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महिलाओं से घबराने वाला समाज

विचार

 

महिलाओं से घबराने वाला समाज

प्रीतीश नंदी


पिछले हफ्ते सुर्खियां बनाने वाली तीनों फिल्में (दो भारतीय फिल्में गोवा के अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह से निकाल दी गईं, जबकि जूरी इन्हें प्रदर्शित करना चाहती थी और एक बड़ी व्यावसायिक फिल्म को रिलीज करने की तारीख आगे बढ़ानी पड़ी, जब फिल्म निर्देशक का सिर और प्रमुख अभिनेत्री की नाक काट डालने की धमकी दी गई) मजबूत महिला किरदारों पर केंद्रित हैं. 

nude movie


इसके पहले कुख्यात निहलानी युग में जिन फिल्मों को सेन्सर बोर्ड ने रोका वे भी ऐसी ही फिल्में थीं. ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ को इसी आधार पर मंजूरी नहीं दी गई कि ‘यह महिला उन्मुख फिल्म है, जिसमें ‘जीवन से परे जातीं उनकी फैंटसी हैं’. अब इसका जो भी मतलब हो.

आश्चर्य है कि हम सेंसरशिप के ऐसे दौर में हैं, जिसमें फिल्मों पर सिर्फ उनकी राजनीति के कारण ही प्रतिबंध नहीं लगाया जाता. वैसी फिल्मों के तो बहुत उदाहरण हैं. शुरुआत ‘किस्सा कुर्सी का’ से हुई थी, जिसे इमरजेंसी के दौरान प्रतिबंधित करने के साथ उसका प्रिंट भी जला दिया गया था, क्योंकि फिल्म ‘असंभव-सी और नैतिक रूप से गिराने वाली कहानी’ कहती थी.

इसमें बताया गया था कि कैसे चुनाव के दौरान दो प्रतिद्वंद्वी दलों के प्रत्याशियों को तीसरे दल ने रिश्वत देकर नाम वापस लेने पर राजी कर अपने उम्मीदवार को मैदान में उतार दिया (मजे की बात है कि 40 साल बाद ठीक यही हर चुनाव में हो रहा है).

अब फिल्मकारों को महिलाओं और ‘जीवन से परे जाती उनकी फैंटसी’ के मुद्‌दे उठाने के लिए परेशान किया जा रहा है. हम कौन-सी फैंटसियों की बात कर रहे हैं? मलायम फिल्म सेक्सी दुर्गा का नाम बदलकर एस. दुर्गा करने पर भी फिल्म महोत्सव में इसका प्रदर्शन रोक दिया गया. यह एक आप्रवासी युवती दुर्गा की सरल-सी कहानी है, जो कबीर नाम के युवा के साथ रात को भाग जाना चाहती है.

दो गुंडे उन्हें इस वादे के साथ अपनी कार में बिठा लेते हैं कि वे उन्हें नज़दीक के रेलवे स्टेशन पहुंचा देंगे. पूरी फिल्म देर रात सुनसान सड़क की उस खौफनाक कार यात्रा पर केंद्रित है, जिसमें वे लोग खतरनाक ढंग से लड़की को घूरते हैं और उन्हें कार से उतरने भी नहीं देते.


बीच में केरल के गांव के दृश्य बताए गए हैं, जिसमें एक उत्सव के दौरान दुर्गा के रौद्र रूप काली के भक्त खुद को लोहे के हुक और छड़ों से छेदते हैं ताकि वे पापों से मुक्त हो सकें. बिना पटकथा के एक ही रात में शूट की गई शशिधरन की फिल्म को उस घटना में गहरी अंतर्दृष्टि डालने के लिए सराहना मिली है, जिसका सामना प्रतिदिन हर महिला को करना पड़ता है- आंखों से घूरकर कर किया गया दुष्कर्म. कोई हिंसा नहीं दिखाई गई है फिल्म में है केवल खौफ, जो हर महिला रोज महसूस करती है.


जिस दूसरी फिल्म को प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई वह राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त निर्देशक रवि जाधव की मराठी फिल्म ‘न्यूड’ है, जिसका चयन फिल्मोत्सव में भारतीय पेनोरमा के शुभारंभ के लिए किया गया था. यह एक महिला के बारे में है, जो निर्धन है और कलाकारों के लिए मॉडल बनने का काम करती है ताकि आजीविका कमा सके. लेकिन, समाज ऐसे पेशे को जिस तरह देखता है उसके कारण वह बेटे को भी नहीं बता सकती कि वह क्या काम करती है.

उसकी दृढ़ता, उसका साहस, ज़िंदगी को आंखों में आंखें डालकर देखने की योग्यता फिल्म को इतना प्रभावशाली बनाती है कि आलोचकों ने इसे उस क्षेत्रीय फिल्म का शानदार उदाहरण माना है, जो रोज के जीवन से थीम उठाकर उसे नए धरातल पर ले जाता है.

हां, दोनों फिल्मों ने महिलाओं और ‘जीवन से परे जाती उनकी फैंटसी’ पर एक ऐसे माध्यम में फोकस करने का साहस किया है, जहां परम्परागत रूप से पुरुष ही केंद्र में रहे हैं. दोनों ऐसी समस्याओं को लेती हैं, जिनका सामना महिलाएं हमारे समाज में करती हैं. शायद इसी ने हर किसी को विचलित कर दिया है- यह असली महिला की आवाज है.

यह ऐसी महिला नहीं जिसे आमतौर पर हम हमारी फिल्मों में देखते हैं. यह वास्तविकता, सच की आवाज है. हम जानते हैं कि राजनीति में भी इसके लिए कोई जगह नहीं है. यह रवैया सपने बेचने के व्यवसाय में ही मौजूद है.

अब तीसरी फिल्म की बात करें, वह जिसने सबसे ज्यादा सुर्खिया बटोरीं : संजय लीला भंसाली की ‘पद्‌मावती’, जो आठ दिन बाद रिलीज होनी थी पर होगी नहीं. इस बार तो हमें सेंसर बोर्ड की राय भी नहीं मालूम, क्योंकि सेंसर बोर्ड के लिए इसका प्रदर्शन भी नहीं हुआ है. सेंसर के लिए प्रदर्शन इस आधार पर रोक दिया गया कि जमा किया गया फार्म अधूरा है.

निर्माताओं ने भी लगता है बताया नहीं है कि फिल्म इतिहास पर आधारित है या कल्पना पर. मैं उनकी दुविधा समझ सकता हूं. यदि आप रामायण पर फिल्म बनाएं तो आप इसे इतिहास, कल्पना की रचना या पौराणिक क्या घोषित करेंगे? हमारी कई महान कथाओं की तरह इसमें हमेशा कुछ इतिहास, कुछ कल्पना, कुछ मिथक होगा.

यह युद्ध पर आधारित उन फिल्मों के लिए भी सच है, जिन्हें हॉलीवुड बनाता है. क्या ‘ब्लैक हॉक डाउन’ इतिहास है? क्या कैथरीन बिगेलो की ‘द हर्ट लॉकर’ उन घटनाओं को सौ फीसदी बताती हैं, जिनकी परिणति ओसामा की हत्या में हुई?

कोई फिल्म ऐसी नहीं होती. खबरों से जो छूट जाता है उसे पकड़कर सिनेमा हमेशा ही वास्तविकता के परे चले जाता है. इसीलिए तो हम फिल्म देखने जाते हैं. वे हमें वे सत्य बताते हैं, जो अखबार व टीवी चैनल तत्काल रिपोर्टिंग की तलाश में चूक जाते हैं. मैं भंसाली का प्रशंसक नहीं हूं. उनकी फिल्में तो मेरे सिर से ऊपर जाती हैं.

देवदास एक अच्छी कहानी को परदे पर बर्बाद करने का उदाहरण है, क्योंकि उन्होंने इसमें जरूरत से ज्यादा नाटकीयता व ग्लैमर से भर दिया था. हां, मुझे बताया गया है कि वे ईमानदार फिल्म निर्माता हैं (सेंसर बोर्ड के नए प्रमुख भी यह मानते हैं). सारे ईमानदार फिल्म निर्माताओं की तरह उन्हें भी अपने दृष्टि का अधिकार है, फिर चाहे उसमें गलतियां ही क्यों न हो.

किसी भी स्वतंत्र समाज में फिल्म निर्माताओं को आतंकित हुए बिना अपनी बात अपने तरीके से कहने की आज़ादी होनी चाहिए. मुट्‌ठीभर लोगों के कारण भारत का तालिबानीकरण नहीं होना चाहिए.

05.12.2017
, 20.56 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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