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सुर्खियों के पीछे मौजूद कश्मीर

विचार

 

सुर्खियों के पीछे मौजूद कश्मीर

प्रीतीश नंदी


बरसों पहले जब दुनिया काफी युवा, ताज़ा और नई थी, हवा में कविताएं थीं, बहुत सारा जादू और संगीत था; हम इस विश्वास के साथ बड़े हुए कि अपने शब्दों और गीतों से जैसे हम थे, उसे बदल देंगे और हमने बड़ी शिद्‌दत, तड़प के साथ इसके लिए प्रयास किए.
 

कविता

इमुझे श्रीनगर का युवा कवि याद आता है, जो मुझे लगातार लिखता रहता था. मैं गाहेबगाहे जो छोटी-सी कविता की पत्रिका प्रकाशित करता था, उसके लिए अपनी कविताएं भेजता रहता था. कवियों में यह आदत होती है कि वे दूसरों तक पहुंचते हैं, संपर्क बनाते हैं और उन्हें अपनी रचनाओं में साझीदार बनाते हैं. उन दिनों बहुत कम प्रकाशक हुआ करते थे. कविताओं के प्रकाशक तो और भी कम थे. उंगलियों पर गिनने लायक. इसलिए हर व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को खोजकर अपनी रचनात्मकता से वाकिफ कराता था.

जब मैं कुछ पैसा जोड़-जुड़ा लेता तो कभी-कभार काव्य पत्रिका का प्रकाशन हो जाता और उन कविताओं में से कुछ का प्रकाशन मैं कर देता था. तब इंटरनेट नहीं था, इसका सवाल नहीं था. इसलिए यह पत्रिका छोटी, लेकिन विचारोत्तेजक मंच बन गई अौर कई कवियों को उसने पहला मौका दिया. साल गुजरते गए तथा हमारी इस छोटी-सी पत्रिका के पाठक बढ़ते गए और कवि प्रसिद्ध हो गए. अन्य बड़े प्रकाशकों ने उन्हें हाथोंहाथ ले लिया.

लेकिन उस युवा कश्मीरी कवि में मोह लेने वाली, पढ़ने वाले को बांध लेने वाली कोई बात थी. उसकी पंक्तियों में उदासी मौजूद होती थी. उसमें उम्मीद भी होती पर प्राय: उदासीन-सी. उनमें गहरी उदासी, विषाद और तड़प, हसरत होती. मुझे उसकी कविताएं इतनी पसंद आने लगीं कि मैं उसके पत्रों के आने का इंतजार करने लगा, क्योंकि हर पत्र अपने साथ नई कविताएं लेकर आता.

उसके शब्दों, उसकी आंखों से मेरे सामने वह कश्मीर उजागर होने लगा, जिसका मुझे कुछ पता नहीं था. यह कश्मीर उस कश्मीर से बहुत अलग था, जो मैंने फिल्मों में देखा उबाऊ होने की हद तक सुंदर, पिक्चर पोस्टकार्ड पर नज़र आने वाला कश्मीर. आगा शाहिद अली का कश्मीर भी सुंदर था, लेकिन उसमें एक कसक थी.

उनकी कविताएं भी भिन्न थीं. वे शांत, अपने भीतर कुछ खोजने वाले और व्यथित व्यक्ति थे और मैं क्रोधित, बगावती, हमेशा दुनिया को चुनौती देने, उसका सामना करने को तैयार. इसलिए चाहे हम एक ही भाषा में लिखते थे, एक ही पीढ़ी के हिस्से थे और एक ही राष्ट्र के नागरिक थे,

लेकिन ऐसे लगता जैसे हम दो अलग दुनियाओं के वाशिंदे थे. उनकी मातृ-भाषा उर्दू थी और मेरी मातृ-भाषा बंगाली थी. लेकिन हम दोनों अंग्रेजी में लिखते थे, एक ऐसी भाषा जिस पर भारतीय होने के नाते हम दोनों दावा करते थे.
बंगाल उस समय उबल रहा था. कश्मीर शांत था या कम से कम ऐसा दिखाई तो देता था. निश्चित ही वह सुर्खियों में तो कतई नहीं था. इसके बाद भी उनकी कविताएं अपने लोगों की मनोव्यथा-पीड़ा व्यक्त करतीं. उनके अलगाव को बयां करतीं. तब के कलकत्ता (अब कोलकाता) में एक अलग ही प्रकार का अलगाव हो रहा था. नक्सलबाड़ी आंदोलन ने हमारी जिंदगियों को चीरकर रख दिया था.

मेरे स्कूल-कॉलेज के कई साथी नई राजनीति की तलाश में ग्रामीण इलाकों में जाकर लुप्त हो गए थे. मैंने भी कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज को छोड़ दिया था और चाहे मैं दो जून की रोटी की जुगाड़ के लिए संघर्ष कर रहा था, मुझे यह अच्छी तरह पता था कि मेरी नियति लिखे हुए शब्दों की अंधेरी, हताशा व जोखिमभरी दुनिया में कहीं है. मैं बेतहाशा लिखता जाता. प्रेम की कविताएं, गुस्से से भरी कविताएं और विरोध में लिखी कविताएं.

मैं खुशकिस्मत था कि मुझे ऐसे प्रकाशक मिल गए, जो मेरी किताबें प्रकाशित करने को तैयार थे, लेकिन मैं जानता था कि दूसरों के लिए यह आसान नहीं है. इसलिए मैं कोशिश करता था कि वे जितनी प्रकाशित हो जाएं उतना अच्छा. मुझसे जितना संभव होता उतनी प्रकाशित करता. फिर आपातकाल का दौर आया. हमारी जिंदगियां बदल गईं. कवि और लेखक जेल में डाल दिए गए. मैं पत्रकारिता की ओर मुड़ गया और इस तरह उस कश्मीरी कवि आगा शाहिद अली से संपर्क टूट गया.

आज जब कश्मीर कई-कई दिनों तक बंद रहता है तथा घाटी के लोगों और उनकी दुखद, अधूरी जिंदगियों पर शासन करने की इच्छा रखने वाले लोगों के बीच संघर्ष में इतनी जिंदगियां जा रही हैं तो मुझे आगा शाहिद अली के शब्द याद आते हैं. क्योंकि वे चाहे श्रीनगर छोड़कर पढ़ाने और लिखने के लिए अमेरिका चले गए वे कश्मीर की मौलिक आवाजों में से एक बने हुए हैं.

उनके गुजर जाने के 15 वर्षों बाद भी उनके शब्द मेरे साथ हैं. उनकी गहरी उदासी भरी कविताएं आज भी मेरा पीछा करती हैं, क्योंकि वे जानते थे कि कश्मीर कैसा दर्द भुगत रहा है, उससे बहुत पहले जब हमने घाटी का दर्द जानने की कोशिश शुरू की.

आइए उन्हें सुनें:


मैं फिर इस देश में लौटा हूं
जहां एक मीनार दफ़्न कर दी गई है.
कोई दिये की बाती को सरसों के तेल में भिगोता है
हर रात चढ़ता है इसकी सीढ़ियां
ग्रहों पर उकेरे गए संदेशों को पढ़ने के लिए.
उसकी उंगलियों के निशान बैंक के सील को
अभिशप्त पतों वाले पत्रों के संग्रहालय में खारिज करते हैं, हर घर दफ़्न या उजाड़.
उजाड़? क्योंकि इतने लोग पलायन कर गए हैं, भाग गए हैं और वहां, मैदानों में शरणार्थी बन गए हैं
जहां उन्हें ओस के बनने की अभिलाषा करनी ही होगी ताकि पर्वत कांच में बदल जाए.
वे उनमें से हमें देखेंगे- देखेंगे पागलों की तरह मकान दफ़्न करते हुए, उस आग से बचाने के लिए
जो किसी दीवार की तरह ढहती है. सैनिक इसे प्रज्ज्वलित करते हैं, ज्वाला तेज करते हैं,
हमारी दुनिया किसी सुनहरी लुगदी की तरह जलती है, फिर राख हो जाती है.


कविता का यह अंश उनके काव्य संकलन ‘द कंट्री विदाउट ए पोस्ट ऑफिस’ से लिया है. अब पोस्ट ऑफिस तो होते नहीं. अब हम ई-मेल पर बतियाते हैं, लेकिन कश्मीर में इंटरनेट बंद रहता है. हर रोज आवाजें मौन कर दी जाती हैं.
 

01.08.2015, 19.39 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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