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आधार पर फिर उठे सवाल

विचार

 

आधार पर फिर उठे सवाल

संदीप पांडे


भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मुम्बई के संगणक विज्ञान एवं प्रौ़द्योगिकी विभाग के सात प्रोफेसरों सोमेन चक्रवर्ती, सिद्धार्थ चौधरी, ओम दमानी, मनोज प्रभाकरन, कृति रामामृतम, भास्करन रमन व एस. सुदर्शन ने बहुचर्चित किंतु विवादों से घिरी ’आधार’ योजना पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
 

आधार

उनके अनुसार दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए एक सुरक्षित राष्ट्रीय पहचान योजना की संरचना व क्रियान्वयन हेतु अभी और चिंतन, विचार विमर्श और कुछ वर्ष लगेंगे. उनका निष्कर्ष है कि चूंकि आधार योजना पर तमाम तरह के सवाल खड़े किए जा रहे हैं इसलिए जरूरी है कि नए सिरे से आधार के ढांचे को पुनर्निमित किया जाए.

एक राष्ट्रीय पहचान की योजना के सरकार की कार्यकुशलता, लाभों का वितरण, कानून व व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा, लोककल्याण, लोगों की दृष्टि से सूचना की सुरक्षा एवं उनके मौलिक अधिकार को प्रभावित करने वाले दीर्घ कालिक एवं व्यापक निहितार्थ होते हैं.

आई.आई.टी. मुम्बई के प्रोफेसरों ने एक राष्ट्रीय पहचान योजना से न्यूनतम अपेक्षाएं की हैं कि वह समावेशी होनी चाहिए, उसे वंचितों का सशक्तिकरण करना चाहिए व प्रशासनिक कार्यकुशलता बढ़ाने वाली होना चाहिए, पहचान के दुरुपयोग को रोकने वाली होनी चाहिए, मौलिक सेवाओं तक पहुंच में उसे बाधा नहीं बनना चाहिए व उससे नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं होना चाहिए.

जमीनी स्तर से आ रही प्रतिक्रियाओं के अनुसार आधार के वर्तमान स्वरूप व क्रियान्वयन का उपर्लिखित अपेक्षाओं से विरोधाभास है. उदाहरण के लिए बायोमेट्रिक से पहचान स्थापित करने पर निर्भरता के कारण बहुत सारे लोगों को मौलिक सेवाओं से वंचित कर दिया गया है जैसे बिना आधार के बच्चे का प्राथमिक विद्यालय में दाखिला नहीं हो रहा अथवा सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत राशन का अनाज नहीं मिल रहा जो उसके मौलिक अधिकारों का हनन है.

कुछ किस्म के पहचान के दुरुपयोग तो आधार से रोके जा सकेंगे लेकिन आधार के व्यापक व बिना तैयारी के सभी जगह इस्तेमाल से, उदाहरण के लिए वित्तीय ल्रेन-देन हेतु अनिवार्य बना देने से, नए किस्म के दुरुपयोगों का रास्ता खुल गया है. निजी एजेंसिंयों की भागीदारी से सूचनाओं की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं रह गई क्योंकि अभी हमारे यहां इसे लेकर कानून कमजोर हैं. इसका कारण है कुछ तो जिस तरह से आधार की संरचना तैयार की गई है - जैसे बायोमेट्रिक का सत्यापन के लिए इस्तेमाल व विभिन्न एजेंसिंयों की एक केन्द्रीयकृत कम्प्यूटर के माध्यम से सूचनाओं तक पहुंच.

अभी तक के अनुभव से जो दिक्कतें आ रही हैं उनके दृष्टिगत आई.आई.टी. के प्रोफेसरों ने एक तकनीकी व नीतिगत दिशा निर्देश सामने रखा है. वे इसे अपूर्ण ही मानते हैं.

उनका कहना है कि पहचान, सत्यापन व अधीकृत करने को जोड़ने से बचा जाए. वर्तमान समय में आधार का इस्तेमाल पहचान, सत्यापन, ’अपने ग्राहक को जानें,’ अधीकृत करने व किस्म-किस्म के प्रमाण पत्र व दस्तावेजों के भण्डारण के लिए किया जा रहा है. किंतु आधार की संरचना इन उपयोगों के लिए नहीं बनी है. उदाहरण के लिए कई उपयोगों (जैसे महाराष्ट्र में सम्पत्ति के पंजीकरण) में आधार का बायोमेट्रिक सत्यापन के आधार पर अस्थाई रूप से अधीकृत करना फर्जीवाड़ा के नए रास्ते खोलता है.

कई उद्देश्यों के एकीकरण एवं उन्हें पूरा करने के तरीकों ने आधार की व्यवस्था को पेचीदा बना दिया है जिसमें से उसके अकल्पनीय दोहन की सम्भावना पैदा होती है. इसलिए वे मानते हैं कि पहले इन उद्देश्यों को पृथक करना और उन्हें स्पष्ट रूप से चिन्हित किया जाना है. भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण को स्पष्ट रूप से दिशा निर्देश देने होंगे कि आधार का इस्तेमाल किन चीजों के लिए हो सकता है और किन के लिए नहीं.

उन्होंने बायोमेट्रिक पर निर्भरता कम करने की सलाह दी है. विस्तृत बायोमेट्रिक विशिष्ट पहचान स्थापित करने के लिए कारगर हो सकता है किंतु सत्यापन के लिए यह सही नहीं है क्योंकि इसमें वापस लौटना सम्भव नहीं है व इसको चुराना आसान है. नागरिकों के बायोमेट्रिक को एकत्रित करने में कोई इस किस्म की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं कि वह जानकारी अवांछित तत्वों को न मिले. इंग्लैण्ड व इजराइल में विरोध के बाद वहां कि सरकारों ने इस किस्म की नीतियां बदल दीं.

आधार के इस्तेमाल के आंकड़ों से यह पता चलता है कि व्यापक स्तर पर बायोमेट्रिक के इस्तेमाल में त्रुटियों की दर ऊंची है. प्रोफेसरों के अनुसार बायोमेट्रिक का इस्तेमाल सिर्फ पंजीकरण के समय विशिष्ट पहचान स्थापित करने के लिए होना चाहिए. बायोमेट्रिक का संकलन व सत्यापन (पासपोर्ट कार्यालय की तुलना में) अधिक सुरक्षा के साथ होना चाहिए और किसी निजी एजंेसी को तो यह बिल्कुल नहीं सौंपा जाना चाहिए.

कम्प्यूटर के जानकर इन प्रोफेसरों का कहना है कि जीवंत नेटवर्क से सूचनाओं के आदान-प्रदान को न्यूनतम किया जाए. दूरस्थ कम्प्यूटर से सूचनाओं के आदान-प्रदान की व्यवस्था में साइबर हमले से मूलभूत सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं. इसे न्यूनतम करने से अनुश्रवण आंकड़ों को कम किया जा सकता है.

लोगों के निजी जीवन में कम से कम हस्तक्षेप हो की सोच के प्रेरित उन्होंने कहा है कि प्रौद्योगिकी व नीतियों से यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि जानकारी की सुरक्षा की अधिकतम गारंटी हो. उदाहरण के लिए पहचान स्थापित करने की जरूरत को कम किया जा सकता है, सेवा दाताओं द्वारा ’अपने ग्राहक को जानें’ सूचना एकत्र करने को खत्म किया जा सकता है और बहु सेवाओं के लाभार्थी का अनुश्रवण रोका जा सकता है.

इसके बावजूद मजबूत कानूनी ढांचे से लैस ऐसे प्रौद्योगिकी प्रावधान हो सकते हैं जो जरूरत पड़ने पर विभिन्न हितग्राहियों की सक्रिय भागीदारी से अनुश्रवण का काम कर सकें. मानवाधिकार की वकालत करते हुए उन्होंने कहा है कि पूर्ण व्यवस्था की उपलब्धता और व्यक्ति की सेवाओं तक पहुंच की गारंटी अधिकतम होनी चाहिए. लाभार्थी जैसे अनुश्रवण से सुरक्षित हो उसी प्रकार सेवाओं से एकदम वंचित किए जाने से भी सुरक्षित रहे.

वे यह भी मानते हैं कि कुछ लाभार्थी, सेवा दाता व व्यवस्था के अंदर के लोग समझौता कर सकते हैं. इसके बावजूद व्यवस्था की सुरक्षा व उपलब्धता की गारंटी बनी रहनी चाहिए. इस दिशा में एक गहरी सुरक्षा का दृष्टिकोण लेना चाहिए जिसमें खुलेपन व सुरक्षा का एक समन्वय बैठाना पड़ेगा.

लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों की वकालत करते हुए वे कहता हैं कि पंजीकरण व इस्तेमाल पर व्यक्ति का नियंत्रण होना चाहिए. पंजीकरण स्वैच्छिक होना चाहिए व व्यक्ति को छूट मिलनी चाहिए ताकि वह चाहने पर बाहर भी आ सके (अथवा दुरुपयोग को रोक सकने के तरीके होने चाहिए). पहचान के आधार पर संचालित होने वाली सेवाओं को उन लोगों को विकल्प देना होगा जिन्होंने बाहर रहने का निर्णय लिया है अथवा स्वेच्छा से बाहर हो गए हैं. निजी सेवा उपलब्ध कराने वालों पर नियंत्रण की व्यापक जानकारी होनी चाहिए.

योजना समावेशी हो इसलिए उनके अनुसार अपवाद व संरचना के विकास हेतु गंुजाइश होनी चाहिए. एक राष्ट्रीय स्तर की व्यवस्था में अपवाद अवश्यम्भावी है. अपवादों का समाधान निकालने के लिए बिना असुविधा पहुंचाए मानवीय तरीके होने चाहिए और जरूरत पड़ने पर अस्थाई हल निकालने की गुंजाइश होनी चाहिए. व्यवस्था में दोष या अपवाद की वजह से हुए नुकसान से लोगों का बचाव होना चाहिए. व्यवस्था की संरचना को निरंतर बेहतर बनाया जाना चाहिए और उसका चरणबद्ध क्रियान्वयन भी होना चाहिए.

अंत में उन्होंने स्वतंत्र अनुश्रवण की व्यवस्था की जरूरत बताई है. क्रियान्वयन में कार्यकुशलता, सुरक्षा व न्याय हेतु एक स्वतंत्र अनुश्रवण की व्यवस्था होनी चाहिए जो शिकायत निवारण, नुकसान के मुआवजे व सामाजिक अंकेक्षण पर ध्यान रख सके.

इन दिशा निर्देशों से हम वर्तमान व भविष्य के आधार प्रस्ताव का मूल्यांकन भी सकते हैं. चंूकि वर्तमान संरचना में उपर्युक्त दिशा निर्देशों के प्रकाश में कई कमियां हैं इसलिए प्रोफेसर लोग मानते है कि उसे प्रायोगिक ही माना जाए और उसी तरह से उसका इस्तेमाल हो. क्रियान्वयन के खर्च को कम करने के लिए वर्तमान व्यवस्था के तत्व जो भविष्य की संरचना का हिस्सा बनते हैं उपर्युक्त दिशा निर्देश के साथ किसी समझौते की कीमत पर नहीं होने चाहिए.

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मुम्बई के प्रोफेसरों की स्पष्ट भूमिका की तारीफ करनी पड़ेगी कि उन्होंने बिना लाग-लपेट सारी बातें कह दी हैं. जो लोग आंखें बंद कर ’आधार’ को अनिवार्य बनाने में लगे हुए हैं उन्हें दो मिनट रुक कर आई.आई.टी. मुम्बई के प्रोफेसरों के दिशा निर्देशों पर विचार करना चाहिए और ईमानदारी से इस बात का मूल्यांकन करना चाहिए कि वर्तमान रूप में क्या आधार इन बिंदुओं पर खरा उतरता है.

17.05.2018, 19.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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