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भारत को रेफरी बनना होगा

मुद्दा

 

भारत को रेफरी बनना होगा

कुमार प्रशांत

 

हम पाकिस्तान से पूछ रहे हैं- दाऊद कहां है ?

श्रीलंका खुद से ही पूछ रहा है- प्रभाकरण कहां है ?

...जवाब दोनों का ही नहीं है. लेकिन एक फर्क है !...हम जानते हैं- सारी दुनिया जानती है कि दाऊद पाकिस्तान में है और पाकिस्तानी सरकार का वरदहस्त उसके सर पर है. प्रभाकरण के बारे में हम भी नहीं जानते, श्रीलंका सरकार भी नहीं जानती कि वह कहां है ; और है भी या नहीं ! लेकिन हमें यह याद रखना चाहिए कि श्रीलंका में प्रभाकरण व उनके लिट्टे के साथ जो हुआ है, वह समय बीतने के साथ-साथ बीत नहीं जायेगा. अब हमें याद कर लेना चाहिए कि हमारी सरहद पर एक औऱ अड्डा बन गया है, जहां से आतंकवादी कार्रवाइयां चल सकती हैं. पाकिस्तान, बांग्लादेश और अब श्रीलंका ! प्रभाकरण जिंदा हो या न हो, खतरे का एक नया मंजर जिंदा हो गया है.

लिट्टे प्रमुख प्रभाकरण


अभी-अभी, जब श्रीलंका की फौज प्रभाकरण और लिट्टे की खोज में फौजी जूनून के साथ हमले कर रही थी, हमारे विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी श्रीलंका पहुंचे थे. उस वक्त को ध्यान में रख कर, लिट्टे की वेबसाइट पर यह चेतावनी लिखी पढ़ी गई थीः “भारत जो कर रहा है, उससे श्रीलंका हमेशा-हमेशा के लिए मुसीबत में घिर जाएगा. इतना ही नहीं बल्कि वह अपने देश के हिस्सों में भी मुसीबत को न्यौता दे रहा है.”

इशारा साफ था कि तमिलों का इस तरह सफाया कर भारत अपने तमिलनाडु में शांति बनाये नहीं रख सकता है. इसमें संदेश यह भी छिपा था कि भारत में आतंक फैलाने वाली ताकतों के साथ हमारा जुड़ाव संभव है.

प्रभाकरण की गलतियों, ज्यादतियों का हिसाब लगाने से आज कुछ हासिल नहीं होगा. हासिल होगा यह समझने से कि आखिर इस उपमहाद्वीप में भारत रेफरी की अपनी भूमिका क्यों नहीं निभा पा रहा है ?

यह किसी से छिपी बात नहीं है कि आकार, सामर्थ्य और प्रभाव तीनों स्तरों पर भारत रेफरी की भूमिका निभाने की स्थिति में है लेकिन दुर्भाग्य ऐसा है कि वह हमेशा किसी तीसरे अंपायर (अमरीका) की ऊंगली की तरफ देखता रह जाता है.

श्रीलंका के तमिलों के साथ हमारा जीवंत नाता है, भले प्रभाकरण जैसों के साथ हमारी सहमति न हो. हम यह भी मानते हैं कि प्रभाकरण व श्रीलंकाई तमिलों के दूसरे नेताओं ने श्रीलंका को तोड़ने का जो रास्ता अपनाया, वह गलत है और हम उसमें सहायक नहीं हो सकते. लेकिन हम यह भी जानते हैं कि इस मामले में हमारी व तमिलनाडु की सरकारों की भूमिका बेदाग नहीं रही है. हमने अपनी धरती का इस्तेमाल तमिल टाइगर्स के लिए किया है, उन्हें करने दिया है. इसलिए रेफरी बनने के लिए जिस नैतिक भूमिका की जरुरत होती है, वह हमने काफी हद तक गंवा दी. लेकिन परिस्थित तेज़ी से बदलती गईं. राजीव गांधी की हत्या के बाद प्रभाकरण भी हतप्रभ होने लगा था कि यह रास्ता उसे कहां ले जाएगा. उसने इस हत्या को अपनी गलती के रूप में स्वीकार भी किया. यह मौका था जब भारत को नये सिरे से पहल करनी चाहिए थी. लेकिन वह हम नहीं कर सके.

प्रभाकरण को इधर दो गहरी चोटें लगीं. पहली चोट लगी, जब उसने अपने सबसे सिद्धहस्त फौजी कमांडर महात्या की हत्या करवा दी. यह अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारने से भी ज्यादा खतरनाक और मूर्खतापूर्ण कदम था. लेकिन हत्या और ख़ून का रास्ता जब सिद्धांत बन जाता है, तब विवेक की आंखें इसी तरह बंद हो जाती हैं. प्रभाकरण को ऐसा संदेह हुआ कि महात्या भारत की शह पर उसे रास्ते से हटाने में लगा है. यह सही भी हो सकता है और गलत भी. लेकिन महात्या को काबू में करने के दूसरे रास्ते भी हो सकते थे.

इधर आकर लिट्टे के भीतर प्रभाकरण की स्थिति कमज़ोर तो हुई थी लेकिन ऐसी कमज़ोर भी नहीं कि वह महात्या को किनारे नहीं कर सकता था. इसके बजाय उसने अपने ही पुराने रास्ते का इस्तेमाल किया और कमजोर होते लिट्टे को और भी बिखेर दिया.

उसे दूसरी चोट कर्नल करुणा ने मारी. पूर्वी श्रीलंका के क्षेत्र में करुणा तमिल टाइगर्स का सबसे प्रभावी फौजी कमांडर रहा है. प्रभाकरण से अलग भी, उसकी अपनी जगह रही है. महात्या की हत्या करवा कर प्रभाकरण ने करुणा जैसे साथियों को शंका में डाल दिया और अंततः करुणा ने खुद को उससे अलग कर लिया.

ऐसी लड़ाई में लोग जब अलग होते हैं, तो अलग नहीं होते, आपके दुश्मन हो जाते हैं. करुणा पूरी ताकत से प्रभाकरण की जड़ काटने में जुट गया. महात्या की हत्या के बाद बाद भी और करुणा की बगावत के बाद भी भारत के लिये पूरे मामले में पहल के लिये मौका था. लेकिन वह मौका भी हमने गंवाया.

राष्ट्रपति महेंद्रा राजपक्षे ने मौके को पहचान कर दोनों स्तर पर नई पहल की- फौज को अपनी पूरी तैयारी करने को कहा और लिट्टे को इस भुलावे में रखा कि सरकार नई तरह से बात करने की तैयारी कर रही है. अपनी थकी, बिखरी ताकत को समेटने के लिए प्रभाकरण को भी वक्त चाहिए था. बस, यहीं से प्रभाकरण के हाथों से पहल छूटती चली गई और श्रीलंकाई सेना भारी पड़ती गई. मौके को समझ कर सेना इसका विशेष ध्यान रख रही थी कि लिट्टे के साथ-साथ आम तमिल आबादी की भावनाओं को भी कुचल दिया जाये.

अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते लिट्टे वाले तमिलनाडु में अशांति बनाने की रणनीति पर काम कर सकते हैं.


श्रीलंका अपने अंदरूनी मामले से जैसे चाहे निबटे लेकिन हमें ध्यान में रखना है कि लंका सरकार अपने ही संविधान की हद में रह कर काम करे. सन 2000 में संविधान का जो संशोधित स्वरूप श्रीलंका ने स्वीकार किया, उसमें तमिलों के लिए काफी गुंजाइश है. उनके नागरिक अधिकारों की सुरक्षा की व्यवस्था भी है और सिंहली के साथ-साथ तमिल को भी राष्ट्रीय भाषा के रुप में स्वीकार किया गया है.

संविधान संशोधन में यह भी कहा गया है कि देश के उत्तरी व पूर्वी प्रांतों को जोड़ कर, एक नया प्रांत बनेगा, जिसका प्रशासन एक ही मुख्यमंत्री के तहत काम करेगा. यह व्यवस्था तब तक रहेगी, जब तक कि पूर्वी हिस्से में जनमत संग्रह करवा कर यह निश्चित न कर लिया जाये कि वे साथ रहना चाहते हैं या स्वतंत्र प्रांत चाहते हैं.

श्रीलंका पिछले कई वर्षों से ख़ून की नदी में डूबता-उतराता रहा है. तमिल और सिंहली लोगों ने एक-दूसरे को जितना संभव था, उतनी चोट पहुंचाई है. हमारे तमिलनाडु में भी उसकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती रही है, जिस पर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने वालों की वहां कमी नहीं है. अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते लिट्टे वाले तमिलनाडु में अशांति बनाने की रणनीति पर काम कर सकते हैं.

तमिलनाडु की राजनीति में यदि यही केंद्रीय मुद्दा बना रहा तो हर राजनीतिक पार्टी एक-दूसरे से आगे बढ़ कर लिट्टे का समर्थन करेगी. इन सारी स्थितियों को टालना हो तो श्रीलंका सरकार को साथ ले कर भारत सरकार को तेज व सीधी पहल करने होगी.

जरुरत है कि तमिल और सिंहली नहीं, श्रीलंकाई नागरिकों की समस्या की तरह इसे देखा जाये और सबके लिए बराबरी की गुंजाइश बनाई जाये. भारत को इसका दोस्ताना दबाव बनाना ही होगा. प्रभाकरण अभी केंद्र में नहीं है और यदि वह जिंदा है तो जल्दी से केंद्रीय स्थान उसे हासिल होने वाला नहीं है. इसलिए भारत के राष्ट्रीय हित में है कि वह तटस्थ लेकिन सक्रिय रेफरी की अपनी भूमिका में दिखाई दे.

 

18.03.2009, 03.15 (GMT+05:30) पर प्रकाशि

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

manmohan saral (mmsaral@hotmail.com) mumbai

 
 आपका लेख पढ़ा. आप आजकल कहां हैं, क्या कर रहे हैं ? खबर दें. शुभकामनाओं सहित. 
   
 

अभिषेक कश्यप नई दिल्ली

 
 आपकी राय से सहमत हूं लेकिन सबसे बड़ा मुद्दा ये है कि क्या भारत वाकई रेफरी की भूमिका निभा सकता है? औऱ दूसरा ये कि कोई उसे यह भूमिका क्यों निभाने देगा ? लिट्टे या राजपक्षे क्यों सुनेंगे भारत की बात.

दूसरा ये कि श्रीलंका में तमिल हित की बात करने वाला एक भी ठीक ठाक राजनीतिक दल नहीं है, जो कह सके कि वो श्रीलंका के तमिलों का प्रतिनिधित्व करता है. ऐसे में उम्मीद नहीं है कि यह समस्या सुलझेगी.
 
   
 

Vijya karnik Toranto

 
 nah..! have you seen the interview of the political head of LTTE B Nadesan ? What he said that "I ask if the UN, or India, or any other country would ever promote uprooting and relocating the people of Gaza as a solution? And the Tamil people are expected to willingly rush to these barbed wired internment camps in these surrounding situations? Is this what UN, India and other nations are envisioning for Tamils? The human shield term is a propaganda used towards uprooting the Tamil people from their traditional habitat. The Tamil people have lived here for generations and want to continue living here and make a livelihood in these lands. The Sri Lankan Government, UN and other international community`s statements that claim to seek the well being of Tamil people- in uprooting them to forcibly and put them in barbed wired military run camps is unprecedented." 
   
 

Prem Prakash Pandey लातेहार, झारखंड

 
 well writen article.
As you know the Sri Lankan government said last week that the conflict will "stop immediately" when the Tamil rebels lay down their arms. Sri Lankan Foreign Secretary Palitha Kohona already said that they have no formal communication from India. When the Tigers lay down arms, there will be no fighting. Then the firing will stop immediately.
 
   

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