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अस्वीकृत हो परिवारवाद की राजनीति

विचार

 

अस्वीकृत हो परिवारवाद की राजनीति

संदीप पांडे


डॉ. राम मनोहर लोहिया, जिन्हें समाजवादी पार्टी अपना आदर्श मानती है, जवाहरलाल नेहरू की परिवारवाद की राजनीति को बढ़ावा देने के लिए कड़ी आलोचना करते थे. ऐसा प्रतीत होता है कि मुलायम सिंह यादव ने डॉ. लोहिया की इस नापसंदगी को सुविधजनक तरीके से नजरअंदाज किया है.

samajwadi party


अभी कुछ दिनों पहले तक समाजवादी पार्टी के किसी विज्ञापन पर सिर्फ यादव परिवार के सदस्यों की ही तस्वीरें होती थीं - आमतौर पर मुलायम सिंह, अखिलेश, शिवपाल व रामगोपाल यादव. समाजवादी पार्टी के किसी भी सदस्य जिसमें थोड़ा-बहुत भी आत्म-सम्मान होगा के लिए यह कितनी शर्मिंदगी की बात होगी कि एक परिवार के सदस्यों को छोड़कर उनकी पार्टी में कोई नेता ही नहीं? शायद ऐसा मान लिया गया था कि यदि आप यादव परिवार से नहीं हैं तो पार्टी के प्रति आपकी वफादारी संदिग्ध है.


साफ तौर पर नेहरू-गांधी परिवार के उदाहरण से ही परिवारवाद की राजनीति करने वाले प्रेरित हुए हैं. इस परिवार ने कुछ अन्य परिवारों को प्रेरणा दी उनमें षेख अब्दुल्लाह, जगजीवन राम, विजयाराजे सिंधिया, देवी लाल, चौधरी चरण सिंह, राजेश पायलट, जितेन्द्र कुमार, शरद पवार, एम. करुणानिधि, लालू प्रसाद यादव, एन.टी. रामा राव, मुफ्ती मोहम्मद सईद शामिल हैं जिनके परिवार के सदस्यों ने उनकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया. नेहरू-गांधी परिवार ने इस उप-महाद्वीप के अन्य परिवारों जैसे भुट्टो, षेख मुजीबुर्रहमान, हुसैन मोहम्मद इरशाद व बंडारानायके को भी परिवारवाद की राजनीति की प्रेरणा दी.

अब तो भारत में यह आम बात है कि किसी राजनेता की पत्नी व बच्चे भी राजनीति में जोर-अजमाइश करते हैं. खासकर यदि कोई राजनीतिक पद किसी कारण रिक्त हो जाता है तो उसके परिवार के सदस्यों को लगता है कि उनके परिवार के सदस्य का स्थान परिवार के लिए ही आरक्षित है और कोई अन्य परिवार का सदस्य उस पद के लिए अपनी दावेदारी पेश कर देता है. यह हमारे समाज की सामंती मानसिकता प्रदर्शित करता है.

यह सिर्फ राजनीतिक परिवार के सदस्य ही नहीं बल्कि सामान्य लोग भी मान लेते हैं कि इन परिवार के अन्य सदस्यों का भी राजनीतिक पदों पर दावा बनता है. बल्कि परिवार के अन्य सदस्यों को अपनी दावेदारी को जनता द्वारा निर्वाचित होने पर वैध ठहराने का मौका मिल जाता है.

इनमें से कई की न तो कोई राजनीतिक प्रवृत्ति होती है और न राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक मुद्दों की समझ और वे अपने से काबिल उम्मीदवारों को जन प्रतिनिधि बनने के अवसर से वंचित कर देते हैं. भारतीय राजनीति में परिवारवाद ने जबरदस्त घुसपैठ कर ली है और उसके लोकतांत्रिक चरित्र पर भयंकर कुठाराघात किया है.

मुलायम सिंह के परिवार ने तो परिवारवाद की राजनीति की सारी हदें ही पार कर दी थीं. न सिर्फ पार्टी के सारे प्रमुख नेता एक ही परिवार से हैं बल्कि इस परिवार के चौदह सदस्य किसी न किसी स्तर पर जन प्रतिनिधि हैं और मुलायम सिंह की दूसरी पत्नी के बेटे की पत्नी अपर्णा यादव भी राजनीति में प्रवेश हेतु दरवाजा खटखटा रही हैं.

किंतु पार्टी पर अपने परिवार का आधिपत्य जमा लेने का अब मुलायम सिंह को खामियाजा भुगतना पड़ रहा है. यह पुराने जमाने के राजपरिवारों में होने वाले सत्ता संघर्षों की भांति है. मुलायम सिंह को पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र को खत्म करने व उसे अपनी जमींदारी की तरह चलाने की कीमत चुकानी पड़ेगी. अब उनकी पार्टी में इस कद का कोई नेता नहीं जो अपनी हैसियत से वर्तमान संकट का समाधान निकाल ले.

पार्टी में सिर्फ मुलायम सिंह की ही चलती है. उनके सामने अपने बेटे व भाई में से एक को चुनने की कठिन चुनौती खड़ी है. इस स्थिति के लिए मुलायम सिंह खुद जिम्मेदार हैं. यदि आज पार्टी में अन्य वरिश्ठ नेता होते तो वे परिवार से बाहर जाकर कुछ समाधान खोज सकते थे. यह एक विचित्र बात है कि अभी भी समाधान परिवार के अंदर ही खोजा जा रहा है.

आखिर क्यों जरूरी है कि मुलायम, अखिलेश और शिवपाल ही सम्भावित मुख्य मंत्री पद के दावेदार के रूप में देखे जाएं? क्या आजम खान और बेनी प्रसाद वर्मा जैसे वरिश्ठ नेता मुख्य मंत्री नहीं हो सकते? बल्कि परिवार के लोगों के बीच विवाद सुलझाने का यह अच्छा तरीका हो सकता है कि परिवार के बाहर के किसी व्यक्ति को मुख्य मंत्री बनाया जाए.

इससे यह भी साबित हो जाएगा कि समाजवादी पार्टी का नेतृत्व राजपरिवारों की तरह सिर्फ मुलायम सिंह के परिवार के सदस्यों तक ही सीमित नहीं हैं और यह परिवार अपने आप को एक लोकतांत्रिक ढांचे का हिस्सा मानता है. क्या मुलायम सिंह इतने समाजवादी हैं कि परिवार-प्रेम से ऊपर उठ कर सोचेंगे?

यदि यादव परिवार अपने झगड़े नहीं सुलझाता तो यह उनकी राजनीतिक पकड़ को कमजोर करेगा. यदि वे साथ रहते भी हैं तो विवाद के घाव कभी भरने वाले नहीं. पहले जैसी स्थिति तो अब नहीं रहेगी. चोटिल अहंकारों के साथ क्या वे काम कर पाएंगे? यदि वे अलग होने का फैसला लेते हैं तो स्थिति और भी अनिष्चित रहेगी.

मुलायम सिंह ही सिर्फ जनाधार वाले नेता हैं जो जनता के मतों को आकर्शित कर सकते हैं. उम्र के इस पड़ाव में उनसे यह अपेक्षा करना कि वे पूरी पार्टी को अपने कंधों पर ले चलेंगे उनके साथ ज्यादती होगी. शिवपाल हमेशा मुलायम की छत्रछाया में रहे हैं और स्वतंत्र नेता के रूप में उन्होंने अपने को स्थापित नहीं किया है.

अखिलेश अनुभवहीन हैं. उनका न तो जमीनी जुड़ाव है और न ही मुद्दों की समझ. उनके कुछ निर्णय तो किसी भी अगली सरकार को वापस लेने पड़ेंगे. जैसे राज्य सरकार द्वारा दिए जाने वाले यश भारती पुरस्कार में पुरस्कार राशि रु. ग्यारह लाख के साथ-साथ उन्होंने रु. 50,000 मासिक पेंशन देने का भी निर्णय लिया है. यह तो जनता का धन बरबाद करने का उनका अनोखा निर्णय था. जनता के धन को अखिलेश यादव ने मनमर्जी से खर्च किया है.

अंतर्कलह ने समाजवादी पार्टी को भारी क्षति पहुंचाई है. यदि परिवार पार्टी को चुनाव में नहीं बचा पाता है तो यह भारत में सामंती-परिवारवाद की राजनीति के अंत की षुरुआत हो सकती है. यह उन अन्य परिवारों के लिए भी सबक रहेगा जो इस किस्म की राजनीति करते हैं. शायद यह परिवार का झगड़ा होना जरूरी था ताकि भारतीय राजनीति के एक बड़े कलंक जिसने लोकतंत्र का मजाक बना कर रख दिया है को मिटाया जा सके.

06.11.2016.
, 18.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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