पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

कश्मीर में समाधान की राह

गलत कर्ज नीति के कारण कृषि संकट

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

कश्मीर में समाधान की राह

गलत कर्ज नीति के कारण कृषि संकट

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
  पहला पन्ना >इरफान इंजीनियर Print | Share This  

अयोध्या विवाद: इतिहास और प्रकृति-1

विचार

 

अयोध्या विवाद: इतिहास और प्रकृति-1

इरफान इंजीनियर


उच्चतम न्यायालय ने 21 मार्च, 2017 को रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद प्रकरण के दोनों पक्षों को आपसी बातचीत के जरिए मिल-बैठकर विवाद को सुलझाने का सुझाव दिया. मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि अगर दोनों पक्ष राजी हों तो वे बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका अदा करने के लिए तैयार हैं..

ayodhya


इउच्चतम न्यायालय ने यह टिप्पणी सुब्रमण्यम स्वामी के एक आवेदन पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें उन्होंने यह अनुरोध किया था कि रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद प्रकरण में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के दिनांक 30 सितंबर, 2010 के निर्णय के विरूद्ध दायर अपील की जल्द सुनवाई की जाए. सुब्रमण्यम स्वामी भाजपा सांसद हैं और वे इस प्रकरण में पक्षकार नहीं हैं. इसके बाद भी उच्चतम न्यायालय ने अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल करते हुए न केवल उपरोक्त टिप्पणी की वरन् सुब्रमण्यम स्वामी से यह भी कहा कि वे दोनों पक्षों से बातचीत कर उनके बीच चर्चा का मार्ग प्रशस्त करें.

यह कहना मुश्किल है कि क्या सुब्रमण्यम स्वामी ने यह आवेदन प्रधानमंत्री के कहने पर प्रस्तुत किया था परंतु यह अवश्य है कि इस आवेदन का कुछ न कुछ संबंध उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा की भारी जीत से है. यद्यपि इस चुनाव में भाजपा ने ‘सबका साथ, सबका विकास‘ के नारे के साथ विकास के मुद्दे पर लोगों से मत मांगे थे परंतु भाजपा को शायद यह लग रहा है कि उस स्थल पर राममंदिर का निर्माण करने का यह सबसे अच्छा मौका है, जहां बाबरी मस्जिद उसके गैर-कानूनी ढंग से ध्वस्त कर दिए जाने के पूर्व, कम से कम 464 वर्षों से खड़ी थी.

अपील के पक्षकारों ने मामले की जल्द सुनवाई के लिए अदालत से अनुरोध करना उचित नहीं समझा. उच्चतम न्यायालय में लाखों प्रकरण लंबित हैं जिनमें से कई बहुत महत्वपूर्ण हैं. इसके बाद भी अदालत ने अपना कीमती समय इस विवाद के संबंध में एक ऐसे व्यक्ति के आवेदन को सुनने में बर्बाद किया जिसे इस मामले में सुने जाने का अधिकार ही नहीं है. क्या अदालत को इस प्रश्न पर विचार नहीं करना था कि वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य में इस प्रकरण का एक पक्षकार बहुत मजबूत स्थिति में है जबकि दूसरा पक्षकार बचाव की मुद्रा में और कमजोर है.

एक पक्षकार को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार पहले से ही विवादित भूमि के दो-तिहाई हिस्से पर हक दिया गया है और अब वह पूरी जमीन पर कब्जा जमाना चाहता है. ऐसे में, अगर दूसरा पक्षकार उसका विरोध करता है तो उसके समुदाय की सुरक्षा के खतरे में पड़ने के साथ-साथ, उस पर दुराग्रही होने का आरोप भी लगाया जा सकता है. इस विवाद का बातचीत से हल निकालने के प्रयास पहले भी हुए हैं और ये सभी प्रयास असफल साबित हुए.

एक प्रयास शंकराचार्य और कुछ मुस्लिम धार्मिक नेताओ द्वारा किया गया था. इस पहल का मुस्लिम नेताओं ने स्वागत किया था. उन्हें यह आशा थी कि इससे समस्या का सौहार्दपूर्ण ढंग से हल निकाला जा सकेगा. परंतु संघ परिवार इसके खिलाफ था क्योंकि वह नहीं चाहता था कि उसके बगैर कोई समझौता हो. मीडिया में इस आशय की खबरें छपवाईं गईं कि शंकराचार्य, राम के नहीं वरन शिव के भक्त हैं. इसके बाद शंकराचार्य ने अपने पांव पीछे खींच लिए.

अगर अयोध्या के रहवासियों पर इस विवाद का हल छोड़ दिया जाता तो वे बहुत पहले इसे सुलझा चुके होते. अयोध्या के सबसे बड़े मंदिर हनुमानगढी के मुख्य पुजारी महंत ज्ञानदास ने मंदिर प्रांगण में मुसलमानों के लिए रोजा अफ्तार का आयोजन किया था और मंदिर के स्वामित्व की भूमि पर बनी मस्जिद की मरम्मत करवाई थी. मुसलमानों ने अनेक बार महंत ज्ञानदास को विभिन्न मस्जिदों में आने का निमंत्रण दिया और वे वहां गए भी. जिस समय रामजन्मभूमि आंदोलन अपने चरम पर था उस समय भी अयोध्या में हिन्दुओं और मुसलमानों के रिश्ते सौहार्दपूर्ण थे. आंदोलनकारी तो बाहरी व्यक्ति थे.

रामजन्मभूमि के मंहत लालदास ने भी विहिप-भाजपा के नेतृत्व में चलाए जा रहे रामजन्मभूमि आंदोलन का विरोध किया था. उनकी हत्या कर दी गई और उनके हत्यारों का आज तक कोई पता नहीं चल सका है. इस मुद्दे को सुलझाने का आखिरी प्रयास हाशिम अंसारी द्वारा किया गया था जो इस मामले में सबसे पुराने पक्षकार थे. वे एक बहुत सरल और सीधे-सच्चे व्यक्ति थे और एक छोटे से झोपड़े में रहते थे. इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय के कुछ महीनों बाद उनकी मृत्यु हो गई.
आगे पढ़ें

Pages:

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in