपेक्ष विश्लेषण करेगा तो शायद इंसाफ हो सके.
 
   
 

laxminarain sharma (laxminarain.sharma@yahoo.com) kotputli

 
 thanks for your article and suggest that may kindly be aware the nation for the fasist and others. 
   
 

Omprakash pal (pal.omprakash1@gmail.com) Delhi

 
 पुनयानी जी धन्यवाद,
हिंदुस्तान में भगवा मंडली के लोग ही हैं जिन्होंने बार बार गांधी को मारा, उनके विचारों को गलत तरीके से पेश करने की कोशिश की. पहली बार उन्होंने जान से मारा, दूसरी बार हिंसा, बलात्कार, दंगे जैसी घटनाओं को गांधी के गुजरात में अंजाम देकर उनके सिद्धांतों की बलि चढ़ाई और अब उनका नाम लेकर दिल्ली फतह करना चाहते हैं. लेकिन जनता गांधी के हत्यारों के ठीक ठीक पहचानती है जिस प्रकार RSS द्वारा बार बार इनकार करने के बावजूद जनता के हत्यारों को पहचानने मे कोई गलती नहीं कग ठीक उसी तरह आडवाणी जी को पीएम बनाने के लिए गांधीजी.... RSS की साजिश को भी जनता समझने में कोई गलती नहीं करेगी.
Thanks
Omprakash Pal
Mob : 09868655109
 
   

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