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युद्ध के विरुद्ध

विचार

 

युद्ध के विरुद्ध

रघु ठाकुर


लगभग 50 वर्ष पूर्व समाजवादी नेता स्व. लोहिया ने उत्तर प्रदेश के ललितपुर शहर के अपने एक भाषण में दुनिया के समक्ष एक प्रश्न प्रस्तुत किया था और जो प्रश्न, मात्र प्रश्न नही बल्कि एक लक्ष्य तथा आशा का संकेत था. ’’लोहिया ने कहा था कि ’’इस सदी की दो महान घटनायें है - एक एटम - एक गॉंधी, देंखे किसकी जीत होती है.’’

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लोहिया ने यह प्रश्न जापान में अमेरिका द्वारा अणुबम के विस्फोट के बाद और महात्मा गॉंधी के दक्षिण अफ्रीका से लेकर भारत तक अहिंसात्मक सत्याग्रह के सफल प्रयोग के बाद किया गया था. जब दुनिया जापान में अणु अस्त्रों की विभीषिका को देख चुका था. हालांकि दुनिया में युद्ध और हथियार समर्थक शक्तियॉ तब भी सक्रिय थीं और गॉंधी का अहिंसक प्रतिरोध का अस्त्र भी जहॉं तहॉं प्रयोग में लाया जा रहा था.

निस्संदेह लोहिया चाहते थे कि गॉंधी की जीत हो याने अहिंसात्मक प्रतिरोध की जीत हो और हिंसा व युद्ध परास्त हो. यह वह दौर था जब विश्व शीत युद्ध की जकड़न में था और अमेरीका और रूस, ये दो प्रमुख, प्रतिद्वंदी सैनिक खेमे थे.

यद्यपि 1986-87 में रूस के बिखराव के बाद दुनिया लगभग दो दशकों से एक धु्रवीय दुनिया में बदली. परन्तु युद्ध के अस्त्रों के निर्माण और युद्ध तथा हिंसा के विचार में कोई बदलाव नही आया है. जब वियतनाम पर अमेरीका नये नये किस्म के हथियार चला रहा था और नापाम जैंसे बमों का प्रयोग कर रहा था तब वामपंथी, साम्यवादी, रूस और चीन, वियतनाम के सैन्य सहयोगी थे, और समर्थक भी थे. परन्तु वे हिंसा या युद्ध के खिलाफ नही थे.

स्वहित के लिये युद्ध करना, अपने खेमे या समर्थक के लिये युद्ध के बजाय युद्ध का सैन्य सहयोगी बनना यह भी उतनी ही हिंसा समर्थक विचारधारा है जितनी की युद्ध करना. निशस्त्रीकरण और युद्धरहित दुनिया का मतलब एक ऐंसी दुनिया से है जिसमें हिंसा या शक्ति, हथियार या दमन का कोई स्थान न हो बल्कि मानवीय अस्तित्व और मानवीय गरिमा, मानवीय समता और हिंसा के विचार से मुक्ति ही वास्तविक लक्ष्य होना चाहिये. परन्तु दुनिया की विषमता या दुनिया की संपन्नता का बड़े पैमाने पर संबंध हिंसा हथियार और युद्ध के साथ है.

आज दुनिया के जो संपन्न और शक्तिशाली देश है, उनकी संपन्नता का बड़ा कारण युद्ध और हथियार का व्यापार है. युद्ध भी एक व्यापार है जिसकी तैयारी के लिये मानसिक तौर पर दुनिया को तैयार करने के लिये मीडिया और प्रचार का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है. युद्ध के लिये वातावरण तैयार करने को वैश्विक झूठ का सहारा लिया जाता है ताकि युद्ध के तर्क गढ़े जा सकें.

जिस प्रकार ईराक में विघ्वंसक हथियारों की उपस्थिति का प्रचार किया गया ओर फिर उन्हे नष्ट करने के नाम पर ईराक पर अमेरीका ने सैन्य हमला किया. हालांकि हमले के बाद यह निष्कर्ष निकला कि ईराक के पास कोई ऐसे हथियारों का जखीरा था ही नही परन्तु अमेरीका ने अपने इस कदम से एक साथ तीन उद्देश्य पूरे किये:-

01. ईराक के तेल ठिकानों पर कब्जा किया और फिर से ईराक एकजुट न हो सके इसलिये उसे स्थाई युद्धरत या हिंसारत गुटों और खेमों में बॉंट दिया.

02. दुनिया के दूसरे छोटे और कमजोर देशों के मन में अपनी सामरिक शक्ति का भय पैदा कर दिया ताकि उसका साम्राज्यवादी नियंत्रण और आर्थिक लूट का कठोर पंजा कमजोर न पड़ सके.

03. दुनिया के युद्ध और सैन्य शक्ति में विश्वास करने वाले या उनका संभावित उपयोग करने वाले देशों में, अमरीकी हथियारों का, उनकी शक्ति, तकनीक और जीत की आवस्ती का प्रचार हो गया जिससे उनका हथियार व्यापार जबरदस्त फला-फूला.

इस युद्ध से अमेरीका का कोई नुकसान भी नही हुआ क्योंकि युद्ध का सारा खर्च भी उन्होने ईराक के तेल से ही वसूल कर लिया. हिंसा और शस्त्र की बिक्री, यह अद्भुत मुनाफा शास्त्र है, जिसका प्रयोग अमेरीका, ईराक से अफगानिस्तान और दुनिया के अन्य देशों में सफलतापूर्वक कर रहा है.

अफगानिस्तान में पहाड़ों की गुफाओं में छिपे तालिबानों को मारने के लिये द्रोण विमान और बमों का प्रयोग न केवल दुनिया के लिये आष्चर्य था बल्कि युद्ध और हिंसा के प्रयोगकर्ताओं को एक आकर्षक खोज थी.

ईराक और अफगानिस्तान की घटनाओं के बाद अमेरीका के हथियारों की बिक्री तेजी से बढ़ी और खरबों डालर का हथियार का धंधा बढ़ गया. यह एक सुविदित तथ्य है कि आगामी दशकों में अमेरीकी या यूरोप की संपन्नता के लिये हथियार, तेल, खाद्यान्न और व्यापार पर एकाधिकार जरूरी है. हथियार और तेल के लिये वे युद्ध का इस्तेमाल करते है तथा खाद्यान्न और व्यापार के लिये विश्व व्यापार संगठन का.

दुनिया में एक तरफ भूख और बेरोजगारी बढ़ रही है. यहॉं तक कि अमेरीका व यूरोप में भी भीख मांगने वालों की संख्या बढ़ रही है और दूसरी तरफ संपन्नता के बड़े - बड़े पहाड़ खड़े हो रहे हैं. इस विषम दुनिया में निसंदेह हथियार, हिंसा और युद्ध की बड़ी भूमिका है. हथियार का धंधा अपने अनुकूल, दुनिया बनाने के लिये अनेकानेक साधनों का इस्तेमाल करता है जिनमे मीडिया और पुरूस्कार भी उसी युद्ध रणनीति के हिस्से हैं.

कौन नही जानता कि श्री अल्फ्रेड नोबेल, जिनके नाम पर दुनिया में प्रख्यात नोबेल पुरूष्कार की स्थापना हुई, वे हथियारों के ही व्यापारी थे. ऐंसे और भी अनेकों उदाहरण बताये जा सकते है.

आज सारी दुनिया में चाहे वे लोकतांत्रिक प्रणाली से चुने गये देश हों या राजशाही देश हों, सैन्य तानाशाही वाले देश हों या साम्यवादी तानाशाही वाले देश हो, सभी दूर हथियार और युद्ध का जुनून बढ़ रहा है तथा हथियारों का खर्च भी बढ़ रहा है. पिछले एक दशक में भारत के सैन्य बजट में लगभग दस गुने की वृद्धि हुई है और यह 16 हजार करोड़ रूपया वार्षिक से बढ़कर 2 लाख करोड़ रूपये से अधिक हो गया है याने भारत के कुल बजट का लगभग 20 प्रतिशत हो गया है. इसी प्रकार पाकिस्तान का सैन्य बजट वृद्धि पर है.

यद्यपि भारत में सरकार के मुताबिक 40 करोड़ ऐंसे लोग है जिनकी दैनिक क्रय शक्ति 20 रूपये के आसपास है और योजना आयोग द्वारा गठित सेनगुप्ता समिति की रिर्पोट के अनुसार भारत के 80 करोड़ लोगों की दैनिक क्रय शक्ति 10 रूपये के आसपास है. जिस भारत में 40 करोड़ लोग गरीबी की सीमारेखा के नीचे है और वह भी तब जब ग्रामीण इलाकों में गरीबी की सीमा रेखा का मतलब 22 रूपये रोज का तथा शहरी इलाकों में 28 रूपये रोज निर्धारित है, तब यह स्थिति है.

जिस देश में प्रतिदिन एक हजार लोग टीवी से मर जाते है, उस देश के स्वास्थ्य सेवाओं का बजट मुष्किल से 4 या 5 प्रतिशत रहता है और रक्षा बजट 20 प्रतिशत के आसपास. यहॉं तक की शिक्षा का बजट लगभग 4 प्रतिशत, सिंचाई का बजट इससे भी कम होता है याने जो पैसा शिक्षा और चिकित्सा पर खर्च होना चाहिये, रोजी ओर रोटी पर खर्च होना चाहिये, वह हथियारों पर खर्च हो रहा है.

इससे भी बदतर स्थिति पाकिस्तान की है जो अमेरीकी सैन्य मदद पर जिंदा है और इसके बावजूद भी पाकिस्तान ने इस वर्ष अपने सैन्य बजट में एकमुस्त 28 प्रतिशत की वृद्धि की है और जिसका अधिकांश हिस्सा परमाणु शाक्ति के निमार्ण पर खर्च होना है.

समूची दुनिया में हथियार के धंधे वाले देशों को लोकतंत्र के बजाय तानाशाही ज्यादा मुफीद होती है. अगर पाकिस्तान को दी गई अमेरिकी मदद का अध्ययन करें तो अमेरीका ने फौजी तानाशाही वाले पाकिस्तान को लोकतांत्रिक पाकिस्तान की तुलना में ज्यादा मदद दी है.

1958 में अमेरीका ने पाकिस्तान को लगभग 5 करोड़ डालर की मदद दी थी परन्तु जनरल अयूब के कार्यकाल में लगभग 9 करोड़ 40 लाख डालर, याहया खान के कार्यकाल में 10 करोड़ डालर की मदद दी. याने सैन्य तानाशाही पाकिस्तान को लोकतांत्रिक पाकिस्तान से दो गुना ज्यादा मदद की. नवाज शरीफ के पिछले कार्यकाल में साढ़े सात करोड़ डालर की मदद की परन्तु जनरल मुर्षरफ के कार्यकाल में लगभग 5 गुना याने 34 करोड़ डालर की मदद की.

आज दुनिया की संपत्ति वालो की संपत्ति का बड़ा स्रोत हथियारों की बिक्री है. और उनकी संपन्नता को टिकाये रखने तथा बढ़ाने का सबसे बड़ा माध्यम शस्त्र व्यापार है. एक सुखोई विमान की कीमत से भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में 700 अस्पताल और स्कूल बन सकते हैं.

एक मिग 23 विमान की कीमत से ग्रामीण क्षेत्रों में 400 स्कूल, अस्पताल बन सकते हैं. एक युद्ध में प्रयोग में आने वाले युद्धक विमान की कीमत से 3 हजार किलोमीटर रेल लाईन गिर सकती है और एक पोत वाहक युद्धक जलसेना के जहाज की कीमत से 25 सौ किलोमीटर रेल लाईन या एक लाख गॉंव को स्कूल या अस्पताल बन सकते थे परन्तु विकास के लिये पैसे का अभाव है और विनाश के लिये पैसे का बहाव है.

फिर से एक बार बहुधु्रवीय दुनिया के नाम पर सैन्य शक्ति के संचय तथा युद्ध के नासूरों को पनपाया जा रहा है. रूस लगभग 30 वर्ष के अंतराल के बाद अब फिर अपनी सैन्य शाक्ति को स्थापित करना चाह रहा है तथा साम्यवादी सपनों को देखने वाले लोगों को अपनी सैन्य शक्ति से गर्वित कर रहा है. यूरोप भी सैन्य उपकरणों की खोज और बिक्री पर अपनी संपन्नता का सपना संजोय है और अमरीका तो पहले से ही बड़ा खिलाड़ी है.

दुनिया में आंतकवाद, हिंसा, युद्ध और साम्राज्यवाद षोषण और पूंजीवाद बंदूक की नली से निकल रहे हैं. भले ही एक जमाने में माओ ने कहा था कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है परन्तु सच्चाई यह है कि अब बंदूक की नली से विषमता और पूंजीवाद, युद्ध और हिंसा, नवसाम्राज्यवाद और नवपूंजीवाद निकल रहा है.

दुनिया के मीडिया के माध्यम से बाल और अवोध मनों में हिंसा और हथियार के संस्कार डाले जा रहे हैं. मीडिया हिंसा को प्रतिष्ठापित करने का, आकर्षित बनाने का भी माध्यम बन गया है तथा हथियारों की हिंसक शक्ति के साथ मानसिक तालमेल का भी. कम्प्यूटर, लेपटाप आदि पर या मोबाईल फोन पर बच्चों को जो खेल दिखाये या सिखाये जाते हैं, वे अधिकांशतः हिंसा के है.

एक 5 - 7 साल का बच्चा अब आपको एक से एक आग्नेय अस्त्रों के नाम बता सकता है, उनके इस्तेमाल के लिये उत्साहित होता है और बचपन से ही उसके मानसिक संस्कार हिंसा की ओर प्रवृत्त होने लगते हैं. गॉंधी तो भारत में 2 अक्टूबर और 30 जनवरी को सार्वजनिक पूजा के देवता बचे हैं और इसीलिये लोहिया का प्रश्न आज भी भारत और दुनिया के लिये मौजू प्रश्न है.

अगर हम या दुनिया गॉंधी की जीत चाहते हैं तो ऐसे मीडिया को तिलांजलि भी देना होगी जो बालमन की उर्वरक भूमि में हिंसा के बीज बो देते हैं. इतना ही नही बल्कि हमे एक नया ’’ गॉंधी पुनःजागरण ’’ का सांस्कृतिक अभियान षुरू करना होगा जो बाल मन की जमीन में अहिंसा के बीज बोयेगा और हिंसा के कचरे को साफ करेगा.

किसी भी प्रकार के युद्ध या हिंसा, वह साम्यवादी हो या पूंजीवादी, वह व्यक्ति की हो या सरकार की, हमे सार्वजनिक तौर पर नकारना होगा और दुनिया को संवाद, शांति और समता के त्रिगुट में बांधने की पहल करना होगी. मैं सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की इन पंक्तियों के साथ बात समाप्त करूंगा:-

मैं घृणा करता हूं इस युद्ध से
जो बेड़ियॉं खोलने की जगह बेड़ियॉं पहनाता है
दीवारें उठाता है
मैदानों को छोटा करता है
रेगिस्तानों को बढ़ाता है
साम्यवाद या पूंजीवाद
मैं दोनो पर थूकता हूं
और पूछता हूं
जिसके पैर में जूते नही दे सकते
उसके हाथ में तुम्हे
बंदूक देने का क्या अधिकार है ?


18.10.2016
, 18.30 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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