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हमारे सपनों की आज़ादी

मुद्दा

 

हमारे सपनों की आज़ादी

प्रीतीश नंदी


कोलकाता में युवावस्था में मैंने पूर्वी पाकिस्तान के स्वतंत्रता संघर्ष को बहुत निकट से देखा. वहां हुआ युद्ध दो बातों पर आधारित था. एक, बंगाली भाषा के साथ पश्चिमी पाकिस्तान के शासकों का अपमानजनक व्यवहार. वे उर्दू को राष्ट्रीय भाषा बनने पर तुले हुए थे ताकि देश को एकजुट कर सकें.  

सपने


यह हमेशा से तानाशाही शासन का सपना रहा है कि विविधता को नष्ट करें और राष्ट्रवाद के वेश में आमसहमति को बलपूर्वक लागू करें. दो, सरकार और वहां तैनात पाकिस्तानी सेना की धौंस में न आने से पूर्वी पाकिस्तान के युवा छात्रों का साहसी इनकार. शिक्षा परिसर विरोध का अग्रिम मोर्चा थे. कविता इस युद्ध का तोपखाना बन गई.

रवींद्रनाथ टैगोर उनकी प्रेरणा थे और बंगलादेश के कवियों के शब्दों से हथियार की तरह लैस युवाओं ने निडर होकर उस शक्तिशाली पाकिस्तानी सेना का सामना किया, जो उस वक्त अजेय लगती थी. युद्ध के मेरे पसंदीदा कवियों में से एक थे शम्स-उर-रहमान.

हम भी तब बहुत गुस्सा हुए थे जब हम पर हिंदी थोपने के प्रयास किए गए थे. इसे शासकों, उत्तर प्रदेश व बिहार के उन लोगों की भाषा समझा जाता था, जो दिल्ली को चलाते थे और सारी नीतियां मोटेतौर अपने हित में बनाते थे. हम इसे हिंदी साम्राज्यवाद की तरह देखते थे. इसीलिए हम सहजता से पूर्वी पाकिस्तान के युवा छात्रों के साथ जुड़ गए.

मैंने तब सीमा पार के कई कवियों की कविताओं का अनुवाद किया था. उनमें से एक आजादी पर लिखी शम्स उर रहमान की प्रसिद्ध कविता थी. अब तो मुझे मेरे अनुवाद के ठीक-ठीक शब्द याद नहीं है लेकिन, यह कविता कुछ ऐसी थी. कुछ अंश :

स्वतंत्रता, तुम/ टैगोर की अमर कविता हो, उनके शब्द जो कभी नहीं मिटेंगे/स्वतंत्रता, तुम/ काजी नजरुल हो, बेतरतीब बालों वाले कवि अपनी ही रचना से उन्मादित/स्वतंत्रता, तुम/भाषा दिन पर शहीद स्मारक पर उमड़ी बावली भीड़ हो/ स्वतंत्रता, तुम/ आगे बढ़ते जुलूस में ऊंचा उठाया ध्वज, ऊंचे स्वर में लगाए गए नारे हो/ स्वतंत्रता, तुम/ खेतों में काम करता किसान, पसीने से चमकती उसकी देह हो/ स्वतंत्रता, तुम/ गांवों के पोखर में तैरती लड़की हो/ स्वतंत्रता, तुम/ धूप में तपकर तांबे जैसी हो गई फैक्ट्री वर्कर की भुजा हो/ स्वतंत्रता, तुम/ अंधेरे में टोह लेती स्वतंत्रता सेनानी की आंखों की चमक हो.../स्वतंत्रता, तुम/श्रावण में उमड़ रही मेघना नदी हो/ स्वतंत्रता, तुम/ मेरे पिता की नमाज़ की सुंदर चटाई हो, छूने में मखमल/...स्वतंत्रता, तुम/ फूलों के बगीचे, पक्षियों का गीत, बरगद की पत्तियों की सरसराहट के बीच मौजूद मेरा मकान हो/ वह कविता हो जो मैं अपनी पत्रिका में जैसी मर्जी हो वैसी लिखता हूं.

अंतिम पंक्ति सबकुछ कह देती है. ‘स्वतंत्रता’ की जगह ‘आज़ादी’ लिख दीजिए और आप समझ जाएंगे कि हमारे छात्र अपने लड़खड़ाते शब्दों में क्या कहने का प्रयास कर रहे हैं. चाहे जेएनयू हो या बीएचयू या जहां भी वे विरोध कर रहे हों. कॉलेज के सर्वश्रेष्ठ साल कॅरिअर की दिशा में पढ़ने के लिए नहीं हैं.

वे यह बताने के लिए हैं कि आपका दिल कहां पर है, आप की अंतरात्मा क्या कहती है. यही सीखते हुए तो हम बड़े हुए. हमने भी यही किया. जब हमने विरोध का परचम लहराया और उसके लिए खड़े हुए, जो हमें लगता था कि सही है. यह वह राष्ट्रवाद था, जो हमने टैगोर, विवेकानंद और विद्यासागर से सीखा था, वह सपना था.

आपातकाल के महीनों में जयप्रकाश नारायण ने हमें यही सिखाया. विद्यार्थी हमेशा राष्ट्रीय राजनीतिक का मंच तैयार करते हैं. यही वजह है कि सारे कैंपस में छात्र संगठन संघ परिवार की छात्र इकाई एबीवीपी को हराने के लिए एकजुट हो रहे हैं. जेएनयू हो, हैदराबाद यूनिवर्सिटी हो, गुवाहाटी हो या दिल्ली यूनिवर्सिटी या राजस्थान यूनिवर्सिटी पैटर्न एक ही दिखाई देता है. महसूस किया जा सकने वाला बदलाव दिख रहा है.

भिन्न राजनीतिक संबंधों वाले भिन्न गुट शक्तिशाली एबीवीपी का सामना करने के लिए एकजुट हो रहे हैं- और हां बार-बार जीत भी रहे हैं. हम सबके लिए इन छात्रों से यह सीखने का वक्त है कैसे एक विजेता टीम तैयार की जाती है.

और नए भारत को कैसे समर्थन दें जो पैसे व शक्ति के फैंटसीपूर्ण वादों के आगे जाता है (कमर तोड़ करों के भी, जिसने हम सबको पंगु बना दिया है). और कैसे उस नए राष्ट्र के बारे में बात करें जो उम्मीद, बदलाव और घिसे-पिटे अतिराष्ट्रवाद और बेलगाम नफरत के आगे देखने के साहस की राजनीति पर आधारित है. यही वह भारत होगा जिसके साथ आप, मैं और हमारे आसपास का हर व्यक्ति अपनी पहचान जोड़ सकेंगे.

20.10.2017
, 21:00 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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