पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
 पहला पन्ना > कनक तिवारी Print | Send to Friend | Share This 

इनको मारो जूते चार

बात पते की

 

इनको मारो जूते चार

कनक तिवारी

 

बहुजन समाज पार्टी ने पहले एक नारा दिया था “तिलक तराजू औ तलवार, इनको मारो जूते चार.” जाहिर है बहुजन समाज पार्टी का यह नारा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र पर आधारित कथित मनु व्यवस्था की वर्णाश्रम पध्दति पर एक मनोवैज्ञानिक प्रहार था.

कनक तिवारी


यही बहुजन समाज पार्टी जब अपनी उच्च वर्णीय घातक नफरत के बावजूद राजनीति के सट्टा बाजार में पिटने लगी तो उसने मायावती के नेतृत्व में एक ब्राह्मण वकील सतीशचंद्र मिश्र की सलाह से उसे सर्व समाज पार्टी का नकाब ओढ़ा दिया. इस बात का जबरिया प्रचार किया गया कि बसपा ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों को भी कम से कम आनुपातिक आधार पर अपनी पार्टी के अंक गणित में आरक्षित समझती है.

बसपा में भी आरक्षण का यह कानून लागू होता है कि यदि उच्च वर्ग के राजनेता ज्यादा काबिल हों तो जनसंख्या के आधार पर लागू आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाया भी जा सकता है. लेकिन इस राजनीतिक शल्य क्रिया में वह बेचारा जूता पिट गया, जो तिलक, तराजू और तलवार के धारकों पर सामाजिक कहर बनकर टूट पड़ना चाहता था. स्वर्गीय कांशीराम के समय से प्रचलित दोहे वाला जूता बहन जी की चप्पल में तब्दील हो गया.

बसपा में जूता एक आउट डेटेड हथियार है. अब तो बसपा के विधायक तिलक, तराजू और तलवार के बल पर बल्कि बंदूकों की संगीन तानकर सरकारी अधिकारियों से इतनी वसूली करते हैं कि वे बेचारे किसानों के मुकाबले आत्महत्या कर रहे हैं.

यह पता नहीं है कि जब इतिहास पुरुष (?) राम लंका गए थे तब वे नंगे पैर थे अथवा जूते पहने हुए क्योंकि उन्हें कथित तौर पर कंकड़, पत्थर और कांटे गड़ते तो रहते थे. अयोध्या में मंदिर जब भी बनेगा उसमें हिन्दू जन आस्थाओं के मुताबिक राम की मूर्ति को जूता तो नहीं ही पहनाया जाना चाहिए.

इसके बावजूद भारतीय, नहीं नहीं छत्तीसगढ़ (तत्कालीन मध्यप्रदेश) की राजनीति में पहला जूता विधानसभा में अध्यक्ष की आसंदी पर जनसंघ के विधायक पंढरी राव कृदत्त ने फेंका था. कृदत्त राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पदाधिकारी थे और बहुत सज्जन तथा चरित्रवान व्यक्ति. दूसरा जूता जॉर्ज बुश पर फेंका गया. इस जूते का मालिक एक पत्रकार कहा जाता है, जो अमरीका के इराक पर मालिकी हक के खिलाफ था. चीन के प्रधानमंत्री पर भी बौध्दिक जूता फेंका गया. गृहमंत्री चिदंबरम पर पत्रकार जरनैल सिंह ने जूता इस तरह फेंका, जैसे वह जूता मार नहीं रहा हो केवल उसे फेंक रहा हो या भीख में दे रहा हो. कांग्रेसी सांसद नवीन जिंदल पर रिटायर्ड अध्यापकीय जूता जानबूझकर इस तरह फेंका गया कि वह जूता होने में ही शर्मसार महसूस करे.

इन सभी प्रकरणों में एक बात स्पष्ट है कि ये सभी जूते बौध्दिक व्यक्तित्वों द्वारा सत्ताधीशों की ओर फेंके गए. ये जूते इतिहास में असफल गिने जाएंगे क्योंकि वह जूता ही क्या, जो मुकाम तक नहीं पहुंचे.

इसमें भी कोई शक नहीं कि भारतीय बौध्दिक भ्रष्ट और क्रूर शासन व्यवस्था के बरक्स नपुंसक होने की हद तक शरीफ हैं. वे चाहते हैं कि क्रांति तो हो लेकिन पड़ोसी के घर से शुरू हो. अब लिजलिजे बौध्दिकों का सब्र अगर टूट रहा है तो शासकों को सचेत होना पड़ेगा कि यदि किसान, मजदूर, छात्र और बेरोजगार नौजवान कभी जूता-चिंतन करने लगे तो जूते बड़ी दुर्गति करेंगे. वे सिर से टकरा-टकरा कर खुद भी अधमरे हो जाएंगे.

लोकसेवकों पर जूता फेंकना बड़ा अपराध है लेकिन जनता पर जूता फेंकना छोटा अपराध है. यही विभाजक भारतीय दंड विधान अंग्रेज़ मैकाले हमको दे गया है.

ज़ाहिर है, प्रसंगेय अपराधों में जूता हथियार होने के कारण जप्त किया जाने योग्य है. लेकिन पुलिस को इस बात की परवाह नहीं होती कि हिंसक जूते की जप्ती के साथ अहिंसक जूता जोड़ीदार होने के बावजूद गुमनामी के खंदकों में दफ्न क्यों हो जाता है. तबले के जोड़ीदार डग्गे की तरह उसे भविष्य के संभावित हथियार के रूप में अथवा निष्क्रिय बुध्दिजीवी के ऊहापोह के प्रतीक में किस तरह समझा जाए? इसका चिंतन मैकाले ने नहीं ही किया था और भारतीय पुलिस को अहिंसक जूतों से क्या लेना देना.

वर्षों पहले मैं पटना गया था. रिक्शे के पैडल पर जोर लगाने पर चेन गिर जाती थी. झल्लाकर रिक्शे वाले ने दाएं पैर का जूता सड़क के किनारे फेंक दिया. उतनी कमनीयता के साथ नहीं जितनी ऊपर के उदाहरणों में है. वह बाएं पैर का जूता पहने रहा. मैंने कहा उसे भी क्यों नहीं फेंक दिया तो बोला- मैं काम बिगाड़ू और कामचोर जूतों को एक साथ नहीं रहने दूंगा.

यह अक्सर सुना जाता है कि दो मुकाबले की टीमों में जब मैच होता है, या कोई घिसा हुआ नेता जनता को बोर करने के लिए भाषण देने आता है तो नौजवान छोकरे टमाटर और सड़े अंडे वगैरह इकट्ठा कर मनोरंजन का कार्यक्रम बनाते हैं. हो सकता है, आगे चलकर उन जूतों को भी कबाड़ी लोग बेचें जो अपने हिंसक जुड़वा भाइयों से बिछड़कर अपनी सामाजिक भूमिका अदा नहीं कर पाने के कारण बिसूर रहे हों.

जूते के मुकाबले चप्पलों ने ज्यादा अच्छा इतिहास रचा है. फिल्म कलाकार शेख मुख्तार का 12 नंबर का जूता फिल्मों में क्लोज़अप में मुक्तिदाता दिखाई देता था. लेकिन यथार्थ जीवन में वह एक भले आदमी का बोझ ढोता था. शेख मुख्तार कोई मुख्तार अंसारी थोड़े ही थे और शेख होने के बावजूद उनका बिरहमन (बकौल इकबाल) से कोई बैर नहीं था.

करीम मियां के जूते तो इतने प्रसिध्द हैं कि ससुरे खुद लात खाते फिरते थे और बेचारे करीम मियां के सर पर लौट लौट आते थे. लेकिन भारतीय ललनाओं ने चप्पलों को फेंकने की मूर्खता अधिकतर नहीं की. बहुत से गुंडे, बदमाषों, मजनुओं और शोहदों के सिर के बाल कमनीय हाथों की चप्पलों ने उड़ाए हैं. बहुत से शराबी पतियों की पिटाई छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा पत्नियां ही कर रही हैं. ऐसी चप्पलें लेकिन अब तक पतियों की शराबखोरी की लत को दूर नहीं कर पाईं जैसे चप्पलों के पति जूते न तो किसी लक्ष्य तक पहुंचते हैं और न ही जूता होने का चरित्र छोड़ते हैं.

बेढब या बेधड़क बनारसी ने लिखा था “देश में जूता चला मशहूर बाटा हो गया, देश में लोहा गला मशहूर टाटा हो गया. योजनाएं यूं चलीं जैसे छिनालों की जबान, हम जमा करते रहे, खाते में घाटा हो गया.”

गांवों, कस्बों के चर्मकार जो दस्तकारी से पसीना बहाकर जूते बनाते हैं, वे यदि किसी के सिर पर पड़ जाएं तो सिर टूट ही जाए.


कुछ लोग देश में जूता उद्योग के पैरोकार बने हुए हैं. उनके जूते जब हिंसक होते हैं तो धार्मिक स्थल ढहाए जाते हैं. सांप्रदायिक कत्लेआम होते हैं. बलात्कार होते हैं. आगजनी होती है और चिताओं की आग में बैठकर कुछ लोगों की मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री पद की रोटी सेंकी जाती है. उस रोटी पर विदेशी मक्खन लगाया जाता है.

80 बरस से ज्यादा उम्र होने पर भी चेहरे की चाशनी कायम रहती है लेकिन वह नमक घट जाता है जिसे गांधी ने दांडी में मुट्ठी में लेकर दधीचि ऋषि की भूमिका अदा की थी. जो अल्पसंख्यकों के हाथ काटना चाहते हैं. जो खून का बदला खून से लेने की बात कहकर भी सीबीआई तक के चंगुल से छूट जाते हैं. जो तबाही और कत्लेआम मचाने के बावजूद भ्रष्ट न्यायपालिका में पनाह पाते हैं. जो विदेशों में जाकर जूते खाने जैसा बर्ताव भारत के लिए उपहार में लाते हैं.

वे सब इक्कीसवीं सदी के ऐसे पांव हैं, जो अपने जूतों को ज़हर की तरह समाज में बेच रहे हैं. वे अश्लील गालियां बकते हैं. संसद में बैठकर जनविरोधी कानून बनाते हैं. गोरी चमड़ी के देशों के पैरों में नाक रगड़ते हैं. निरीह आदिवासियों को गोलियों से भूंजते हैं. जो दलितों को अपना भाई समझने के बदले पशुओं से भी बदतर समझते हैं क्योंकि पशु को तो माता भी कह देते हैं. जो देश में ज़हरीला प्रदूषण फैला रहे हैं. जो पीने के पानी की डकैती कर रहे हैं. जो लोकप्रिय चुनाव में हारने के बाद राज्यसभा और विधान परिषदों की बैसाखी पर चढ़कर पिछले दरवाजे से राजपथ में पहुंचते हैं लेकिन उसे जनपथ कहते हैं. जिनकी वजह से देश शोक में डूब जाता है, वे ऐतिहासिक अशोक को भी साम्राज्यवादी करार देते हैं.

ये सभी लोग जूतों के ही तो सहोदर हैं. लेकिन कमबख्त लक्ष्य नहीं चूकते हैं. वे जनता के सिरों पर, देह पर, आत्मा पर लगातार टूट रहे हैं. जूतों का यह दोहरा चरित्र एक भाई को हिंसक राजनीति और दूसरे को अहिंसक व्यवसाय में रखता है जिससे जूता-संस्कृति फलती फूलती रहे और जनता के सिर सुरक्षित नहीं रहें.

बाटा, फ्लेक्स, लिबर्टी वगैरह भारतीय जूतों से लेकर गुच्ची जैसे इतालवी जूते महंगे हैं, नफीस हैं लेकिन आम जनता के काम के नहीं हैं. गांवों, कस्बों के चर्मकार जो दस्तकारी से पसीना बहाकर जूते बनाते हैं, वे यदि किसी के सिर पर पड़ जाएं तो सिर टूट ही जाए. पता नहीं ये स्लम डॉग मिलेनियर होने का कलंक लिए जूते 3 रुपए किलो बल्कि 2 रुपए किलो का चावल अहसान समझकर खाने और 20 रुपए का पौवा पीने के नशे से मुक्त होकर कब अपने जूताई चरित्र को परवान चढ़ाएंगे.

 

11.04.2009, 22.39 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

दीपक (deepakrajim@gmail.com) कुवैत

 
 ऐसे ही तीखे और गुंजते सच हम बहरो को जगाये शायद !!नही तो फ़्री की दारु से हम अलग-अलग साईज के जुते चुन-चुनकर तो भेज ही रहे है !!

जब कलम का भी असर होता नही दिखता तो कमबख्त ऐसा लगता है कि चार जुता सामने वालो को मारु और दस अपने सर पर !!
 
   
 

पी पी वाजपेयी नई दिल्ली

 
 कांग्रेस को अगर इस जूते से शर्म आती और उसे दंगों का ख्याल होता तो 1984, 89, 91, 96, 99, 2004 में भी टाइटलर को टिकट न देती। कांग्रेस की यह आपसी जूतम पैजार है, जिसके कारण उसने इन दो दंगा वालों की टिकट काटी. 25 साल हो गये दंगों के लेकिन कांग्रेस को कभी इसका ख्याल नहीं रहा.

और जो लोग टाइटलर को ईसाई समझते हैं, उनके लिए बस इतनी जानकारी दे दूं कि ये जगदीश कपूर हैं, जो पाकिस्तान के गुंजरावाला में पैदा हुए थे और जब भारत आये तो सुप्रसिद्ध ईसाई शिक्षाविद जेम्स डगलस टाइटलर ने गोद ले लिया था.
 
   
 

कुमार संजय नई दिल्ली

 
 यह जरनैल का जरनैलिस्टिक अप्रोच था कनक जी. वह जरनैल सिंह भिंडरावाला भी नहीं है. उसने तो केवल विरोध प्रकट किया है, अब हम हैं कि उसे पत्रकारिता से जोड़ कर देख रहे हैं. अगर जरनैल ने ये न किया होता तो टाइटलर और सज्जन जैसे लोग फिर से संसद में पहुंचकर माननीय कहलाते रहते.
एक अच्छी टिप्पणी के लिए आपको साधुवाद.
 
   
 

Sanjay kumar ghosh Accra, Ghana

 
 Do You know why George Bush Shoe Attack Was Completely Awesome ?

1. Because before the shoe was even thrown by Iraqi reporter Muntadar al-Zaidi, George Bush went in for a straight-on fraternity-style handshake with Iraqi Prime Minister Nuri Kamal al-Maliki.
2. Because shoe-throwing (along with calling someone a dog, which al-Zaidi also did) is one of the most offensive insults an Iraqi Arab can hurl. After the fall of Baghdad, the United States government made much ado about those seemingly trumped-up videos of children throwing shoes at the fallen statue of Saddam Hussein. It's not awesome to see our president attacked, but it does neatly complete the circle, doesn't it?
3. Because al-Maliki totally tried to deflect the second shoe.
4. But he didn't try that hard.
5. Because George Bush was kind of laughing throughout the whole thing.
6. Because the other Iraqi reporters immediately jumped in to stop the shoe attacks.
7. But the Secret Service took their sweet, sweet time to take the guy down.
8. And let's be honest, the reporters around al-Zaidi who reacted the quickest were mostly just taking pictures.
9. Because nothing politically funny ever happens over the weekend now that the election is over (we're looking at you, Saturday Night Live).
10. Because whatever you think of George Bush, he ducked those shoes like a frigging Japanese game-show contestant. No other world leader could have dealt with that situation with the same humor and quick reflexes. We're legitimately impressed.
 
   
 

एस एम त्रिपाठी टोरंटो, कनाडा

 
 आपने सही कहा कि जनता को तो जूते पड़ते ही रहते हैं.यह तो हम हैं कि हमने अपने बर्दाश्त करने की क्षमता इतनी बढ़ा ली है और जूता न पड़े तो अचकचा जाते हैं.  
   
 

डॉ . लाल रत्नाकर (ratnakarlal@gmail.com) Ghaziabad

 
 जूते को लेकर तो आपने हमारी आंख ही खोल दी, इतने महत्व का लेख लिख दिया. ये जब तक जोरे में होते हैं, पैरों में होते हैं. जैसे ही अलग होते हैं, चर्चा में आ जाते हैं. चमरौंधे जूते तो तेल पीये होते हैं, दोनों साथ-साथ पीये होते हैं. पैरों से जब ये निकलते हैं तो इनका काम ही बदल जाता है, कभी मियां की जूती मियां के सर. इनकी कहानी पुरानी है.

पर बहिन जी ने तो ललकारा ही था....उनको मारे जूते चार पर वो बिचारे मारे या न मारे, मिश्रा बंधुओं ने उनको इतने जूते मारे हैं कि आजकल बहिन जी को भी डर लगने लगा होगा कि कहीं से जूते न आ जाएं.

इस बीच एक घटना ये हुई कि मेरे कॉलेज के प्रिंसिपल के पावों के दो जूते थे, उन्हीं पर वह चल रहे थे. उसमें से एक को मैनेजमेंट ने प्रिंसिपल बना दिया. तो कुल मिला के जब-जब पैरो से ये निकलते है तब तब अपने तो चर्चा में रहते है और साथी का अता पता नहीं होता.
यथा जय हो. जूतों की.
 
   

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   

 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in