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क्या आज भी प्रासंगिक हैं गांधी?

विचार

 

क्या आज भी प्रासंगिक हैं गांधी?

नेहा दाभाड़े


मोहनदास करमचंद गांधी, जिन्हें भारतवासी प्रेम और श्रद्धा से महात्मा गांधी कहते हैं, को कई कारणों से याद किया जाता है. सत्याग्रह और अहिंसा के उनके सिद्धांतों ने न केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया के दमित लोगों को अपने अधिकारों और अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा दी.
 

gandhi ji

आज के हमारे समाज में, जब हम हिंसा को लगभग अपरिहार्य मानने लगे हैं और हमारे आसपास हो रही हिंसा की घटनाएं हमें कुछ खास प्रभावित नहीं करतीं, तब ऐसा लग सकता है कि अहिंसा का सिद्धांत बेमानी और अव्यवहारिक है. परंतु गांधी के पास अब भी दुनिया को देने के लिए बहुत कुछ है. उनकी फौलादी दृढ़ता और उनके उच्च नैतिक आदर्श, हाशिए पर पड़े समुदायों को प्रेरित कर सकते हैं.

गांधी का भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अप्रितम योगदान था. महात्मा गांधी का व्यक्तित्व बहुआयामी था. वे अत्यंत धार्मिक भी थे और साथ में एक सिद्धहस्त राजनेता भी. वे एक क्रांतिकारी भी थे और समाज सुधारक भी. वे विरोधाभासी और कठिन परिस्थितियों में से भी एक ऐसा रास्ता निकालने में सक्षम थे जो दुनिया को करूणा और प्रेम की राह पर ले जाता है. इसका अर्थ यह नहीं है कि उनमें ऐसा कुछ था ही नहीं जिसकी निंदा की जा सके या उनके किसी विचार को चुनौती देना संभव ही नहीं है. उदाहरणार्थ, उन्होंने कभी जाति व्यवस्था पर आधारित ऊँचनीच पर प्रश्न नहीं उठाए.

वे हिन्दू समाज पर नैतिक दबाव डालकर यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि हिन्दू, ‘हरिजनों’ के साथ मानवीय व्यवहार करें और अछूत प्रथा का त्याग करें. वे अंबेडकर की तरह उग्रवादी नहीं थे और इस बिना पर अक्सर उनकी आलोचना की जाती है. उन्होंने महिलाओं का आह्वान किया कि वे स्वाधीनता आंदोलन में शामिल होने के लिए सड़कों पर उतरें परंतु उन्होंने पितृसत्तात्मकता और महिलाओं की निम्न सामाजिक स्थिति पर सवाल नहीं उठाए. इसी तरह, उनके अन्य विचारों को भी चुनौती दी जा सकती है परंतु इससे उनके विचारों की चमक धूमिल नहीं पड़ती और ना ही एक शांतिपूर्ण समाज के निर्माण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पर प्रश्नचिन्ह लगता है. गांधी अपने पीछे विचारों और कर्मों की शानदार विरासत छोड़ गए हैं और उनके कई विचार आज भी अत्यंत प्रासंगिक और महत्वपूर्ण हैं.

आज के भारत के सार्वजनिक विमर्श पर असहिष्णुता और रूढ़िवाद हावी है. यह असहिष्णुता केवल एक विचार और आख्यान को सही मानती है और एक से अधिक सत्यों और एक से अधिक आख्यानों के अस्तित्व को स्वीकार ही नहीं करती. यह असहिष्णुता हमारे समाज की उदारवादी परंपरा के लिए बड़ी चुनौती है. असहिष्णुता पूरे देश पर खानपान की एकसी आदतें, संकीर्ण राष्ट्रवाद और अन्य धर्मों के प्रति घृणा का भाव लादना चाहती है. वह कुछ विशेष समुदायों को नीची निगाहों से देखती है.

हिन्दुत्व विचारधारा और हिन्दू राष्ट्रवादियों का दावा है कि हिन्दू धर्म (और उसमें भी हिन्दू धर्म का उनका संकीर्ण संस्करण) सर्वश्रेष्ठ है और केवल वही देश की सारी समस्याओं को हल कर सकता है. अपनी इसी सोच के चलते वे पूरे देश को एकसार बनाना चाहते हैं और सभी समुदायों पर एकसी पहचान लादना चाहते हैं. घरवापसी अभियान इसका एक उदाहरण है. उनका श्रेष्ठता भाव उन्हें यह स्वीकार ही नहीं करने देता कि दुनिया में एक से अधिक सत्य भी हो सकते हैं. गांधी की इस मामले में सोच एकदम अलग थी. उन्हें अपने हिन्दू होने पर गर्व था और वे अत्यंत धर्मनिष्ठ हिन्दू थे परंतु उन पर अन्य धर्मों का प्रभाव भी था. बाईबिल के न्यू टेस्टामेंट, सरमन ऑफ द माउण्ट, कुरान व टोल्स्टॉय की ‘‘द किंगडम ऑफ गॉड इज़ विदिन यू’’ ने उन पर गहरा प्रभाव डाला.

‘‘पक्का हिन्दू होते हुए भी मेरी आस्था में ईसाई, इस्लामिक और पारसी शिक्षाओं के लिए स्थान है...मेरी आस्था उदार है और वह ईसाईयों का विरोध नहीं करती-प्लाइमाउथ ब्रदर का भी नहीं-सबसे कट्टर मुसलमान का भी नहीं. मेरी आस्था जितनी संभव हो सके, उतनी सहिष्णुता पर आधारित है. मैं किसी व्यक्ति की कट्टरवादी हरकतों के लिए उसकी निंदा करने से इंकार करता हूं क्योंकि मैं उन्हें उसके दृष्टिकोण से देखने की कोशिश करता हूं. मैं यह जानता हूं कि ऐसा कुछ लोगों को शर्मनाक लग सकता है परंतु मुझे नहीं’’ (एमकेगांधी.ओआरजी). अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ में वे लिखते हैं, ‘‘सभी धर्म एक ही जगह ले जाने वाले अलग-अलग मार्गों की तरह हैं. अगर वे हमें अपने लक्ष्य तक पहुंचा देते हों, तो फिर उनके अलग-अलग होने से अंतर क्या पड़ता है? वस्तुतः, तो जितने व्यक्ति, उतने ही धर्म भी हैं’’ (एमकेगांधी.ओआरजी).
गांधी के लिए सत्य ही धर्म था और यह सत्य विभिन्न धर्मों में पाया जा सकता था. सत्य पर किसी धर्म का एकाधिकार नहीं है.

इन दिनों हमारे देश में गाय के मुद्दे पर भारी तनाव और हिंसा हो रही है. गाय, हिन्दू राष्ट्रवादियों का राजनैतिक हथियार बन गई है और उसके नाम पर दलितों व मुसलमानों के खिलाफ हिंसा की जा रही है. ऊना की घटना और दादरी में मोहम्मद अखलाक की पीट-पीटकर हत्या, इसके उदाहरण हैं. गाय के नाम पर जमकर खूनखराबा हो रहा है और इस सब को यह कहकर औचित्यपूर्ण बताया जा रहा है कि गाय, हिन्दुओं के लिए पवित्र है और उसका वध, हिन्दुओं का अपमान करना है. यद्यपि गांधी कट्टर शाकाहारी और गौरक्षा के प्रबल पैरोकार थे तथापि वे गाय को बचाने के लिए किसी मनुष्य के खिलाफ हिंसा के कड़े विरोधी थे. ‘‘यद्यपि मैं गाय को हिन्दू धर्म का केन्द्रीय तत्व मानता हूँ-केन्द्रीय इसलिए क्योंकि यह सभी वर्गों और आमजनों के लिए समान है-परंतु मैं इस कारण मुसलमानों के प्रति घृणा को कभी नहीं समझ सका. गाय के नाम पर जो भी दंगे हुए हैं वे पागलपन हैं’’ (गांधी एम के, यंग इंडिया, 1924). उनके लिए गोरक्षा ‘‘सौम्यता की आराधना और कमज़ोर और असहाय की रक्षा थी’’ (गांधी, यंग इंडिया, 1921).

गांधी की गोरक्षा में हिंसा या कट्टरता के लिए कोई जगह नहीं थी. ‘‘हिंसा के सहारे गोरक्षा करने से हिन्दू धर्म शैतानी धर्म बन जाएगा’’ (गांधी, यंग इंडिया, 1921). उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ‘‘अगर कोई मुसलमान भाई, उदाहरण के लिए, ईद पर, एक गाय का वध कर भी देता है, तो किसी हिन्दू को किस हक से उस पर हाथ उठाने का अधिकार है? क्या शास्त्र यह कहते हैं कि गाय को बचाने के लिए हम अपने साथी मनुष्य की हत्या कर दें?’’. देश में कई राज्यों में गोमांस सेवन पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. कुछ लोग यह मानते हैं कि यह उनके खानपान की स्वतंत्रता पर हमला है परंतु सरकार का यह कहना है कि वह ऐसा बहुसंख्यकों के हित में कर रही है. गांधी इस तरह के कानूनों के पक्ष में नहीं थे. उनका यह मानना था कि एक समुदाय द्वारा अपने धार्मिक विश्वास दूसरे समुदाय पर जबरदस्ती लादना गलत है.

उनका कहना था कि कानून की बजाए हिन्दुओं को दूसरे समुदाय से केवल यह अपील करने का अधिकार है कि वे स्वेच्छा से गोवध करना बंद कर दें. ‘‘...अनेक मुखर हिन्दू इस गलत धारणा में जी रहे हैं कि भारतीय संघ हिन्दुओं का है और इसलिए वे अपने धार्मिक विश्वासों को गैर-हिन्दुओं पर कानून द्वारा लाद सकते हैं’’ (गांधी, हरिजन, 1947). वे स्पष्ट शब्दों में कहते हैं ‘‘किसी धर्म की प्रथाओं को ऐसे लोगों पर, जो उस धर्म को नहीं मानते, कानून के जरिए लादना गलत है’’ (गांधी, हरिजन, 1947).

गोवध के मुद्दे का दोनों समुदायों के बीच अलगाव के बीज बोने के लिए लंबे समय से इस्तेमाल किया जाता रहा है. आज भी इस मुद्दे का इस्तेमाल धार्मिक ध्रुवीकरण करने और मुसलमानों को गोमांस भक्षक के रूप में प्रस्तुत करने के लिए किया जा रहा है. इस मुद्दे के अलावा अन्य कई मुद्दों को लेकर मुस्लिम समुदाय के खिलाफ इतने पूर्वाग्रहों को जन्म दे दिया गया है कि लोगों को ऐसा लगने लगा है कि हिन्दू और मुसलमान एकसाथ सौहार्द से रह ही नहीं सकते. मुसलमानों को राष्ट्रविरोधी बताया जाता है और उनके साथ द्वितीय श्रेणी के नागरिक की तरह व्यवहार करने की वकालत की जाती है. इसके लिए इतिहास के चुनिंदा तथ्यों का इस्तेमाल किया जाता है. ऐसा बताया जाता है कि हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच मतभेद इतने गहरे हैं कि वे कभी समाप्त हो ही नहीं सकते और हिन्दुओं और मुसलमानों का मेल कभी संभव ही नहीं है.

गांधी ने अपना जीवन सांप्रदायिक सद्भाव के लिए समर्पित कर दिया था. उन्होंने यह स्पष्ट कहा था कि भारत में मुसलमानों का शासन शुरू होने से बहुत पहले भी हिन्दुओं ने इस्लाम को अंगीकार किया था, उसी तरह, जिस तरह ब्रिटिश शासन के पहले कई हिन्दू ईसाई बन गए थे. अतः यह कहना गलत है कि मुस्लिम शासकों ने हिन्दुओं को तलवार की नोंक पर मुसलमान बनाया. मुसलमानों के स्वाधीनता संग्राम में योगदान की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा था कि स्वराज पाने के लिए हिन्दुओं और मुसलमानों की एकता आवश्यक है और स्वतंत्रता के बाद भी दोनों समुदाय सौहार्दपूर्वक मिलजुलकर रह सकते हैं और रहना भी चाहिए. उनकी यह मान्यता थी कि अलग-अलग धर्मों में विश्वास करना दो व्यक्तियों के बीच प्रेमपूर्ण संबंधों में बाधक नहीं है. ‘‘सांप्रदायिकता की समस्या का हल यही है कि हर व्यक्ति अपने धर्म की अच्छी चीज़ों का पालन करे और दूसरे धर्मों और उनके मानने वालों का उतना ही सम्मान करे जितना वह अपने धर्म का करता है.’’

आज जिस अन्य क्षेत्र में हमें गांधी के विचारों और उनकी शिक्षाओं से प्रेरणा ले सकते हैं वह है कश्मीर का प्रश्न. बुरहान वानी की मौत के बाद से कश्मीर में विरोध प्रदर्शनों की बाढ़ आ गई है. राज्य की पुलिस इन विरोध प्रदर्शनों को कड़ाई से कुचल रही है और सेना द्वारा ज़रूरत से ज्यादा बल प्रयोग करने से मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है और बड़ी संख्या में लोग मारे जा रहे हैं. राजनैतिक संवाद के ज़रिए इस समस्या का शांतिपूर्ण हल निकालने की बजाए, सेना का इस्तेमाल कर लोगों की आवाज़ को कुचला जा रहा है. कश्मीर को आज गांधी की अहिंसा की ज़रूरत है. जैसा कि गांधी ने कहा था कि अहिंसा शक्तिशाली का उपकरण है. गांधी का करूणा और क्षमा का संदेश, हिंसा के उस दुष्चक्र को तोड़ने में हमारी मदद कर सकता है, जिसकी गिरफ्त में कश्मीर फंसा हुआ है.

कश्मीर की समस्या सिर्फ हमारे देश की समस्या नहीं है. राष्ट्रवाद के नाम पर हिंसा सीमा के दोनों ओर जारी है और पूरी दुनिया में भी यही हो रहा है. गांधी का राष्ट्रवाद संकीर्ण नहीं था. वे अंतर्राष्ट्रीयवादी थे. वे साम्राज्यवाद के खिलाफ थे, वर्चस्ववाद के खिलाफ थे और एक देश द्वारा दूसरे देश पर प्रभुत्व जमाने के विरोधी थे. उनकी मान्यता थी कि पूरा विश्व एक परिवार है. यद्यपि वे यह मानते थे कि अंतर्राष्ट्रीयवादी होने के लिए पहले व्यक्ति को राष्ट्रवादी होना पड़ेगा परंतु वे लोगों से संकीर्ण राष्ट्रीय सीमाओं से ऊपर उठकर सोचने और व्यवहार करने के लिए कहते थे. उनकी यह मान्यता थी कि पूरी दुनिया हमारी दोस्त होनी चाहिए और हमें सभी मनुष्यों को अपने परिवार का सदस्य मानना चाहिए. ‘‘वह व्यक्ति, जो अपने परिवार और दूसरे के परिवार के बीच भेदभाव करता है, अपने परिवार के सदस्यों को गलत शिक्षा देता है और कलह व अधार्मिकता की राह पर चलता है’’ (हरिजन, 1947).

ऐसा व्यक्ति जिसके त्याग का जज़्बा उसके समुदाय से आगे नहीं जाता, वह स्वयं भी स्वार्थी बनता ही है, वह अपने समुदाय को भी स्वार्थी बनाता है. मेरी राय में आत्मबलिदान का अर्थ यह है कि व्यक्ति, समुदाय के लिए अपना बलिदान करे, समुदाय जिले के लिए, जिला प्रांत के लिए, प्रांत देश के लिए और देश दुनिया के लिए. समुद्र के पानी की एक बूंद बिना कुछ करे गायब हो जाती है परंतु अगर वह बूँद समुद्र का हिस्सा बनी रहती है तो उसे अपनी गोद में विशाल जहाजों का बेड़ा तैराने की प्रतिष्ठा मिलती है (हरिजन, 1947). आईएस की राजनीति और इस्लाम के खिलाफ माहौल ने पूरी दुनिया को प्रभावित किया है. जाहिर है कि हिंसा, और अधिक हिंसा को जन्म देती है. गांधी की शिक्षाएं और प्रेम व अहिंसा पर उनका ज़ोर, मानव सभ्यता की समस्याओं की रामबाण औषधि बन सकती है.

गांधी, 20वीं सदी के दुनिया के सबसे महान व्यक्ति थे परंतु उनके विचार स्थान और काल की सीमाओं में बंधे हुए नहीं हैं. यह अत्यंत दुःखद है कि आज गांधी की इसलिए आलोचना की जाती है क्योंकि वे मुसलमानों के साथ समान और मानवीय व्यवहार के हामी थे. पाकिस्तान के बारे में उनकी सोच के लिए भी उनकी निंदा की जाती है. ऐसा करने वाले उनके दृढ़ चरित्र, दूरदर्शिता और उनके चमत्कारिक व्यक्तित्व को भूल जाते हैं, जिसने उन्हें पूरे देश की जनता का एकछत्र नेता बनाया था. गांधी की आलोचना नहीं की जा सकती या नहीं की जानी चाहिए, ऐसा बिलकुल नहीं है परंतु हमें यह समझना होगा कि वे अपने समय की उपज थे. वे एक विशिष्टकाल में एक विशिष्ट वर्ग और विशिष्ट जाति में जन्मे थे. इनके अतिरिक्त उनका लालनपालन एक विशिष्ट तरीके से हुआ था. इसके बावजूद, उन्होंने जाति और वर्ग की संकीर्ण सीमाओं से ऊपर विचार और कार्य किए.

दुर्भाग्यवश आज जहां शासक और विपक्षी दल दोनों अपनी राजनीति के लिए गांधी का इस्तेमाल करना चाहते हैं वही उनमें से कोई भी उनके आदर्शों और उनके दर्शन पर चलने को राजी नहीं है. इसके अलावा, उनके विचारों का विरूपण भी किया जा रहा है. हमें यह बताया जा रहा है कि गांधी एक दूसरे युग के व्यक्ति थे और उनके आदर्श आज प्रासंगिक नहीं हैं. हमें यह याद रखना चाहिए कि इन्हीं ‘आदर्शों’, जिन्हें अव्यवहारिक बताया जा रहा है, के सहारे गांधी ने भारत जैसे बड़े उपनिवेश के स्वाधीनता संग्राम का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया, सांप्रदायिक हिंसा की आग को बुझाया और पूरी दुनिया में रंगभेद के खिलाफ अहिंसक संघर्ष को प्रेरणा दी.

गांधीजी की मृत्यु के लगभग 60 साल बाद उनका प्रिय देश असहिष्णुता की जकड़ में है. दलितों को मृत गाय की खाल उतारने के लिए सार्वजनिक रूप से पीटा जा रहा है और कश्मीर में हज़ारों बच्चे और युवा पैलेट से लगी चोटों के कारण अपनी आंखे खो चुके हैं. पूरी दुनिया में युद्ध और हिंसा का माहौल है. घोर असमानता और गरीबी सब ओर छाई हुई है. ऐसे समय में हमें गांधी के आदर्शों की बहुत आवश्यकता है.

25.11.2016, 15.15 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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