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गांधी तो सब के हैं

विचार

 

गांधी तो सब के हैं

रघु ठाकुर


शायद अब देश में सर्वाधिक उपेक्षा व अपमान के पात्र महात्मा गॉधी बन रहे है. ऐसा नही कि गॉधी के प्रति श्रद्वा रखने वालों की संख्या कम है, परन्तु उनके अनुयायी व सर्मथको की प्रतिक्रिया एकदम शंात या आपसी चर्चा और मन के अन्दर घुटते रहने की होती है. इसलिये उसकी अभिव्यक्ति आमजन तक नही पहॅुचती. अभी कुछ दिन पूर्व मीडिया में अमेरिकन अमेजॉन कम्पनी जो ऑनलाईन शॉपिंग करती, ने चप्पलो के ऊपर महात्मा गांधी का चित्र छाप दिया. 

padmavati


कम्पनी के संचालको ने यह चित्र क्यों छापा यह आष्चर्यजनक व खोज का विषय है? ऐसा नही है कि अमेरिका में लोग गॉधी को नही जानते या उनके मानने वालो की संख्या कम है. जहॉ मार्टिन लूथर किंग जैसे अष्वेत आन्दोलनकारी गॉधी के चित्र रखकर रंगभेद के विरुध आन्दोलन चलाते हो, जहॉ के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा महात्मा गांधी को अपना आर्दश व मार्गदर्शक मानते हो, वहॉ की कम्पनी या संचालक महात्मा गांधी को न जानता हो यह संभव नही. अगर नही जानते होते तो उनके चित्र को चप्पल पर क्यों छापते?

अमेजॉन कम्पनी के अधिकारियों में भारतीय हिस्से के अधिकारी (भारतीय चेप्ट्र) भारतीय मूल के भी लोग है और वो गॉधी से बखूबी वाकिफ है.

यह हो सकता है कि उनके वैचारिक रिष्ते ऐसी जमातो के साथ हो जो भिन्न-भिन्न कारणो से गॉधी के प्रति घृणा व विषवमन के मनोरोगी है. देश में कुछ ऐसी संस्थायें है जो महात्मा गांधी को उनके विकास में बड़ी बाधा मानती है, और इसीलिये गांधी के विरुद्व झूठा अपमान या निन्दा अभियान का कोई अवसर नही छोड़ती.

भारत-पाक विभाजन के समय जिन लोगों को कष्ट उठाना पड़ा जिन्हें संपत्ति या शारीरिक आघात सहना पड़े, वे महात्मा गांधी को बटॅवारे का गुनाहगार मानते है और कुछ संस्थाओं के लोग जो भारत-पाक विभाजन से भीतर से खुश है (क्योंकि पाकिस्तान बनने से करीब 18 करोड़ मुस्लिम आबादी पाकिस्तान में चली गई) तथा इन संस्थाओं व लोगो के स्वभावगत विरोधियों की संख्या कम हो गई, जिससे उन्हें अपने धर्म के नाम की सत्ता पाने का मार्ग सरल व प्रशस्त हुआ, फिर भी बंटवारे के लिये गॉधी को दोशी ठहराते है, और तर्क देते है कि, महात्मा गॉधी ने कहा था कि ’’बॅटवारा मेरी लाश पर होगा,’’ परन्तु बंटवारे के समय गॉधी जी ने प्राण क्यों नही त्यागें. हांलाकि बंटवारे के मात्र साढ़े चार माह के भीतर गॉधी जी की हत्या कर दी गई.

गनीमत है कि, अभी तक उनने यह कहना शुरु नही किया कि गोडसे ने तो गॉधी की इच्छा पूर्ति के लिये ही उनकी हत्या की थी, और देश के कुछ संगठनो के लोगो ने गांधी हत्या को गलैमराईज करने, तार्किक ठहराने तथा गोडसे को हिन्दू रक्षक सिद्व करने के लिये कानों कान भारी मुहिम चलाई तथा अभी भी ऐसे प्रचार का कोई अवसर इन संस्थाओं या मानस के लोग नही छोड़ते. हो सकता है, कि अमेजॉन के भारतीय संचालको के इनसे कोई वैचारिक या सम्पर्क इसके पीछे कारण हो पर यह तो विवेचना का विषय है.

परन्तु महात्मा गंाधी के चित्र को चप्पल पर छापना यह नस्लीय भेद भाव का अपराध है और भारत का अपमान भी है. क्या ये कम्पनियॉ किसी जाति या धार्मिक नेता के चित्र को इस ढंग से छापने का साहस कर सकते है? अगर वे किसी ऐसे व्यक्ति का चित्र छापते तो अभी तक देश में दंगा फसाद शुरु हो जाते, परन्तु गॉधी तो सबके है और गॉधी किसी के भी नही है. ईराक में सद्दाम हुसैन के कार्यकाल में होटल के बाहर प्रवेश द्वार पर बुश का चित्र बनाया था, जिसका एक परिणाम अमेरिका के द्वारा सद्दाम व ईराक को मिटाने को छेड़ा गया युद्ध हुआ.

अमेजॉन कम्पनी की घटना के बाद यद्यपि भारत सरकार ने कम्पनी के प्रति विरोध दर्ज कराया है परंतु यह अपर्याप्त है. भारत सरकार को अमेजान कम्पनी के संचालको के विरुद्व अपराधिक मुकदमें दर्ज कराना चाहिये तथा कम्पनी को भारत में व्यापार करने की अनुमति भी रद्व करनी चाहिये.

अभी कुछ दिन पूर्व खादी ग्रामोउद्योग बोर्ड ने जो कैलेन्डर व डायरी प्रकाशित की उसमें महात्मा गॉधी का चित्र नही था, तथा प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का चित्र छापा गया था. जिसमें वे चरखा चलाते दिखाई दे रहे थे. इस घटना पर देश में प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक थी. पिछले लगभग 80 वर्षो से देश और दुनिया में महात्मा गॉधी को आजादी व स्वतंत्रता का पर्याय माना जाता रहा है. जब मीडिया में और सोशल मीडिया में भी इनकी अलोचना शुरु हुई तो भाजपा समर्थक कुछ मित्रों ने इसका बचाव किया और कई प्रकार के कुतर्कों को तर्क बना कर पेश करने का प्रयास किया जैसे:-

1. श्री नरेन्द्र मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद देश में खादी की बिक्री में 37 प्रतिषत की वृद्वि हुई, जो कि समान्य तौर पर 7 प्रतिशत की होती थी. दिल्ली के कनॉटप्लेश के खादी भंडार में 1 करोड़ की खादी बिकी. बिक्री में इस बृद्वि के आकॅाडों के बारे में मेरे पास कोई तत्थात्मक सूचना स्रोत्र नही है तथा यह कोई आधार भी नही बनता परन्तु मेरा प्रश्न यह कि बिक्री में वृद्वि हुई, तो क्या इसके लिये गॉधी जी का चित्र हटाना जरुरी था?

2. भाजपा सरकार के हरियाणा के मंत्री श्री अनिल विज जी ने कहा कि कुछ ही समय में गांधी नोट पर से भी हट जायेगे. याने एक प्रकार से उन्होंने इसे सरकारी तंत्र से गांधी को हटाने की योजना का हिस्सा माना है. इसका निस्कर्श यही निकल सकता है कि धीरे-धीरे महात्मा गांधी की स्मृतियों को शासन तंत्र के माध्यम से विलोपित कर उन्हें मिटाया जाये, और गॉधी को विस्मृत किया जाये. हॉलाकि भाजपा ने अधिकृत तौर पर उनके इस बयान का खंडन किया तथा श्री अनिल विज ने अपने कथन को वापिस भी ले लिया. परंतु शब्दों को वापिस लेने से न विचार परिवर्तन होता है न प्रायष्चित होता है. अगर भाजपा श्री अनिल विज को इस कथन के लिये पद मुक्त करती तो देश में भाजपा के गांधी के प्रति सम्मान को लेकर आशंकाये निर्मूल होती. लोगों की शंका के कारण भी है क्योंकि भाजपा और संघ अभी तक आम लोगो के मन में गॉधी के मानने वाली संस्था नही है.

3. कुछ मित्रो ने यह भी तर्क चलाया कि ’’खादी का अविष्कार महात्मा गंाधी ने नही किया था.’’ उनकी बात सही है परन्तु यह अधूरा सत्य है. खादी व चरखे से सूत का काता जाना गांधी जी के चरखे और खादी के प्रयोेग के पहले भी बुनकरों का व्यवसाय था, जो मशीनी उत्पादन के अभाव में या पूर्व में ग्रामीण अंचलो में प्रयोग होता था. परन्तु जब महात्मा गांधी ने चरखा व खादी को स्वदेशी की दिशा दी व उसे आजादी के आंन्दोलन का नारा बना दिया तथा लाखो करोड़ो लोगो को उसके प्रयोग के लिये तैयार किया था, तब न केवल चरखा और खादी की पुनः स्थापना हुई बल्कि ब्रिटेन के लंका शायर के कारखाने जो भारतीय कपास से कपड़ा तैयार करते थे और भारत को बेचते थे लगभग बंद हो गये. जब महात्मा गांधी गोल मेज सम्मेलन में लंदन गए थे तब वहॉ के कपड़ो मिलो के मजदूरों ने महात्मा गांधी का तीखा विरोध किया था. उनको लगता था कि खादी ने स्वदेशी के प्रयोग से उनका रोजगार और संपन्नता छीन ली है. मैं उन तर्क देने वाले मित्रो से कहना चाहॅूगा कि योग की शुरुआत पंतजलि ने की थी परन्तु आजकल योग, बाबा रामदेव के नाम का पर्याय बन गया है, जबकि बाबा रामदेव ने कोई योग की खोज नही की, बल्कि योग का पुनःप्रयोग कर, उसे बेचा है.

4. महात्मा गांधी ने अपना सूत कात कर खादी पहनने का कार्यक्रम दिया था. वे स्वतः नियमित चरखा चलाते थे. उनके लिये खादी वस्त्र नही बल्कि विचार था और इसलिये देश में गांधी और खादी परस्पर एकाकार है.

5. मैं जानता हूं कि भारत सरकार के इतने विशाल तंत्र में खादी ग्रामोद्योग बोर्ड बहुत छोटे पायदान की संस्था ही हो सकती है. हो सकता है कि, प्रधानमंत्री को इसकी जानकारी ही न हो या इसकी अनुमति नही ली गई हो, परन्तु प्रधानमंत्री को स्वतः इसे रोकना चाहिये व महात्मा गांधी की फोटो को लगाने का दिशा निर्देश देना चाहिये. अगर वो यह करेंगे तो नौकरशाही व राजनीति के चाटुकार तंत्र को संदेश मिल जायेगा. प्रधानमंत्री की अप्रसन्नता के समाचार, समाचारपत्रो में छपे है, पर और भी अच्छा होता अगर वे स्पष्ट निर्देश देते कि डायरी आदि का पुनः प्रकाशन किया जाये तथा गांधी जी के चित्र को यथावत छापा जाये. बतौर प्रधानमंत्री या खादी की बिक्री को प्रोत्साहनकर्ता के रुप में अगर उनका चित्र महात्मा गांधी के बाद अगले पेज पर लगता तो कोई अपत्ति नही होती.

6. महात्मा गांधी के विरुद्व एक सुनोयोजित अभियान देश और दुनिया में चल रहा है. कुछ अति वामपंथी भी अपनी हिंसा की विचारधारा को तर्कसंगत सिद्व करने व, महात्मा गांधी को, लॉछित करने और उन्हें गलत ढंग से प्रस्तुत करते है. पिछले दिनो भारत के राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी अफ्रीकी देश घाना गये थे तथा वहॉ विश्वविद्यालय प्रांगण में महात्मा गांधी की प्रतिमा स्थापित कर के आये थे. अभी कुछ दिनो पूर्व महात्मा गांधी की प्रतिमा को विश्वविद्यालय प्रांगण से हटाने का अभियान चलाया गया. इसके लिये जो आधार पत्र जारी किया गया उसमें गॉधी जी को गलत ढ़ंग से उद्यत किया गया तथा गॉधी की प्रतिमा को हटाने का एक आधार बनाया गया.

इस आधारपत्र में, भारत में जन्मी एक वामपंथी लेखिका श्रीमति अरुधती राय के लेख का संदर्भ लिया गया है जिसमें उन्होंने महात्मागांधी को रंग भेद का पक्षधर सिद्व करने का प्रयास किया था. हैदराबाद के मुस्लिम नेता ओबैसी ने भी गांधी जी को कमतर सिद्व करने वाले बयान दिये है. मेरा विष्वास है कि, अतंतः गांधी सही सिद्व होगे. तथा गांधी का व्यक्तिव और विशाल बन कर उभरेगा तथा उनके सत्य की विजय होगी. सूरज पर थूकने के प्रयास करने वाले केवल स्वतः अपने ही ऊपर थूकते है. कई गांधी को नकारने व आरोपित करने वाले क्रंमषः गांधी को स्वीकारने लगे है, भले ही आंशिक रुप में. मुझे उम्मीद है कि, कालांतर में, ये नये विषवमन की ताकतें भी निस्तेज हो जायेंगी. परंतु हमें राष्ट्रपिता के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करना होगा. हम केवल नियति व अति विष्वास के आधार पर निष्क्रिय समर्थक बन कर अपना दायित्व निर्वहन नही कर सकते.

01.03.2017, 16.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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