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धर्मनिरपेक्षता का तराजू

मुद्दा

 

धर्मनिरपेक्षता का तराजू

राम पुनियानी

 

देश की धर्मनिरपेक्ष-प्रजातांत्रिक व्यवस्था में हम किसे और क्यों वोट दें, यह हर नागरिक के मन में उठने वाला एक स्वाभाविक प्रश्न है. चुनावी मैदान में उतरे विभिन्न राजनैतिक दलों की धर्मनिरपेक्षता के प्रति कितनी प्रतिबध्दता है, यह जानना भी महत्वपूर्ण है.

कांग्रेस, जो कि इस समय देश पर शासन कर रहे यूपीए गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी है, के हाथ भी सन् 1984 में हुए सिक्ख-विरोधी दंगों के खून से रंगे हुए हैं. कांग्रेस शासन के दौरान देश में बड़ी संख्या में साम्प्रदायिक दंगे हुए हैं.

दूसरी ओर भाजपा है, जिससे जुड़े हुए संगठन दिन-रात अल्पसंख्यकों के विरूध्द जहर उगलते रहते हैं. इन संगठनों का बाबरी मस्जिद को ढ़हाने, गुजरात के कत्लेआम और ईसाईयों के विरूध्द हिंसा में महत्वपूर्ण भूमिका रही है.

तीसरी ओर हैं वामपंथी दल. इन दलों, विशेषकर मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी की, नंदीग्राम में हुए नरसंहार में मुख्य भूमिका रही है. कुछ लोग इस कारण मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी की तुलना भाजपा से करने लगे हैं. समाजवादी पार्टी लगभग लगातार अल्पसंख्यकों के साथ खड़ी रही है परंतु कई मौकों पर उसने भी समझौते किए हैं और साम्प्रदायिक पार्टियों को मनमानी करने का मौका दिया है.

बसपा की मायावती ने तो नरेन्द्र मोदी का चुनाव प्रचार तक किया है और गुजरात दंगों के लिए गोधरा में मुसलमानों द्वारा ट्रेन को जलाए जाने की घटना को जिम्मेदार ठहराया है.

इन सभी पार्टियों को हम धर्मनिरपेक्षता के तराजू पर कैसे तोलें? क्या भाजपा, कांग्रेस और सीपीएम एक ही थैले के चट्टे-बट्टे हैं?

हम यहां पर कांग्रेस, वामपंथियों और भाजपा का तुलनात्मक अध्ययन करेंगे. कांग्रेस की कमजोर नीतियों और नंदीग्राम में सीपीएम द्वारा प्रदर्शित किए गए अहंकार ने एक अजीब दुविधापूर्ण स्थिति का निर्माण कर दिया है.

कांग्रेस की शुरूआत एक धर्मनिरपेक्ष दल के रूप में हुई थी, जिसके सदस्यों में सभी धर्मों के लोग शामिल थे. परंतु हमें यह भी याद रखना चाहिए कि मदनमोहन मालवीय और डॉ. मुंजे जैसे कई साम्प्रदायिक तत्व भी कांग्रेस के नेतृत्व का हिस्सा थे.

आज भी कई घोर साम्प्रदायिक नेता कांग्रेस में हैं और शायद इसलिए पंडित नेहरू ने यह चेतावनी दी थी कि कांग्रेस को अपने साम्प्रदायिक सदस्यों से सावधान रहना चाहिए.

पंडित नेहरू की मृत्यु के बाद कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता के पथ से कई बार भटकी. इसके कुछ उदाहरण हैं, राजीव गांधी का कुख्यात “ जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है” , वाला बयान, शाहबानो का मसला, राममंदिर का शिलान्यास और बाबरी मस्जिद के ढ़हाए जाने के दौरान नरसिंम्हाराव का दोपहर की नींद का आनंद लेते रहना. कांग्रेस शासन के दौरान हुए कई साम्प्रदायिक दंगों में कांग्रेस या तो मूक दर्शक बनी रही या उसके सदस्यों ने हिंसा में भाग लिया.

दंगों के पीछे मुख्यत: तीन कारक होते हैं. पहला, भड़काने वाला, जो कि विभिन्न जांच आयोगों; जगमोहन रेड्डी, न्यामूर्ति मादोन, श्रीकृष्ण और वेणुगोपालध्द के अनुसार आरएसएस से जुड़े हुए संगठन रहे हैं. दूसरा कारक है राजनैतिक नेतृत्व की साम्प्रदायिक दंगों को रोकने में असफलता. इस मामले में कांग्रेस अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती. कई मामलों में सत्तासीन कांग्रेस ने दंगों को रोकने के लिए पर्याप्त प्रयत्न नहीं किए और कई मौकों पर तो उसने दंगाईयों का साथ दिया. कांग्रेस में हमेशा से साम्प्रदायिक दंगों को रोकने के लिए राजनैतिक इच्छाशक्ति का अभाव रहा है.

तीसरा कारक है पुलिस और नौकरशाही की अक्षमता. पुलिस और नौकरशाही का साम्प्रदायिकीकरण अपने चरम पर है. जहां तक कांग्रेस का सवाल है, साम्प्रदायिकता कभी उसके राजनैतिक एजेंडे का हिस्सा नहीं रही परंतु व्यवहार में कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों की रक्षा के लिए पर्याप्त इच्छाशक्ति भी नहीं दर्शाई.

वामपंथी, नीतियों और विचारों से धर्मनिरपेक्ष हैं परंतु धर्मनिरपेक्षता के लिए आगे बढ़कर लड़ने की क्षमता उनमें नहीं है.


वामपंथियों और सीपीएम को यदि हम इस मुद्दे पर चर्चा में शामिल कर रहे हैं तो वह नंदीग्राम के कारण है. नंदीग्राम में सीपीएम के कार्यकर्ताओं ने अपने वैश्विक आर्थिक एजेंडे को लागू करने के लिए अपने विरोधियों की हिंसा की जवाब प्रतिहिंसा से दिया. इसके बावजूद इसमें कोई संदेह नहीं की वामपंथियों की नीतियां मूलत: धर्मनिरपेक्ष हैं परंतु उनमें भी साम्प्रदायिकता से सीधे भिड़ने के साहस का अभाव है. वामपंथियों द्वारा शासित प्रदेशों में अल्पसंख्यकों की हालत कोई बहुत अच्छी नहीं है.

भाजपा का जन्म आरएसएस की कोख से हुआ है. आरएसएस का एकमात्र लक्ष्य हिन्दू राष्ट्र की स्थापना है. अल्पसंख्यकों से घृणा करना संघ की मानसिकता के मूल में है. संघ और उससे जुड़े हुए संगठन, जिनमें विहिप, बजरंग दल, वनवासी कल्याण आश्रम इत्यादि शामिल हैं, समाज का साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण करने में कोई कसर उठा कर नहीं रखते.

साम्प्रदायिकता के पैमाने पर हम राजनैतिक दलों और नेताओं को मुख्यत: पाँच श्रेणियों में बाँट सकते हैं. पहली श्रेणी में वे पार्टियां और नेता हैं जो धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के लिए खुलकर, बिना डरे लड़ने के लिए तैयार हैं. ये वे लोग हैं जिनकी आस्था भगतसिंह, महात्मा गाँधी और अम्बेडकर के सिध्दांतों में है. भारत के राजनैतिक परिदृश्य में ऐसी पार्टियों और नेताओं का पूर्ण अभाव है.

वामपंथी, नीतियों और विचारों से धर्मनिरपेक्ष हैं परंतु धर्मनिरपेक्षता के लिए आगे बढ़कर लड़ने की क्षमता उनमें नहीं है. कांग्रेस तो साम्प्रदायिक तत्वों से हाथ मिलाने में तनिक भी नहीं सकुचाती. भाजपा का एक मात्र उद्देस्य संघ के हिन्दू राष्ट्र बनाने के सपने को पूरा करना है और देर-सबेर भाजपा इस देश में प्रजातंत्र और धर्मनिरपेक्षता को जिंदा नहीं रहने देगी.

सिक्ख-विरोधी हिंसा एक अपवाद था जिसके पीछे क्षेत्रीय और नस्लवादी कारक थे. नंदीग्राम में हुआ कत्लेआम आर्थिक कारणों से हुआ था.

हम बेशक इस नतीजे पर पहुंच सकते हैं कि जहाँ भाजपा मनसा-वाचा-कर्मणा साम्प्रदायिक है, वहीं अन्य पार्टियां और गठबंधन कभी-कभी अपने राजनैतिक लक्ष्यों की पूर्ति के लिए साम्प्रदायिकता का सहारा लेते हैं.

 

04.04.2009, 19.40 (GMT+05:30) पर प्रकाशि

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A.K.SHARMA (anilsharma83@yahoo.co.in) CHANDIGARH

 
 धर्मनिरपेक्षता पर कोई भी टिप्पणी करने से पहले धर्मनिरपेक्षता के विषय में जान लेना आवश्यक है. असली धर्मनिरपेक्षता तो सर्वधर्म समभाव में निहित है, जिसका पालन हम भारतीय युगों-युगों से करते आये हैं लेकिन जो देश में वर्तमान समय में धर्मनिरपेक्षता का स्वरुप प्रचलित है वो नेहरुवादी धर्मनिरपेक्षता है. यह धर्मनिरपेक्षता का वह घिनौना रुप है, जिसे नेहरु ने लंदन की गलियों से उठाया था. इस नेहरुवादी धर्मनिरपेक्षता के अनुसार केवल वही सच्चा धर्मनिरपेक्षता है जो भारत के इतिहास को मीथ कहे और भारतीय संस्कृति-सभ्यता का मजाक उड़ाये और साथ ही साथ तथाकथित अल्पसंख्यकों का गुणगान करे.

संघ परिवार के बारे में लेखक महोदय ने काफी विष वमन किया है. संघ परिवार कभी भी मुसलमानों का विरोध नहीं करता. वो तो सिर्फ इतना चाहता है कि समस्त देशवासी भारत भू को अपना समझें. संघ परिवार अंगरेजों की देन अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक सिंड्रोम के खिलाफ है. जब सारे लोग भारत माता की संतान हैं तो अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का क्या अर्थ है ?

जहां तक भारत का एक हिंदू राष्ट्र बनने या बनाने का सवाल है, ये भी एक राजनीतिक षडयंत्र है. हिंदूओं का बहुमत होने के कारण भारत तो पहले ही एक हिंदू राष्ट्र है ही, इसमें विवाद क्या है ? अब यदि किसी गौशाले में एक गदहा या घोड़ा बांध दें तो भी वो बिल्डिंग गौशाला ही कहलाएगी. यही हाल हिंदुस्तान का भी है.

वास्तव में अपनी दुर्दशा के लिए मुसलमान खुद ही जिम्मेवार हैं. मुसलमान भारत में एक आक्रमक के रुप में आए लेकिन इतनी सदियों के बाद भी वो अपने आप को आक्रमक ही समझते हैं. वो आज भी राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल होने को तैयार नहीं है. यदि वो तैयार होते भी हैं तो तथाकथित सेकुलरवादी उनको मुख्यधारा में आने नहीं देते. अफसोस की बात है कि आज भी भारत के मुसलमान भारतीय राम के बजाय बाहर से आये आक्रांता बाबर से अपनी पहचान बनाते हैं.

अयोध्या का मसला इस त्रासदी की जीती-जागती मिसाल है. जब तक भारतीय मुसलमान राष्ट्रीय मुख्यधारा में शामिल नहीं होगा, वो यूं ही पिछड़ा रहेगा और सेकुलरवादी यूं ही उसका राजनीतिक शोषण करते रहेंगे. वास्तव में मुसलमानों को सबसे ज्यादा खतरा राम पुनियानी जैसे सेकुलरवादियों से ही है.
 
   
 

Omprakash pal (pal.omprakash1@gmail.com) Delhi

 
 धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्धता और समझौताविहिन संघर्ष के कारण ही आज वामपंथी निर्विवाद रुप से धर्मनिरपेक्ष के बतौर पहचाने जाते हैं, इसलिए ये कहना ठीक नहीं है कि वामपंथी धर्मनिरपेक्षता के लिए आगे बढकर लड़ने की क्षमता नहीं रखते..... हां, वामपंथियों की सीमा दूसरी है और उसपर जरुर बात होनी चाहिए.

धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र को सबसे ज्यादा खतरा कांग्रेस/भाजपा से है. विचारधाराविहिन मध्यमार्गी दलों ने भी मूल्यों को कम नुकसान नहीं पहुंचाया है.
 
   

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