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क्या ये लड़ाई भ्रष्टाचार के खिलाफ है

विचार

 

क्या ये लड़ाई भ्रष्टाचार के खिलाफ है

प्रीतीश नंदी


राजनीति में भाषा भ्रष्ट करने की निराली आदत होती है और एक बार शब्द भ्रष्ट हो जाएं तो धीरे-धीरे उनके अर्थ भी भ्रष्ट हो जाते हैं या तो जरूरत से ज्यादा उपयोग से अथवा दुरुपयोग से. यह बात कभी इतनी सटीकता से लागू नहीं हुई, जितनी खुद ‘भ्रष्टाचार’ शब्द पर लागू होती है.

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आऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी भ्रष्टाचार को (मेरे ब्लैकबेरी पर) कुछ ऐसे परिभाषित करती है, ‘सत्ता में बैठे लोगों द्वारा बेईमानी या छलपूर्ण व्यवहार’ खासतौर पर जिसमें रिश्वत का संबंध हो.’ दुनिया के ज्यादातर लोग इसका समर्थन करेंगे. किंतु हमने परिभाषा का दायरा बढ़ाकर इसकी धार खत्म कर दी. असली महत्व के शब्द तो ‘सत्ता में बैठे’ और ‘रिश्वत’ हैं.

भारत में आम आदमी का सत्ता में होने से दूर-दूर का वास्ता नहीं है. हममें से 40 फीसदी से ज्यादा गरीब हैं, दुनिया के गरीबतम लोगों में शुमार. हमारे बीच मुश्किल से 2 फीसदी लोगों के पास टैक्स चुकाने लायक संसाधन हैं. ज्यादातर तो हम वेतनभोगी लोग हैं, जिनका टैक्स स्रोत पर ही काट लिया जाता है. इनमें भी बहुसंख्यक सरकारी कर्मचारी हैं. इसका मतलब है कि यह सुनिश्चित करना सरकार का काम है कि वे उचित टैक्स भरें.

मैं बहुत गलत नहीं हूं यदि मैं कहूं कि भारत में ऐसे लोगों की संख्या थोड़ी है, बहुत थोड़ी, जिनके पास भ्रष्ट होने के मौकें हैं. और हम जानते हैं कि वे कौन लोग हैं. अपनी सारी खामियों के बावजूद मीडिया ने इतने बरसों तक उनका पता लगाने का असाधारण काम किया है. यदि आपको लगता है कि मैं अतिशयोक्ति कर रहा हूं तो विकीपीडिया पर जाइए और भारत में घोटालों की सूची देखिए. यह आपको सिंहावलोकन का मौका देगी. विस्तार से जानना हो तो सैकड़ों अन्य साइट हैं.

ऐसी परिस्थिति में सरकार को ऐसे आर्थिक फैसले क्यों थोपने चाहिए, जो दसियों लाख ऐेसे लोगों को चोट पहुंचाकर उन्हें कमजोर कर रहे हैं, जिनका भ्रष्टाचार से कोई वास्ता नहीं है. वे अपनी पूरी जिंदगी उसे जैसे-तैसे चलाने के संघर्ष में लगा देते हैं. मोरारजी देसाई ने 1978 में हजार, पांच हजार और दस हजार रुपए के नोट बंद किए थे. उनसे जब पूछा गया कि इतना कठोर कदम उन्होंने क्यों उठाया तो रूखा जवाब था : श्रीमती गांधी को सबक सिखाने के लिए. क्योंकि वे मानते थे कि चुनाव में खर्च करने के लिए उनके पास बड़े करेंसी नोटों की थप्पियां हैं.

लगभग 40 साल बाद एक और प्रधानमंत्री ने भी कुछ महत्वपूर्ण राज्यों के चुनाव के ठीक पहले पांच सौ और हजार रुपए के नोट बंद किए हैं. वे भी गुजरात के हैं और श्रीमती गांधी के प्रति वैसी ही नापसंदगी उनके मन में है. मेरा कहना सीधा-सा है. इन दरमियानी वर्षों में जिन सरकारों ने हमारी अर्थव्यवस्था चलाई, उन्होंने सफलतापूर्वक भारतीय रुपए को नीचे गिराया. आज 500 रुपए का नोट, मोरारजी के समय के 50 रुपए के बराबर है. मोरारजी की कार्रवाई ने कुल करेंसी के 1 फीसदी को चलन के बाहर किया. इस बार के कदम ने तो 86 फीसदी करेंसी को बाहर कर दिया.

हर कोई जानता है कि वित्तीय रूप से यह कितना कष्टदायक हो सकता है, क्योंकि भारत में 90 फीसदी लेन-देन तो नकद में ही होता है. यदि अर्थशास्त्रियों पर भरोसा करें तो भारत में 90 फीसदी से ज्यादा नकदी काले धन के दायरे में नहीं आती. सीधी बात है कि अभी हम प्लािस्टक मनी के युग में नहीं पहुंचे हैं और लाखों भारतीयों को नकदी में व्यवहार ही सुरक्षित लगता है. यह खासतौर पर ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों के लिए सही है, जहां अब भी भारत की ज्यादातर आबादी रहती है. हो सकता है यह अच्छी बात न हो.

मुमकिन है कि नए युग की डिजिटल अर्थव्यवस्था अपनाकर उन्हें और अधिक फायदे मिल सकते हों. लेकिन निश्चित ही यह व्यक्तिगत चयन का मामला होना चाहिए. लोगों को जैसे चाहें वैसे लेन-देन करने की सुविधा होनी चाहिए जब तक वे कुछ गलत न कर रहे हों. चूंकि उन्होंने परम्परागत नकदी की अर्थव्यवस्था में बने रहने का विकल्प चुना है तो आप छड़ी लेकर उनके पीछे नहीं पड़ सकते.

मैं लगातार इस सरकार में बैठे लोगों को परम्परा और पुराने किस्म के मूल्यों के महत्व पर बोलते सुनता हूं. हमारी परम्परा ने हमें पैसे का सम्मान करना सिखाया. हमारे पालकों ने हमें बचत करना सिखाया. आप और मैं जो शहर में रहते हैं, हो सकता है बैंक में बचत रखते हों, लेकिन दसियों लाख लोग ऐसे हैं जो अपना पैसा नकदी और सोने में बचत करके रखते हैं, क्योंकि उन्हें इसी में भरोसा है. जब समृद्धि और प्रचुरता के वर्ष हों तो गांव की तुलनात्मक रूप से संपन्न महिला कोहनी तक सोने की चूड़ियां पहनी नज़र आती है.

सूखे और हताशा के दिनों में उसकी बाहें सूनी हो जाती हैं. घर का चूल्हा जलाए रखने के लिए सोना गिरवी रख दिया जाता है अथवा लेन-देन में इस्तेमाल कर लिया जाता है. ये अद्‌भुत महिलाएं ही कठिन वक्त में अपनी छिपाई हुई बचत से अपने परिवार बचाने में कामयाब होती हैं. इसे काला धन मानना गलत है.

यदि आप मुझे घिसा-पीटा मुहावरा कहने दें कि पैसे का कोई रंग नहीं होता. यह या तो टैक्स चुकाया हुआ होता है या न चुकाया हुआ. सच तो यह है कि कर चुकाया हुआ पैसा भी उतना ही भ्रष्ट पैसा हो सकता है (हथियार डीलर अच्छे करदाता होते हैं). कर न चुकाया हुआ सिर्फ इस तथ्य के कारण एकदम स्वच्छ हो सकता है, क्योंकि कानून कुछ लोगों को यह अनुमति देता है जैसे किसानों को आय पर कर नहीं देना पड़ता. यदि आप चाहते हैं कि ज्यादा लोग टैक्स दें तो कानून बदलकर और अधिक लोगों को कर दायरे में लाएं. यदि आप भ्रष्टों को पकड़ना चाहते हैं, आपको पता होता है कि वे कहां मिलेंगे.

लेकिन इतना व्यापक कदम उठाने से तो इस विशाल देश में फैले लाखों गरीबों और ठीक-ठाक आमदनी वाले ईमानदार लोगों पर चोट पहुंचेगी. हम जो लोग पर्यावरण की लड़ाई लड़ते हैं ट्रालिंग (जहाज से विशाल जाल डालकर मछली पकड़ना) के खिलाफ हैं, क्योंकि यह कुछ मछलियां पकड़ने के लिए अनावश्यक रूप से और क्रूर तरीके से लाखों समुद्री जीव नष्ट कर देता है.

ऐसे ही इतने बड़े पैमाने और जटिलता वाली अर्थव्यव्यवस्था में, जिसमें लाखों लोग हाशिये पर रहते हैं, उससे कहीं ज्यादा लोगों को चोट पहुंच सकती है, जितनी प्रधानमंत्री ने कल्पना की होगी. अच्छे इरादे हमेशा ही अच्छे फैसले नहीं देते. या दूसरों के दुर्भाग्य से आनंदित होने की वही पुरानी प्रवृत्ति हम सभी को संचालित करती है?

03.12.2016
, 20.22 (GMT+05:30) पर प्रकाशित