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आतंक के युद्ध में भितरघाती पाक

मुद्दा

 

आतंक के युद्ध में भितरघाती पाक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

 

 

पाकिस्तान सरकार की क्या इज्ज़त रह गई है ? क्या कोई उसे संप्रभु राष्ट्र की सरकार कह सकता है ? राष्ट्रपति ज़रदारी अमेरिकी टीवी चैनल से एक दिन कहते हैं कि तालिबान पाकिस्तान पर बस अब कब्जा करनेवाले ही हैं. वे सबसे बड़ा खतरा हैं. और दूसरे दिन वे तालिबान के आगे घुटने टेक देते है. स्वात घाटी में तालिबान के साथ 10 दिन के युध्द-विराम समझौते पर दस्तखत कर देते है. पता ही नहीं चलता कि वे आतंकवाद से युध्द लड़ रहे है या हाथ मिला रहे है. या तो पहले दिन वे झूठ बोल रहे थे या अब वे कोरा नाटक कर रहे हैं.

जरदारी


शायद वे दोनों कर रहे हैं. पहला बयान झूठा इसलिए था कि पाकिस्तानी फौज के मुकाबले तालिबान आतंकवादी मच्छर के बराबर भी नहीं है. अफगानिस्तान, पाकिस्तान और कश्मीर के सभी आतंकवादियों की संख्या कुल मिलाकर 10 हजार भी नहीं है. उनके पास तोप, मिसाइल, युध्दक विमान आदि भी नहीं हैं. वे फौजियों की तरह सुप्रशिक्षित भी नहीं हैं. लगभग 14 लाख फौजियों और अर्ध्द-फौजियोंवाली पाकिस्तानी सेना दुनिया की सातवीं सबसे बड़ी सेना है.

 

इतनी बड़ी सेना को 10 हजार अनगढ़ कबाइली कैसे पीट सकते हैं ? जो सेना भारत जैसे विशाल राष्ट्र के सामने खम ठोकती रहती है, जिसने धक्कापेल करके अफगानिस्तान को अपना पाँचवाँ प्रांत बना लिया था, जो जोर्डन के शाह की रक्षा का दम भरती रही है, वह तालिबान के आगे ढेर कैसे हो सकती है ? जिस सेना को बलूचिस्तान और सिंध के लाखों बागी डरा नहीं सके, वह क्या कुछ पठान तालिबान के आगे से दुम दबाकर भाग खड़ी होगी ?

ज़रदारी का बयान सच्चाई का वर्णन नहीं कर रहा था, वह अमेरिकियों को धोखा देने के लिए गढ़ा गया था. ज़रदारी यदि तालिबान का डर नहीं दिखाएँगे तो अमेरिकी सरकार पाकिस्तान को मदद क्यों देगी ? तालिबान का हव्वा खड़ा करके भीख का कटोरा फैलाना ज़रा आसान हो जाता है.

यदि तालिबान सचमुच इतने खतरनाक थे तो ज़रदारी सरकार को चाहिए था कि वह उन पर टूट पड़ती, खास तौर से तब जबकि ओबामा के विशेष प्रतिनिधि पाकिस्तान और अफगानिस्तान में थे. लेकिन हुआ उल्टा ही. स्वात घाटी और मलकंद संभाग के क्षेत्र में अब शरीयत का राज होगा. तहरीके-निफाजे-शरीयते-मुहम्मदी के नेता सूफी मुहम्मद को इतनी ढील बेनज़ीर और नवाज़ ने कभी नहीं दी थी, जितनी ज़रदारी ने दे दी है.

सूफी ने अपना शरीयत आंदोलन तालिबान के पैदा होने के पहले से शुरू कर रखा था. अफगानिस्तान में अमेरिकियों के आने के बाद सूफी की तहरीक में हजारों लोग शामिल हो गए. मुशर्रफ-सरकार ने सूफी को पकड़कर जेल में बंद कर दिया था. लेकिन उसे पिछले साल एक समझौते के तहत रिहा कर दिया गया. पाकिस्तानी सरकार मानती है कि सूफी नरमपंथी है और उसे थोड़ी-सी रियायत देकर पटाया जा सकता है. उसे मलकंद के तालिबान के खिलाफ भी इस्तेमाल किया जा सकता है. मलकंद के तालिबान के नेता हैं, मौलाना फज़लुल्लाह, जो कि सूफी के दामाद हैं. पिछले साल पाकिस्तान सरकार के साथ हुए छह सूत्री समझौते को जब फज़लुल्लाह ने तोड़ा तो सूफी ने फजलुल्लाह से कुट्टी कर ली लेकिन लगता है कि ससुर-दामाद ने अब यह नया नाटक रचा है.

स्वात के समझौते का यह नाटक पाकिस्तान की सरकार को काफी मंहगा पड़ेगा. इस समझौते के तहत सरकारी अदालतें हटा ली जाएँगी. उनकी जगह इस्लामी अदालतें कायम होंगी. जजों की जगह काज़ी बैठेंगे. वे शरीयत के मुताबिक इंसाफ देंगे. उनके फैसलों के विरूध्द पेशावर के उच्च-न्यायालय या इस्लामाबाद के उच्चतम न्यायालय में अपील नहीं होगी.

दूसरे शब्दों में स्वात के लगभग 15 लाख लोग अब 8वीं और 9वीं शताब्दी में धकेल दिए जाएँगे. लड़कियों के स्कूल बंद कर दिए जाएँगे. सारी औरतों को बुर्का पहनना पड़ेगा. सड़क पर वे अकेली नहीं जा सकेंगी. स्कूटर और कार चलाने का तो सवाल ही नहीं उठता. छोटी-मोटी चोरी करनेवालों के हाथ काट दिए जाएँगे. मर्द चार-चार औरतें रख सकेंगे. बात-बात में लोगों को मौत की सजा दी जाएगी.

ये सारे काम स्वात में पहले से हो रहे हैं. स्वात के मिंगोरा नामक कस्बे में एक चौक का नाम ही खूनी चौक रख दिया गया है, जहाँ लगभग एक-दो सिर कटी लाशें रोज़ ही टांग दी जाती हैं. लगभग पाँच लाख स्वाती लोग अपनी जान बचाकर वहाँ से भाग चुके हैं. तालिबान ने घोषणा कर रखी है कि उस क्षेत्र के दोनों सांसदों के सिर काटकर जो लाएगा, उसे 5 करोड़ रू. और जो सात विधायकों के सिर लाएगा, उसे दो-दो करोड़ का इनाम दिया जाएगा.

स्वात के जो निवासी ब्रिटेन और अमेरिका में नौकरियाँ कर रहे हैं, उनके रिश्तेदारों को चुन-चुनकर अपहरण किया जाता है और उनसे 5-5 और 10-10 लाख की फिरौती वसूल की जाती है. तालिबान के आतंक के कारण स्वात, जिसे एशिया का स्विटजरलैंड कहा जाता था, अब लगभग सुनसान पड़ा रहता है. पर्यटन की आमदनी का झरना बिल्कुल सूख गया है. यह स्वात, जिसे ऋग्वेद में सुवास्तु के नाम से जाना जाता था और जो कभी आर्य ऋषियों की तपोभूमि था, आज तालिबानी कट्टरपंथ का अंधकूप बन गया है. प्राचीन काल के अनेक अवशेषों को कठमुल्ले तालिबान ने ध्वस्त कर दिया है.

 

इस्लाम के नाम पर वे इंसानियत को कलंकित कर रहे हैं. वे सिर्फ स्वात पर ही नहीं, पूरे पाकिस्तान, अफगानिस्तान और भारत पर भी अपना झंडा फहराना चाहते हैं. स्वात के तालिबान कोई अलग-थलग स्वायत्त संगठन नहीं हैं. वे बेतुल्लाह महसूद के तहरीक़े-तालिबाने-पाकिस्तान के अभिन्न अंग है. यह महसूद वही है, जिसे बेनज़ीर भुट्टो का हत्यारा माना जाता है. आसिफ ज़रदारी की मजबूरी भी कैसी मजबूरी है ? अपनी बीवी के हत्यारों से उसे हाथ मिलाना पड़ रहा है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Alok Shrivastav ()

 
 भाई कार्तिकेय जी, ना कोई अहंकार है और ना कोई ब्लैकमेलिंग. पता नहीं क्यों आपको ऐसा लग रहा है. बस 13 साल पुरानी घटना याद आ गई. जिसने लाखों पाठकों की चहेती पत्रिका धर्मयुग उनसे छीन ली थी. और उस प्रकरण में भाई वैदिक जी की भूमिका भी याद आ गई. पता नहीं आप कौन हैं, और इस सच से क्यों इतना तिलमिला रहे हैं. 
   
 

Kumar kartikeya New delhi

 
 आलोक श्रीवास्तव की बातों में इतना अहंकार है कि समझ में नहीं आता कि वे किसे धमकी दे रहे हैं. क्या सुप्रीम कोर्ट औऱ मुंबई हाई कोर्ट के निर्णय की कॉपी आपने ब्लैकमेल करने के लिए रख छोड़ी है ? अगर नहीं तो कर दें जारी ? और इसके जारी करने से क्या होने या नहीं होने वाला है ?  
   
 

Alok Shrivastav ()

 
 मुंबई हाईकोर्ट और भारत के सुप्रीम कोर्ट ने टाइम्स ग्रुप और वेद प्रताप वैदिक के बीच हुए धर्मयुग के एग्रीमेंट को फ्रॉड ठहराया था. मगर यह केस धर्मयुग के employees ने I.D.Act के तहत अपने नौकरियों की बहाली के लिए डाला था. फ्रॉड एग्रीमेंट के लिए अगर ये केस क्रिमिनल कोर्ट में डाला जाता तो कहां होते वैदिक जी और उनकी रचनात्मकता ? क्रिमिनल कोर्ट में केस इसलिए नहीं डाला जा सका क्योंकि धर्म युग के employee सिविल कोर्ट के एक केस में काफी थक टूट चुके थे. बातें इतनी आसान नहीं होती, जैसी ये प्रशंसिका जी कह रही हैं, जनता की जानकारी के लिए सुप्रीम कोर्ट औऱ मुंबई हाई कोर्ट के निर्णय की कॉपी नेट पर जारी की जाए क्या ? 
   
 

Sunanda New delhi

 
 देश के कई कथित पत्रकार दूसरों के अनुवाद में अपना नाम लगा कर किताबें छाप रहे हैं, बेच रहे हैं, मुनाफा कमा रहे हैं, अनुवादक-लेखक को तरसा रहे हैं और प्रगतिशीलता के गुण गा रहे हैं. वैदिक जी ऐसे पत्रकारों से बेहतर हैं. आलोक श्रीवास्तव जी अगर आपमें रचनात्मकता है तो कुछ लिखिए पढिये. याद करिए, आपने आखरी बार कब लिखा था ? 
   
 

Alok Shrivastav () Mumbai

 
 Mahan Patrkar Vadik Ji
Dharmayug kab nikal rahi hai? 13 sal ho gay intzar karte karte. Us Agreement ki haqikat par bhi to kuch likhiye jo Fraud tha, aur jis par apke sighn the.
 
   

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