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जोखिम लो, दुनिया बदलो

विचार

 

जोखिम लो, दुनिया बदलो

प्रीतीश नंदी


मुझे प्राय: पूछा जाता है कि मैं क्यों नए युवा कलाकारों की प्रदर्शनियों का उद्‌घाटन करता हूं या पहली बार लिखने वाले ऐसे लेखकों की किताब का विमोचन करता हूं, जिन्होंने अभी खुद को साबित नहीं किया है, क्योंकि आप तो कुछ बहुत बड़े कलाकारों के प्रदर्शनों पर अपनी मुहर लगा चुके हैं.

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भाआपने कुछ बहुत ही आला दर्जे के लेखकों का किताबों की दुनिया में परिचय कराया है. आप क्यों जान-बूझकर नए लोगों के साथ जोखिम लेंगे? ऐसा मेरे आलोचक कहते हैं. आपके सराहे काम को खारिज करने वाले आप पर गुमराह करने का आरोप लगाएं तो क्या होगा?

मुझे लगता है कि वे अपनी जगह सही हैं. बेशक कुछ मौकों पर मैं गुमराह कर भी सकता हूं. कुछ किताबें संभव है कि वाकई औसत दर्जे की हों. कुछ कलाकृतियां एकदम खराब हों. किंतु कुल-मिलाकर मैं बहुत बार सही साबित हुआ हूं. खासतौर पर जब फिल्म में नई प्रतिभा को मौका देने का मामला हो.

अंग्रेजों के इतने लंबे शासन के नतीजे में हम वे हो गए हैं, जो नेपोलियन ने ब्रिटेन के लिए आलोचनात्मक ढंग से कहा था: दुकानदारों का राष्ट्र. हम जोखिम लेने को खारिज कर देते हैं और मैं ही ऐसा नहीं कह रहा हूं.

टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक सर्वे में पता लगाया कि भारत ऐसा देश है, जहां दुकानों का घनत्व दुनिया में सबसे ज्यादा है. हां, हर 1000 लोगों पर 11 खेरची दुकानें! अमेरिका या सिंगापुर की तुलना में तीन गुना. ब्रिटेन की तुलना में दो गुना. हम जोखिम लेने से बचते हैं.

मामला स्टॉक्स और शेयर का हों तो ये रवैया एकदम ठीक है. जैसा कि हम सब जानते हैं कि न जाने कौन से कारण से और मुझे लगता है पूरी तरह मूर्खतापूर्ण कारण से, ज्यादातर लोग तब शेयर खरीदते हैं जब उनकी कीमत ज्यादा होती है और बढ़ती रहती है और जब वे सस्ते हो जाते हैं तो उन्हें डम्प कर देते हैं.

भीड़ का अनुसरण करने की प्रवृत्ति, अनजाने प्रदेश में जाने की इच्छा से अधिक बलवती होती है. दुर्भाग्य से यही प्रवृत्ति हमारा परिचय है और इसी कारण हम नई प्रतिभा खोजने में हमेशा सुस्त होते हैं. खासतौर पर खेल जैसे क्षेत्र में सबकुछ इस बात पर निर्भर होता है कि आप कितनी जल्दी किसी में प्रतिभा देखकर उसका विकास कर पाते हैं.

हम किसी भी क्षेत्र में प्रतिभा का विकास करने में इतने ही सुस्त हैं, फिर चाहे कला क्षेत्र हो अथवा साहित्य या संगीत का. पुराने लोग डटे रहते हैं और सारा ध्यान व संसाधन खींच लेते हैं, जबकि नई प्रतिभा के लिए प्रवेश पाना असंभव हो जाता है.

यही कारण है कि अोलिंपिक में हमारा प्रदर्शन इतना खराब है. सच तो यह है कि ज्यादातर स्पर्द्धात्मक खेलों में हमारा यही हाल है. असली चुनौती साबित हो चुकी प्रतिभा को संवारने की नहीं है, बल्कि अज्ञात लोगों में क्षमता खोजने की है. यह अनंत गुना कठिन काम भी है, क्योंकि इसमें वातानुकूलित कॉन्फ्रेंस रूम में बैठकर यह फैसला करने की तुलना में बहुत दौड़-भाग करनी पड़ती है कि किस सफल खिलाड़ी पर कितना खर्च किया जाए.

यह काम आलसी मुख्यमंत्रियों का है, जो ऐसे किसी खिलाड़ी को पुरस्कार में बड़ी राशि देकर गौरवान्वित होना चाहते हैं, जो पहले ही जीत हासिल कर चुका है. वे भूल जाते हैं कि जो पराजित हुए हैं वे अगली बार विजयी हो सकते हैं, यदि कोई उनमें पर्याप्त रुचि दिखाए और उनके प्रशिक्षण पर पैसा खर्च करें तो.

विजेता तो भाग्यशाली होते हैं. वे हमेशा ही सर्वश्रेष्ठ हों, यह जरूरी नहीं. सर्वश्रेष्ठ तो अंत में ही आता है, जैसा अकबर पदमसी ने कुछ हफ्तों पहले हमें दिखाया, जिनकी पेंटिंग ‘ग्रीक लैंडस्केप’ नीलामी में 19 करोड़ रुपए की रिकॉर्ड कीमत में बिकी और उन्होंने अपने से अधिक ख्यात, अधिक सफल समकालीनों को बहुत पीछे छोड़ दिया.

गायतोंडे ने भी यही दिखाया, अपने निधन के बरसों बाद. अपने जीवन में तो उन्हें उपेक्षा ही मिली. हुसैन के सारे संग्राहक सोच रहे होंगे कि वे चेकबुक लेकर उनके पीछे क्यों दौड़ते रहे, जब उनके अल्पख्यात समकालीन आज नीलामी में काफी बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं. सूजा, गायतोंडे, तय्यब मेहता और अब अकबर पदमसी.

भारत को जिस चीज की जरूरत है वह है बढ़ावा देने, संरक्षण देने की संस्कृति. जो पहले ही सफल हो चुके हैं उन्हें संरक्षण नहीं बल्कि उन्हें जिनमें संभावना नज़र आती है, क्षमता दिखाई देती है. यही वजह है कि आज इतनी स्टार्टअप कंपनियां इतना अच्छा काम कर रही हैं, क्योंकि वे जोखिम ले रही हैं.

वे ऐसे परम्परागत बिज़नेस में निवेश करने की बजाय, जिसमें हर कोई निवेश कर रहा है, रोचक आइडिया पर पैसा लगाने की जोखिम ले रही हैं. असली उद्यमशीलता के केंद्र में नए आइडिया की ही चुनौती है. असली विजेता तो वे हैं जो उस विचार को समर्थन देने का जोखिम उठाते हैं. इसी का निचोड़ तो दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कंपनियां हैं. ओरिजिनल आइडिया! स्टील या सीमेंट की फैक्ट्रियां नहीं. अथवा पावर प्लांट भी नहीं, जिन पर हमारे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का भारी कर्ज है.

यही वजह है कि फिल्में बनाना मुझे रोमांच से भर देता है. मुझे इसके जोखिम मालूम है. अाप कुछ जीत जाते हैं, कुछ हार जाते हैं. यह स्टार्टअप जैसा ही मामला है. आप ऐसे लोगों के साथ काम करते हैं, जिनके बारे में आपका ख्याल है कि वे अपनी प्रतिभा, अपने कौशल और उसके प्रति अपनी प्रतिबद्धता से आपको चकित कर देंगे, जिसकी शुरुआत अमूर्त से आइडिया से हुई है. वह आइडिया साकार करना ही असली चुनौती है. और जैसा कि मुंबई की सड़कों पर होता है,

इसके रास्ते में भी कई गड्ढे हैं, जिनमें अजीब से नेता और फिरौती के शिकारी भी हैं, जो सोचते हैं कि देशभक्ति को फिरौती वसूली का रैकेट चलाकर पैसा मुहैया कराना चाहिए.

मैं आपसे एक वादा कर सकता हूं : सार्वजनिक उद्यान के लिए छोड़ी गई जमीन चुराने या भारतीयों की भावी पीढ़ी की खनन विरासत का अवैध खनन लाइसेंस पाने के लिए गिड़गिड़ाने की तुलना में फिल्म बनाना बहुत मजेदार है.

यहां फिर हम मूल प्रश्न पर लौटते हैं कि क्यों मैं हमेशा युवा, अनजान प्रतिभाओं को समर्थन देता हूं, जबकि मैं आराम से बैठकर सफल लोगों की वाहवाही कर सकता हूं? उत्तर सरल-सा है. खोज का लुत्फ उठाने के लिए. जोखिम का जादू महसूस करने के लिए. स्लीपर हिट (ऐसी फिल्म जिसका ज्यादा प्रमोशन न हुआ हो और जो शुरुआत में ज्यादा सफल न रहने के बाद हिट हो जाती है) के आनंद के लिए

15.11.2016, 19.30 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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