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कौन हुआ नीलाम ?

बात पते की

 

कौन हुआ नीलाम ?

प्रशान्त कुमार दुबे

 

आखिरकार गांधी जी के स्मृति चिन्ह भारत लाये गये. जीवन भर मदिरा का विरोध करने वाले और उसके खिलाफ उपदेश देने वाले महात्मा गांधी की वस्तुओं को शराब किंग विजय माल्या ने खरीदा. सरकार ने कहा कि हमने बहुत प्रयास किये, आधिकारिक प्रतिनिधि अंबिका सोनी ने कहा कि हमने विजय माल्या से सम्पर्क बनाए रखा, और विजय माल्या इसे नकारते रहे.

बहरहाल अंबिका सोनी और विजय माल्या में से कौन कितना सही बोल रहा है, इसकी पड़ताल शेष है लेकिन इससे बड़ा सवाल तो यही है कि आखिर इस नीलामी का इतना हंगामा क्यों हुआ किया गया ? देश में भी गांधी की विरासत को, हम कितना सहेज पाये हैं ? वस्तुयें तो महज प्रतीक हैं लेकिन क्या हम गांधी के आदर्शों को, गांधी के ग्राम स्वराज की परिकल्पना को और गांधी के भ्रष्टाचार मुक्त भारत के स्वप्न को साकार कर पाये? नहीं न ? तो फिर इतनी भगदड़ क्यों? अचानक यह शोरगुल क्यों ?

क्या हम गांधी जी की बंद पड़ी घड़ी में आज का समय चलाना चाहते हैं? या हम गांधी जी की कटोरी पाकर देश के खाली कटोरे और गरीबों की व्यथा को रखना चाहते हैं ? क्या हम गांधी जी की चप्पलों को पाकर महात्मा गांधी के मार्ग पर चलना चाहते हैं ? क्या गांधी का होना, उनकी कटोरी, घड़ी और चप्पल होने में शामिल है ?

इन सवालों का जवाब न में हो तो भी सवाल उठता है कि आखिर क्यों हमें स्वतंत्र भारत में भी गांधी के आदर्शों को आत्मसात करने के लिए “ मुन्नाभाई एमबीबीएस” या “लगे रहो मुन्ना भाई” जैसी फिल्मों की आवश्यकता होती है ? क्यों गांधी जी के विचार आज गांधीगिरी हो गये हैं ?

देश में गांधी एक छाप है, जो कि 10 रूपये से लेकर 1000 रूपये के नोट तक पर छपा हुआ है. आश्चर्य नहीं कि आज सामान्य बातचीत में “मजबूरी का नाम महात्मा गांधी” बेहद लोकप्रिय जुमला है. यानी आज़ादी के बाद की पीढ़ी के लिए गांधी महज “मजबूरी का नाम ” है. चलिए एक क्षण के लिये गांधी जी को मजबूरी ही मान लें तो फिर मन में भाव आता है कि अचानक यह मजबूरी इतनी बड़ी राष्ट्र मजबूरी कैसे बन गई ? हर अखबार टीवी चैनल, गांधी जी की धरोहरों को बचाने के लिए बेताब हो गया. सब जगह ब्रेकिंग न्यूज चलने लगी. गांधी के चप्पल, कटोरी, घड़ी को लेकर शोर-शराबा होने लगा. बहसें शुरु हों गईं. लेकिन इस पूरी बहस में एक महत्वपूर्ण बात खो गई कि महात्मा गांधी की निजी वस्तुओं के तत्कालीन मालिक जेम्स ओटिस ने भारत सरकार के समक्ष यह पेशकश रखी थी कि यदि भारत सरकार गरीबों पर होने वोले स्वास्थ्य खर्चों में इजाफा करे. ओटिस ने कहा कि यदि भारत सरकार जीडीपी का 5 प्रतिशत गरीबों पर होने वाले स्वास्थ्य पर व्यय करे, तो वह यह नीलामी नहीं करेंगे.

गांधी के विचार सात समुंदर पार पहुंचकर ओटिस को तो प्रभावित कर सकते हैं पर स्वयं गांधी के देश में वे विचार सरकार के नुमाइंदों को प्रभावित नहीं कर पाये.


जेम्स ओटिस ने यह पत्र फैक्स के माध्यम से भारत सरकार को भेजा. अफसोस कि सरकार ने इस ओर विचार भी नहीं किया, कथित रूप से अपने कूटनीतिक प्रयास करती रही. दरअसल सरकार इस मसले पर सोचना ही नहीं चाह रही थी, क्योंकि जेम्स ने एक शर्त यह भी रखी थी कि सरकार सैन्य खर्चों को कम करे.

देश में सरकार अभी स्वास्थ्य पर जीडीपी का 07 प्रतिशत तक ही व्यय कर रही है और जेम्स 5 प्रतिशत करने की पेशकश कर रहे थे. सरकार ने बहुत ही रणनीतिक तरीके से इस मुद्दे की ओर से जनसामान्य का ध्यान हटाने में सफलता पाई. और बाकी मीडिया के तो क्या कहने, वो अपने टीआरपी के फेर में गरीबों के इस हित को भुला देने में कामयाब हुई.

यही वह मीडिया है जो कि स्लमडॉग मिलियनेयर को आस्कर मिलने पर उसे भारत की गरीबी का मजाक करार देता है और वही मीडिया गरीबों के हिमायती सवाल को नजरअंदाज कर देता है. गौर से देखें तो पता चलता है कि जेम्स ने कोई अलग काम नहीं किया था बल्कि जेम्स ने तो गांधी के विचारों को फैलाने का काम किया था. गांधी जी ने कहा था कि किसी भी काम को करते वक्त सोचो कि इससे समाज के अंतिम व्यक्ति को क्या लाभ होगा, या इससे उसके जीवनस्तर में कुछ बदलाव होगा. यदि हां तो आपका नियोजन सही है.

जेम्स ने भी अंतिम व्यक्ति को बेहतर स्वास्थ्य सुविधायें देने की बात कही. साथ ही जेम्स ने सैन्य खर्चों को कम करने का आग्रह अनायास ही नहीं किया बल्कि वह तो गांधी के अहिंसा के पाठ का दोहरा रहे हैं. अफसोस यहां भी है कि गांधी के विचार सात समुंदर पार पहुंचकर ओटिस को तो प्रभावित कर सकते हैं पर स्वयं गांधी के देश में वे विचार सरकार के नुमाइंदों को प्रभावित नहीं कर पाये.

हमारी सरकार विदेशों की जिस स्वास्थ्य नीति का अंधानुकरण करने में लगी है वहां तो हालात बदल रहे हैं. अमेरिका में तो स्वास्थ्य सेवाओं का राष्ट्रीयकरण हो रहा है और हमारा देश निजीकरण को ही सर्वाधिक बेहतर विकल्प मान रहा है.

हालांकि सरकार के समक्ष जेम्स ओटिस का प्रस्ताव फिर आया है कि उनके पास महात्मा गांधी की और चीजें सुरक्षित हैं और वे इसे भारत को सौंप देंगे, बशर्ते भारत अपने यहां गरीबों के स्वास्थ्य पर होने वाले व्यय में ईजाफा करे. लेकिन सरकार इस पर कोई संतोषजनक जवाब तक नहीं दे पा रही है. न तो वह यह कहने की हालत में है कि हमारे बजट में गरीबों के स्वास्थ्य पर होने वाला व्यय पर्याप्त है और ना ही वह जेम्स ओटिस को आश्वस्त करना चाहती है. यानी सरकार की प्राथमिकता में कहीं भी गरीबों का स्वास्थ्य शामिल नहीं है. अब सरकार ने नया पैंतरा खेलते हुये विधि और विदेश मंत्रालय की मदद से योजना बनाकर नीलामी के विरूद्ध विदेशी कोर्ट में जाने की बात की है.

बहरहाल इस पूरी प्रक्रिया में गांधीजी की वस्तुओं की नीलामी नहीं हुई, नीलाम तो गांधी के विचार हुये. अफसोस इसी बात का है कि सरकार जनपक्षधर न हुई और गांधी नीलाम हुये.

 

10.03.2009, 04.30 (GMT+05:30) पर प्रकाशि

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

dhiraj rai (dhiraj.rai2@gmail.com) bhopal

 
 सही लिखा है आपने कि गांधी की वस्तुओं को लेकर इतना हो हल्ला मचाया जा रहा है. लेकिन उनके विचारों की तरफ किसी का कोई ध्यान नहीं. 
   
 

sandip naik (naiksandi@gmai.com) Bhopal

 
 Good article written by Prashant. Gandhi is no more now in India, People like Malya and Congress have finished him and rest of the things have done by NGOs as well.......in the name of Gandhi we are just befooling ourselves and trying to put a speudo image of Deshbhakta and Khadi........ The most disappointing point Prashant has raised here is to use oof GDP....... which no one is thinking of....... a person sitting far away is much more interested to work for poors but here in our country our Politicians are ready to sell the values and emotions of people. Gadhi has become a metaphore for emotional blackmail thats it...... alas! he cound see all this!!!!!!!! 
   
 

Ankur Tiwari (ankurtiwari@gmail.com) Indore

 
 परिवर्तन जरुरी है. लेकिन ये कोई और नहीं करेगा, हमें ही करना होगा. या कहें कि मुझे ही करना होगा. सभी को खुद सोचना होगा कि ‘मैं’. इसके लिए दूसरे को दोष नहीं दे सकते. मैं स्वयं कितना पालन करता हूं, सही विचारों और संस्कारों का. हकीकत सामने है कि मैं नहीं करना चाहता. पर नेता, अधिकारी और दूसरों से उम्मीद करता हूं कि वे कुछ करें. जब हम नहीं कर सकते तो दूसरे पर उंगली नहीं उठा सकते. इसलिए मैं शुरुवात करूं. मेरे छोटे से जीवन में परेशानियां बहुत बड़ी नहीं हैं. इसलिए संस्कारों और सही विचारों का पालन करूंगा. कोई साथ दे तो अच्छा है वरना कोई शिकायत नहीं है किसी से. Well begin is half done. 
   
 

कविता मौर्य मेदनीनगर, पलामू, झारखंड

 
 गांधी की दुर्दशा देख कर शर्म आती है. लेकिन जिन्हें आनी चाहिए, वे इस तरह की बेशर्मी पर भी मुस्कुराते रहते हैं. 
   
 

mihir kumar ghosh Kolkata

 
 हम सब गांधी के हत्यारे हैं और हमारे पास गांधी केवल किताबों में दर्ज एक सनकी नाम भर है. अपने आस पास हम देखें तो पता चलता है कि गांधी के नाम पर केवल सब अपना धंधा चला रहे हैं. वरना अरबों की आबादी वाले इस देश में कोई एक आदमी क्यों नहीं है, जिसे हम गांधी के एक उदाहरण की तरह बता सकें. 
   
 

Suresh Kumar chaubey Toranto, Canada

 
 गांधी अब केवल फैशन हैं, उससे अधिक कुछ नहीं. जिस गांधी ने आजादी के दिन कहा था कि दुनिया से कह दो, गांधी अंग्रेजी भूल गया है. आज उसी गांधी के देश में अंग्रेजी और अंग्रेजियत की दलाली चल रही है. नेतृत्व करने का रास्ता दलाली से गुजरता है और दलालों के लिए आखिर गांधी की क्या उपयोगिता. 
   
 

अशोक कुमार पाण्डेय (ashokk34@gmail.com) ग्वालियर

 
 अरे भाई इस बाज़ार में सब वर्चुअल ही बचा है। जो बिकता है वही महत्वपूर्ण है।
गाँधीवाद की यह तार्किक परिणिति है मेरे भाई।
 
   

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