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गुणवत्ता विलासता नहीं जो टैक्स लगाएं

विचार

 

गुणवत्ता विलासता नहीं जो टैक्स लगाएं

प्रीतीश नंदी


मैं विलासिता के विचार से ही प्राय: चकरा जाता हूं. इतिहास की अपनी अतिवादी परिभाषाएं हैं लेकिन, आज की दुनिया के ज्यादातर हिस्से में विलासिता यानी लग्ज़री को शानदार ब्रैंड्स से परिभाषित किया जाता है. वे प्राय: (हमेशा नहीं) अपने समकालीनों से महंगे होते हैं.
 

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यह मैं इसलिए कह रहा हूं,क्योंकि हमारे कानून निर्माता मानते हैं कि जो कुछ महंगा और आम आदमी की पहुंच से दूर है वही लग्ज़री है और इसलिए उस पर टैक्स लगाना चाहिए. यह पुरानी समाजवादी धारणा का अंग है कि जिसका आम आदमी खर्च नहीं उठा सकता, उस पर खूब टैक्स लगा देना चाहिए, क्योंकि धनी को सबक सिखाने की जरूरत है.

इस प्रक्रिया में लग्ज़री का विचार बहुत ही विकृत हो गया है. लग्ज़री का कीमत से संबंध ही नहीं है. पूरा मामला रहस्यमय है. कई कीमती ब्रैंड दशकों तक संघर्ष करते हैं पर कहीं नहीं पहुंचते. लग्ज़री का आइडिया तो केवल कुछ सफल ब्रैंड ही परिभाषित करते हैं, जिन्होंने अपनी विरासत गढ़ी है, अनोखी गुणवत्ता के जरिये और बहुत सावधानी से संवारे गए हुनर, उत्कृष्टता से. कभी लग्ज़री सिर्फ वही होती थी,जिसका खर्च सिर्फ धनी वर्ग वहन कर सकता था.

आज हर कोई लग्ज़री की आकांक्षा रखता है, क्योंकि इतने बरसों में लग्ज़री और उत्कृष्टता एक हो गए हैं. उत्कृष्टता का आनंद लेना यानी लग्ज़री अफोर्ड करना और लग्ज़री का आनंद लेने का मतलब है श्रेष्ठता को अफोर्ड करना. यही वजह है कि दुनियाभर में विलासिता को इतनी गंभीरता से लिया जा रहा है. अब यह धनी को गरीब से अलग नहीं करती.

मानवीय और प्राय: टेक्नोलॉजी के कमाल की तलाश दोनों को साथ ला देती है. सच है कि कुछ ही लोग ही इसका खर्च उठा सकते हैं. किंतु, यदि आप इन प्रोडक्ट्स पर अन्यायपूर्वक टैक्स लगाकर उन लोगों को सजा देने का निर्णय लें, जो इसका खर्च वहन कर सकते हैं, तो आप बदलाव का रास्ता रोककर खड़े हो जाते हैं. यह इस रोमांचक समय में आत्मघाती गोल करने जैसा काम है.

मैं ऐसे प्रोडक्ट देखते हुए बड़ा हुआ हूं,जिन्हें किसी समय विलासिता समझा जाता था और वे धीरे-धीरे सिर्फ सुविधा के आइटम बनकर रह गए. मेरा पक्का विश्वास है कि जिसे हम आज लग्ज़री कहते हैं, वे जल्दी ही कई और लोगों की पहुंच में आ जाएंगे. आज किसी हवाई जहाज में सवार होना ट्रेन में बैठने से सस्ता है.

कल हो सकता है एयर टैक्सी, ड्राइविंग से भी सस्ती हो जाए. इस बदलाव को सजा देने की बजाय प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए. मैं कुछ उदाहरण देता हूं. जब मैं बच्चा था, मुझे याद है पहला फ्रिज जो हमारे मध्यवर्गीय घर में आया था. तब किसी ने उसे सुविधा देने वाले ऐसे प्रोडक्ट के रूप में नहीं देखा था, जो जिंदगी को आसान बनाने के लिए था. तब इसे धनी लोगों के लग्ज़री प्रोडक्ट के रूप में देखा गया था, जो इसकी कीमत चुका सकते थे. इसलिए उस पर लग्ज़री टैक्स लगा दिया गया. इतने बरसों बाद वह टैक्स मूर्खतापूर्ण लगता है.

मुझे जब जॉब मिला था तो मुझे याद है कि मैंने टीवी खरीदा था. फ्रिज की तरह ही यह श्वेत-श्याम टीवी बहुत खराब गुणवत्ता का था, जिसे सरकारी कंपनी ने बनाया था और दूसरों की तरह मुझे भी इसके लिए कतार में इंतजार करना पड़ा था. डिलिवरी के लिए छह माह लग गए. मुझे किराये पर टैक्सी लेनी पड़ी और फिर मैं उस दुकान पर पहुंचा, जिसने टीवी बेचा था.

एक हफ्ते बाद जब इसने मुझे तकलीफ देना शुरू किया, जैसा उन दिनों सभी टीवी देते थे; तो मुझे खुद टीवी लेकर दुकान पर जाना पड़ा. उन्होंने टीवी को देखे बगैर ही मुझसे मरम्मत की कीमत वसूल ली. मुझे आश्वासन दिया कि इसे छह हफ्ते में ठीक कर दिया जाएगा. मुझे चार माह बाद टीवी वापस मिला (मजे की बात है कि उसके लिए भी मैंने लग्ज़री टैक्स भरा था).

उसके बाद मेरी पहली कार आई. हालांकि मुझे नहीं लगता कि इस पर कोई लग्ज़री टैक्स लगा था. लेकिन, इस पर भारी टैक्स लगाए गए थे, क्योंकि उन दिनों हर कार लग्ज़री कार थी. मुझे डिलिवरी में 15 दिन लग गए. फिर से डिलिवरी का मतलब था शोरूम में जाना, उसे लेना तथा चलाकर पास के पेट्रोल पम्प पर ले जाना.

तब सारे कार शोरूम के पास पेट्रोल पम्प होते थे, क्योंकि कार की डिलिवरी लेने का मतलब था तत्काल पेट्रोल भराने की जरूरत, कोई आपको मुफ्त पेट्रोल नहीं देता था. घर जाते हुए अगला स्टाप कंपनी की आधिकारिक रिपेयर शॉप होती थी, जहां आपको नई कार ले जाकर उसकी खामियों का पता लगवाकर उसे ठीक करवाना होता था. यह मारुति के पहले का युग था. नई कारें समस्याएं लेकर ही आती थीं और रिपेयर शॉप उन्हें ठीक करने में हफ्तों लगा देती थीं. वे उसका पैसा भी वसूल करते थे.

यह तो बात हुई उन लग्ज़री प्रोडक्ट की, जिनके साथ मैं बड़ा हुआ. च्वॉइस तब सबसे बड़ी लग्ज़री होती थी. दो ही प्रकार के फ्रिज थे, टीवी के दो ही ब्रैंड थे और कारों की दो किस्में थीं. इन पर भी राशन था. गुणवत्ता पर कोई बात नहीं करता था. आपको जो मिल जाता, आप स्वीकार कर लेते.

यदि आप लाइन तोड़ना चाहते हैं, तो आपको रिश्वत देनी पड़ती थी. सौभाग्य से उसके बाद से बहुत कुछ बदल गया है. अब तो पूरी दुनिया जानती है कि विलासिता और गुणवत्ता पर्यायवाची है पर हमने अब भी अपनी आंखों पर समाजवादी पट्‌टी बांध रखी है और उन प्रोडक्ट पर सजा देने की हद तक टैक्स लगा देते हैं, जिन्हें हम लग्ज़री समझते हैं. नतीजा यह है कि हमारे बाजार खराब, घटिया सामानों से अटे पड़े हैं, जबकि वे गुणवत्तापूर्ण ब्रैंड जिन्हें आप उत्कृष्टता से जोड़ते हैं, वे पहुंच से दूर बने हुए हैं. वे समृद्धि के प्रतीक बन गए हैं, विशिष्टता के नहीं.

इसका खतरा यह है कि हम खुद के द्वारा अपने पर थोपे गए घटियापन में फंस गए हैं, अब नया युग है. अब आंखों से पट्‌टी हटाकर दुनिया के साथ एक होने का वक्त है. हम सब उत्कृष्टता से प्रेरित होने चाहिए फिर चाहे हम उसका खर्च उठाने में समर्थ हों अथवा न हों.

नैतिकता, सामाजिक न्याय और धनी वर्ग को दंडित करने के औजार के रूप में करों का इस्तेमाल करने के हमारे विचारों की उलझनें सुलझा लेनी चाहिए. धनी वर्ग नहीं, अब तो गरीबी, भ्रष्टाचार, पूर्वग्रह और नफरत हमारे शत्रु हैं.

आज के भारत में हर कोई गुणवत्ता चाहता है और तथ्य तो यह है कि इसका उन्हें हक है. उन्हें इससे वंचित करने के लिए करारोपण का उपयोग न करें

20.04.2017, 15.15 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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