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इनको मारो जूते चार

बात पते की

 

इनको मारो जूते चार

कनक तिवारी

 

बहुजन समाज पार्टी ने पहले एक नारा दिया था “तिलक तराजू औ तलवार, इनको मारो जूते चार.” जाहिर है बहुजन समाज पार्टी का यह नारा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र पर आधारित कथित मनु व्यवस्था की वर्णाश्रम पध्दति पर एक मनोवैज्ञानिक प्रहार था.

कनक तिवारी


यही बहुजन समाज पार्टी जब अपनी उच्च वर्णीय घातक नफरत के बावजूद राजनीति के सट्टा बाजार में पिटने लगी तो उसने मायावती के नेतृत्व में एक ब्राह्मण वकील सतीशचंद्र मिश्र की सलाह से उसे सर्व समाज पार्टी का नकाब ओढ़ा दिया. इस बात का जबरिया प्रचार किया गया कि बसपा ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों को भी कम से कम आनुपातिक आधार पर अपनी पार्टी के अंक गणित में आरक्षित समझती है.

बसपा में भी आरक्षण का यह कानून लागू होता है कि यदि उच्च वर्ग के राजनेता ज्यादा काबिल हों तो जनसंख्या के आधार पर लागू आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाया भी जा सकता है. लेकिन इस राजनीतिक शल्य क्रिया में वह बेचारा जूता पिट गया, जो तिलक, तराजू और तलवार के धारकों पर सामाजिक कहर बनकर टूट पड़ना चाहता था. स्वर्गीय कांशीराम के समय से प्रचलित दोहे वाला जूता बहन जी की चप्पल में तब्दील हो गया.

बसपा में जूता एक आउट डेटेड हथियार है. अब तो बसपा के विधायक तिलक, तराजू और तलवार के बल पर बल्कि बंदूकों की संगीन तानकर सरकारी अधिकारियों से इतनी वसूली करते हैं कि वे बेचारे किसानों के मुकाबले आत्महत्या कर रहे हैं.

यह पता नहीं है कि जब इतिहास पुरुष (?) राम लंका गए थे तब वे नंगे पैर थे अथवा जूते पहने हुए क्योंकि उन्हें कथित तौर पर कंकड़, पत्थर और कांटे गड़ते तो रहते थे. अयोध्या में मंदिर जब भी बनेगा उसमें हिन्दू जन आस्थाओं के मुताबिक राम की मूर्ति को जूता तो नहीं ही पहनाया जाना चाहिए.

इसके बावजूद भारतीय, नहीं नहीं छत्तीसगढ़ (तत्कालीन मध्यप्रदेश) की राजनीति में पहला जूता विधानसभा में अध्यक्ष की आसंदी पर जनसंघ के विधायक पंढरी राव कृदत्त ने फेंका था. कृदत्त राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पदाधिकारी थे और बहुत सज्जन तथा चरित्रवान व्यक्ति. दूसरा जूता जॉर्ज बुश पर फेंका गया. इस जूते का मालिक एक पत्रकार कहा जाता है, जो अमरीका के इराक पर मालिकी हक के खिलाफ था. चीन के प्रधानमंत्री पर भी बौध्दिक जूता फेंका गया. गृहमंत्री चिदंबरम पर पत्रकार जरनैल सिंह ने जूता इस तरह फेंका, जैसे वह जूता मार नहीं रहा हो केवल उसे फेंक रहा हो या भीख में दे रहा हो. कांग्रेसी सांसद नवीन जिंदल पर रिटायर्ड अध्यापकीय जूता जानबूझकर इस तरह फेंका गया कि वह जूता होने में ही शर्मसार महसूस करे.

इन सभी प्रकरणों में एक बात स्पष्ट है कि ये सभी जूते बौध्दिक व्यक्तित्वों द्वारा सत्ताधीशों की ओर फेंके गए. ये जूते इतिहास में असफल गिने जाएंगे क्योंकि वह जूता ही क्या, जो मुकाम तक नहीं पहुंचे.

इसमें भी कोई शक नहीं कि भारतीय बौध्दिक भ्रष्ट और क्रूर शासन व्यवस्था के बरक्स नपुंसक होने की हद तक शरीफ हैं. वे चाहते हैं कि क्रांति तो हो लेकिन पड़ोसी के घर से शुरू हो. अब लिजलिजे बौध्दिकों का सब्र अगर टूट रहा है तो शासकों को सचेत होना पड़ेगा कि यदि किसान, मजदूर, छात्र और बेरोजगार नौजवान कभी जूता-चिंतन करने लगे तो जूते बड़ी दुर्गति करेंगे. वे सिर से टकरा-टकरा कर खुद भी अधमरे हो जाएंगे.

लोकसेवकों पर जूता फेंकना बड़ा अपराध है लेकिन जनता पर जूता फेंकना छोटा अपराध है. यही विभाजक भारतीय दंड विधान अंग्रेज़ मैकाले हमको दे गया है.

ज़ाहिर है, प्रसंगेय अपराधों में जूता हथियार होने के कारण जप्त किया जाने योग्य है. लेकिन पुलिस को इस बात की परवाह नहीं होती कि हिंसक जूते की जप्ती के साथ अहिंसक जूता जोड़ीदार होने के बावजूद गुमनामी के खंदकों में दफ्न क्यों हो जाता है. तबले के जोड़ीदार डग्गे की तरह उसे भविष्य के संभावित हथियार के रूप में अथवा निष्क्रिय बुध्दिजीवी के ऊहापोह के प्रतीक में किस तरह समझा जाए? इसका चिंतन मैकाले ने नहीं ही किया था और भारतीय पुलिस को अहिंसक जूतों से क्या लेना देना.

वर्षों पहले मैं पटना गया था. रिक्शे के पैडल पर जोर लगाने पर चेन गिर जाती थी. झल्लाकर रिक्शे वाले ने दाएं पैर का जूता सड़क के किनारे फेंक दिया. उतनी कमनीयता के साथ नहीं जितनी ऊपर के उदाहरणों में है. वह बाएं पैर का जूता पहने रहा. मैंने कहा उसे भी क्यों नहीं फेंक दिया तो बोला- मैं काम बिगाड़ू और कामचोर जूतों को एक साथ नहीं रहने दूंगा.

यह अक्सर सुना जाता है कि दो मुकाबले की टीमों में जब मैच होता है, या कोई घिसा हुआ नेता जनता को बोर करने के लिए भाषण देने आता है तो नौजवान छोकरे टमाटर और सड़े अंडे वगैरह इकट्ठा कर मनोरंजन का कार्यक्रम बनाते हैं. हो सकता है, आगे चलकर उन जूतों को भी कबाड़ी लोग बेचें जो अपने हिंसक जुड़वा भाइयों से बिछड़कर अपनी सामाजिक भूमिका अदा नहीं कर पाने के कारण बिसूर रहे हों.

जूते के मुकाबले चप्पलों ने ज्यादा अच्छा इतिहास रचा है. फिल्म कलाकार शेख मुख्तार का 12 नंबर का जूता फिल्मों में क्लोज़अप में मुक्तिदाता दिखाई देता था. लेकिन यथार्थ जीवन में वह एक भले आदमी का बोझ ढोता था. शेख मुख्तार कोई मुख्तार अंसारी थोड़े ही थे और शेख होने के बावजूद उनका बिरहमन (बकौल इकबाल) से कोई बैर नहीं था.

करीम मियां के जूते तो इतने प्रसिध्द हैं कि ससुरे खुद लात खाते फिरते थे और बेचारे करीम मियां के सर पर लौट लौट आते थे. लेकिन भारतीय ललनाओं ने चप्पलों को फेंकने की मूर्खता अधिकतर नहीं की. बहुत से गुंडे, बदमाषों, मजनुओं और शोहदों के सिर के बाल कमनीय हाथों की चप्पलों ने उड़ाए हैं. बहुत से शराबी पतियों की पिटाई छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा पत्नियां ही कर रही हैं. ऐसी चप्पलें लेकिन अब तक पतियों की शराबखोरी की लत को दूर नहीं कर पाईं जैसे चप्पलों के पति जूते न तो किसी लक्ष्य तक पहुंचते हैं और न ही जूता होने का चरित्र छोड़ते हैं.

बेढब या बेधड़क बनारसी ने लिखा था “देश में जूता चला मशहूर बाटा हो गया, देश में लोहा गला मशहूर टाटा हो गया. योजनाएं यूं चलीं जैसे छिनालों की जबान, हम जमा करते रहे, खाते में घाटा हो गया.”

गांवों, कस्बों के चर्मकार जो दस्तकारी से पसीना बहाकर जूते बनाते हैं, वे यदि किसी के सिर पर पड़ जाएं तो सिर टूट ही जाए.


कुछ लोग देश में जूता उद्योग के पैरोकार बने हुए हैं. उनके जूते जब हिंसक होते हैं तो धार्मिक स्थल ढहाए जाते हैं. सांप्रदायिक कत्लेआम होते हैं. बलात्कार होते हैं. आगजनी होती है और चिताओं की आग में बैठकर कुछ लोगों की मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री पद की रोटी सेंकी जाती है. उस रोटी पर विदेशी मक्खन लगाया जाता है.

80 बरस से ज्यादा उम्र होने पर भी चेहरे की चाशनी कायम रहती है लेकिन वह नमक घट जाता है जिसे गांधी ने दांडी में मुट्ठी में लेकर दधीचि ऋषि की भूमिका अदा की थी. जो अल्पसंख्यकों के हाथ काटना चाहते हैं. जो खून का बदला खून से लेने की बात कहकर भी सीबीआई तक के चंगुल से छूट जाते हैं. जो तबाही और कत्लेआम मचाने के बावजूद भ्रष्ट न्यायपालिका में पनाह पाते हैं. जो विदेशों में जाकर जूते खाने जैसा बर्ताव भारत के लिए उपहार में लाते हैं.

वे सब इक्कीसवीं सदी के ऐसे पांव हैं, जो अपने जूतों को ज़हर की तरह समाज में बेच रहे हैं. वे अश्लील गालियां बकते हैं. संसद में बैठकर जनविरोधी कानून बनाते हैं. गोरी चमड़ी के देशों के पैरों में नाक रगड़ते हैं. निरीह आदिवासियों को गोलियों से भूंजते हैं. जो दलितों को अपना भाई समझने के बदले पशुओं से भी बदतर समझते हैं क्योंकि पशु को तो माता भी कह देते हैं. जो देश में ज़हरीला प्रदूषण फैला रहे हैं. जो पीने के पानी की डकैती कर रहे हैं. जो लोकप्रिय चुनाव में हारने के बाद राज्यसभा और विधान परिषदों की बैसाखी पर चढ़कर पिछले दरवाजे से राजपथ में पहुंचते हैं लेकिन उसे जनपथ कहते हैं. जिनकी वजह से देश शोक में डूब जाता है, वे ऐतिहासिक अशोक को भी साम्राज्यवादी करार देते हैं.

ये सभी लोग जूतों के ही तो सहोदर हैं. लेकिन कमबख्त लक्ष्य नहीं चूकते हैं. वे जनता के सिरों पर, देह पर, आत्मा पर लगातार टूट रहे हैं. जूतों का यह दोहरा चरित्र एक भाई को हिंसक राजनीति और दूसरे को अहिंसक व्यवसाय में रखता है जिससे जूता-संस्कृति फलती फूलती रहे और जनता के सिर सुरक्षित नहीं रहें.

बाटा, फ्लेक्स, लिबर्टी वगैरह भारतीय जूतों से लेकर गुच्ची जैसे इतालवी जूते महंगे हैं, नफीस हैं लेकिन आम जनता के काम के नहीं हैं. गांवों, कस्बों के चर्मकार जो दस्तकारी से पसीना बहाकर जूते बनाते हैं, वे यदि किसी के सिर पर पड़ जाएं तो सिर टूट ही जाए. पता नहीं ये स्लम डॉग मिलेनियर होने का कलंक लिए जूते 3 रुपए किलो बल्कि 2 रुपए किलो का चावल अहसान समझकर खाने और 20 रुपए का पौवा पीने के नशे से मुक्त होकर कब अपने जूताई चरित्र को परवान चढ़ाएंगे.

 

11.04.2009, 22.39 (GMT+05:30) पर प्रकाशित