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बहुरंगी भारतः जय हो !

बात पते की

 

बहुरंगी भारतः जय हो !

राम पुनियानी

 

फिल्म ‘स्लमडॉग मिलियेनर’ की कई विशेषताएं गिनवाईं जा सकती हैं. इनमें से एक यह है कि यह फिल्म हमारे समाज के विविधरंगी स्वरूप को रेखांकित करती है. यह फिल्म भारत की बहुधर्मी और बहुसांस्कृतिक विरासत को भी हमारे सामने लाती है और यह भी बताती है कि हमारी यह विरासत आज भी जिन्दा है.

इस फिल्म को मिले आस्कर पुरस्कारों में से तीन भारतियों ने जीते हैं और इनके पीछे एक दिलचस्प संयोग है. तीनों आस्कर विजेताओं के मुस्लिम नाम हैं. इनमें से एक, गुलजार, सिक्ख हैं, जिन्होंने विभाजन के समय के कत्लेआम के भयावह मंजर की याद अपने मन में जिंदा रखने के लिए अपना मुस्लिम नाम रख लिया था. दूसरे, रसूल पोक्कुटी जन्म से मुसलमान हैं और तीसरे, अल्ला रक्खा रहमान ने एक सूफी संत से प्रभावित होकर इस्लाम स्वीकार किया है. रसूल ने आस्कर ग्रहण करने के बाद अपने संबोधन में कहा कि यह उनके लिए शिवरात्रि का उपहार है और वे इसे अपने देश, भारत की ओर से ग्रहण कर रहे हैं.

अल्ला रक्खा रहमान अपने पिता की सख्त बीमारी के दौरान एक मुस्लिम पीर के संपर्क में आए और मुसलमान बन गए. रहमान ऐसे अकेले हिन्दू नहीं हैं जिसने सूफी संतों की मानवतावादी शिक्षाओं से प्रभावित होकर इस्लाम को अपनाया हो.

सामान्यत: यह माना जाता है कि भारत में इस्लाम को मुस्लिम शासकों ने फैलाया जो एक हाथ में कुरान और दूसरे में तलवार लेकर भारत आए थे. इस मिथक का खंडन स्वयं स्वामी विवेकानंद ने किया था जिन्होंने कहा था कि शूद्रों ने जमींदार-ब्राह्मण गठबंधन के अत्याचारों से पीड़ित होकर इस्लाम अपनाया.

वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत किए जाने वाले भेदभाव के अतिरिक्त, हिन्दुओं के मुसलमान बनने के और भी कई कारण होंगे. कुछ हिन्दू, जैसे राजस्थान के मेवाती और केरल के मलाबार तट के नवायतों ने मुसलमानों के सामाजिक संपर्क में आने के बाद इस्लाम से प्रभावित होकर मुस्लिम धर्म अपनाया.

इस सामाजिक संपर्क के नतीजे में कई ऐसे साधू-संत और पीर हुए जिनकी शिष्य मंडली में दोनों ही धर्मों के लोग थे. कई भक्ति संतों के बड़ी संख्या में मुस्लिम उपासक थे तो अनेक सूफी संतों के दरबारों में हाजिरी देने वालों में हिन्दू शामिल थे. रामदेव बाबा पीर एक ऐसे ही संत थे जिनके उपासक दोनों ही धर्मों की नीची जाति के और गरीब लोग थे.

यह मानना सही नहीं है कि हिन्दू और मुसलमान हमेशा से एक-दूसरे के बैरी रहे हैं. सच तो यह है कि दोनों धर्मों के मानने वालों में सौहार्द्र और आपसी शांति रही है. इस सौहार्द्र, आपसी तालमेल और दोनों धर्मों के मानने वालों के एक दूसरे पर पड़े असर की झलक हमें हमारे साहित्य, संगीत और वास्तुकला में मिलती है.

शिवाजी के सबसे विश्वासपात्र सलाहकार और सचिव का नाम था मौलाना हैदर अली. सिद्दी संबल उनके सेनापति थे और रूस्तम-ए-जांमा उनके अंगरक्षक और जासूसी दस्ते के प्रमुख थे.


हमारे देश में धर्म, कभी संस्कृति का पर्याय नहीं रहा. एक ही धर्म के लोगों की विभिन्न संस्कृतियां रही हैं. धार्मिक परंपराओं पर क्षेत्रीय संस्कृति का असर भी देखा जा सकता है. उस्ताद बिस्मिल्ला खां के लिए गंगा और काशी के मंदिरों के बिना जिन्दगी अधूरी थी और जब मुंशी प्रेमचन्द ने लिखना शुरू किया तो उन्होंने उर्दू को अपनी अभिव्यक्ति की भाषा के तौर पर चुना.

हिन्दी के अब तक के सबसे लोकप्रिय टीवी धारावाहिक ‘महाभारत’ की पठकथा राही मासूम रजा ने लिखी और जावेद अख्तर हमारी फिल्मी दुनिया के ऐसे पहले मुस्लिम गीतकार नहीं हैं, जिन्होंने मन को छू लेने वाले भजन लिखे हैं.

राजाओं में भी धर्म के कारण दुश्मनी या युद्ध नहीं होते थे. मुसलमान बादशाहों के दरबार में हिन्दू ऊँचे पदों पर तैनात थे. राजा टोडरमल और बीरबल अकबर के नवरत्नों में थे और राजा मानसिंह, अकबर की सेना के प्रमुख थे. औरंगजेब, जिसे सबसे कट्टर मुस्लिम बादशाह माना जाता है, के एक-तिहाई दरबारी हिन्दू थे और राजा जयसिंह, औरंगजेब की सेना के प्रमुख जनरलों में से एक थे.

शिवाजी के सबसे विश्वासपात्र सलाहकार और सचिव का नाम था मौलाना हैदर अली. सिद्दी संबल उनके सेनापति थे और रूस्तम-ए-जांमा उनके अंगरक्षक और जासूसी दस्ते के प्रमुख थे. शिवाजी ने धार्मिक नहीं बल्कि शुद्धत: राजनैतिक कारणों से मुस्लिम नवाब अफजल खान की जान ली और बाद में अफजल खान के सम्मान में दरगाह भी बनवाई.

खानपान पर भी विभिन्न धर्मों का असर पड़ा. वैदिक काल में गौमाँस खाया जाता था परंतु बाद में यह प्रतिबंधित हो गया क्योंकि गाय को माता का दर्जा दे दिया गया. अपनी हिन्दू प्रजा की भावनाओं का ख्याल रखते हुए कई मुस्लिम बादशाहों ने गौहत्या पर रोक लगाई थी.

दारा शिकोह ने एक पुस्तक लिखी जिसका शीर्षक था ‘मज़मा अल बहरीन’. इस पुस्तक में भारत को हिन्दुओं और मुसलमानों रूपी दो समुद्रों के मिलने से बना एक महासागर बताया गया है. हिन्दू राजाओं, सिपाहियों और किसानों ने एक होकर सन् 1857 में ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ विद्रोह किया. इस धार्मिक एकता को अपने शासन के लिए खतरा मानकर अंग्रेजों ने इतिहास का साम्प्रदायिकीकरण किया और बाँटो और राज करो की नीति अपनाई, जिसके नतीजे हम आज भी भुगत रहे हैं.

भारत का बहुवाद कई मामलों में अनोखा है. यहाँ पर विभिन्न धर्मों ने विभिन्न स्तरों पर एक-दूसरे पर असर डाला-.सत्ता (बादशाहों, राजाओं और जमींदारों) के स्तर पर, संस्कृति (साहित्य, संगीत, पहनावा, खानपान, परंपराएं इत्यादि) के स्तर पर और धार्मिक (सूफी और भक्ति परंपरा) के स्तर पर.

सन् 1980 के बाद से अंग्रेजों द्वारा बोए गए साम्प्रदायिकता के बीज बड़े पेड़ बन गए हैं. धार्मिक पहचान की राजनीति का बोलबाला है. दोनों ही धर्मों का कट्टरपंथी तबका, साझा सांस्कृतिक प्रतीकों को हेय दृष्टि से देख रहा है और उन्हें अपने धर्म का हिस्सा मानने को तैयार नहीं है. ‘ स्लमडॉग मिलियेनर’ एक सामाजिक यथार्थ को तो हमारे सामने लाती ही है, वह साम्प्रदायिक हिंसा का भी चित्रण करती है और इस बहाने हमारी मिली-जुली संस्कृति की संवाहक भी है.

13.03.2009, 09.12 (GMT+05:30) पर प्रकाशि

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

ऋषभ कृष्ण (rishabhakrishna@gmail.com) दिल्ली

 
 पुनियानी जी, अगर आप स्वामी विवेकानंद के किसी कथन का उदाहरण देकर कुछ भी साबित करने की कोशिश कर रहे हैं, तो यह गलत है. आप भी जानते हैं और हम भी कि भारत में मुस्लिमों का राज कैसे फला फूला. मुसलमानों के लिए हमेशा अपने मज़हब को आगे बढाने का जरिया तलवार ही रही है.

बेशक कई शूद्रों ने लालच में आकर धर्म परिवर्तन किया, लेकिन उन्होंने ईसाई धर्म अपनाया मुस्लिम नहीं. मुसलमान तो जहां भी गए उन्होंने अत्याचार के ज़रिये धर्म परिवर्तन कराया. सूडान के दारफुर में देखिये, अकाल से लोग मर रहे हैं, लेकिन उन्हें भी लूटने के लिए अरब घुड़सवार पहुँच जाते हैं. आखिर अमेरिका, ब्रिटेन, स्पेन, इण्डोनेशिया और भारत में जो हमले होते हैं, उनके पीछे यही धर्म क्यों होता है. क्या आपको लगता है कि यह आतंक फैलाने के लिए हो रहा है. क्या इस धर्म को बेवज़ह हमले करने का शौक है, नहीं. दरअसल तलवार के बल पर अपनी तादाद बढाने कि उनकी फितरत ही यह कराती है.

आखिर क्या वज़ह है कि पिछले दो दशक में भारत में हुए सबसे बड़े दंगों के पीछे मुसलमान ही हैं, चाहे मुंबई हो या गुजरात, इसी मज़हब के लोग ऐसा क्यों करते हैं. यह तो सरकारी और अदालती रिपोर्ट बताती हैं कि सिमी क्या करता है. पढने के बजाय आतंकवाद फैलाने कि आखिर इन्हें क्या ज़रुरत पड़ गयी.

क्या आप भूल गए कि बांग्लादेश कि फौज के साथ भीड़ ने हमारी सेना की चौकी पर हमला किया था और किस तरह हिन्दुस्तानी जवानों की लाश बांस पर तंगी थीं, मानो वे मरे हुए जानवर हों. साहब, ये हिन्दुओं और भारत के लिए इनकी नफरत ही है, जो बंटवारे के समय भी सामने आयी थी और बार बार सामने आती रहती है.

रही बात जावेद अख्तर की, तो याद रहे कि ये सेकुलर लोग तभी बोलते हैं जब हिन्दू अपने धर्म कि पैरवी करते हैं, उस वक़्त इन्हें गंगा-जमुनी तहजीब याद आती है, वरना तो शबाना यही कहती फिरती हैं कि मुसलमान होने की वज़ह से कोइ उन्हें मुंबई में घर नहीं देता. यह हिन्दुओं को बदनाम करने की साजिश ही है. जब सरस्वती यी दुर्गा कि अश्लील तस्वीर बनायी जाती है, तब इनके मुंह से कोई बोल नहीं फूटता. मज़े की बात है कि वह तस्वीर भी एम एफ़ हुसैन ने ही बनायी थी जो मुसलमान हैं. इतनी श्रद्धा है उन्हें हिन्दू धर्म पर! और अगर सलमान रश्दी केवल कुरान को शैतान की आयत बता दें तो उनका सर कलम करने का फरमान सुना दिया जाता है. कम से कम हिन्दू तो इतने हिंसक नहीं होते कि हुसैन के लिए ऐसा फरमान सुना दें.

तो पुनियानी जी. धार्मिक सद्भाव सबको अच्छा लगता है, लेकिन ऑस्कर को उसमें मत डालिए क्योंकि ऑस्कर के पैमाने दूसरे ही होते हैं, वरना रंग दे बसन्ती यी तारे ज़मीन पर कब की इसे जात चुकी होती. रही बात किसी पीर के लिए श्रद्धा की, तो धर्म बदलने की वज़ह कुछ और ही होती हैं और यह भी याद रखिये कि सोमनाथ मंदिर पर हमले की को तोड़ने की जो घटना थी उसकी बुनियाद भी किसी पीर ने ही रखी थी.
 
   
 

varadraj bapat (varadrajbapat@yahoo.co.in) mumbai

 
 The article is not based on historical facts. majority of conversions to Islam in India, Iran, and Arabasthan were due to force. 
   
 

jagat mohan (jagatmohan@gmail.com) delhi

 
 पुनियानी जी ने तथ्य सुंदरता से प्रस्तुत किया है लेकिन सच्चाई इससे परे है. स्लमडॉग मिलिनेयर को आस्कर एक विदेशी निर्देशक को भारत का पिछड़ेपन को दिखलाने के लिए मिला है.

फिल्म में दिखसाया गये प्रश्नों से विदेशी निर्देशक ने यही साबित किया है कि भारत उतना ही पिछड़ा हुआ है, जितना उसके विकसित इतिहासकारों ने लिखा था. अपने घर की बदहाली की विश्व में चर्चा पर मिले आस्कर की आपको मुबारकवाद.

गुलजार ने अपना सिक्खी नाम छोड़कर इसलिए मुस्लिम नाम रखा कि वे विभाजन के कत्लेआम को सदा याद रखना चाहते थे, तो ये परिवर्तन उनकी बुजदिली है. अन्यथा जिसने उस कत्लेआम का मंजर देखा है, उसे इस्लाम से ही नफरत होने लगेगी. क्योंकि पाकिस्तान का वजूद ही इस्लाम के विस्तार के नाम पर हुआ था. जो आज भी कश्मीर घाटी से होते हुए पूरे भारत में 60, 000 लोगों को निगल चुका है.

भारत के बुजदिल इसे आतंकवाद कहते हैं जबकि ये इस्लाम विस्तारवाद है. हिंदू की सहिष्णुता ने भारत में इस्लाम बढ़ाया है. क्या विश्व में कोई देश ऐसा है, जिसने इतने हजार बरस के आतंकवादी हमलावरों को अपने देश में पनाह ही नहीं दी, उस पंथ को अपनाया भी.

इससे सहिष्णुता का परिणाम गुलजार और एआर रहमान हैं, जिनकी श्रद्धा ने अपना मन ही नहीं मजहब भी परिवर्तित किया, लेकिन बाबर के सिपासलारों मीर बांकी के द्वारा ध्वस्त किये हुए राम मंदिर भी नहीं भूलना चाहिए और सोमनाथ व काशी विश्वनाथ पर इस्लामिक आतंकवाद की छाया भी हमें याद रखनी चाहिए. दिल्ली का गुरुद्वारा शीशगंज भी, जहां आतंकी औरंगजेब के आतंकवादियों ने श्रीगुरुतेग बहादुर और उनके शिष्यों को मार डाला था. लाहौर में बसंत पंचमी के दिन शहीद हुए 12 वर्ष के वीर हकीकत राय को भी हम भूले नहीं हैं, जिन्हें इस्लाम न अपनाने के कारण अपनी जान देनी पड़ी थी.

पुनियानी जी, सभी पंथों में अच्छे और बुरे लोग होते हैं, लेकिन भारत में ऐसा क्यों होता है कि हर आतंकी घटना के पीछे मुसलमान होता है. इस तथ्य को झुठलाने के लिए आप मालेगांव को याद करेंगे तो फिर आपको इस पर भी विचार करना करना पड़ेगा कि मालेगांव की आतंकी घटना के पीछे भी इस्लामिक आतंकवाद था.
 
   
 

दिनेशराय द्विवेदी (drdwivedi1@gmail.com) कोटा

 
 पुनियानी जी का यह लेख बहुत ही सुंदर और तथ्यात्मक है। इस समय में बहुत उपयोगी भी।  
   
 

Sanjeev kumar tiwari Pune

 
 पुनियानी जी, आप बड़ी चालाकी से यहां अपने दावे पेश कर रहे हैं. आपने जो कुछ लिखा है, उससे कहीं इंकार नहीं है, लेकिन मुसलमानों ने जबरजस्ती धर्म परिवर्तन कराये हैं, इसको क्यों छुपाना चाहते हैं.

आपको पूरा इतिहास पता है लेकिन कत्लेआम कर के धर्म परिवर्तन का इतिहास आपको नहीं पता ? आप बड़ी चालाकी से "हिन्दुओं के मुसलमान बनने के और भी कई कारण होंगे " लिख कर क्या साबित करना चाहते हैं ? इतिहास लिखना है तो निरपेक्ष हो कर लिखें.आप जैसे छद्म निरपेक्षियों ने इस समस्या को और उलझाया है. आपको मानना चाहिए कि मुसलमानों ने ऐसा किया है लेकिन आप उन्हें बचा लेने की नियत से ऐसा कर रहे हैं जैसे भइया मैं तो परदेसी हूं, मुझे क्या पता कि ये चांद है या सूरज.
 
   

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