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इस पुतली की डोर कहां

मुद्दा

 

इस पुतली की डोर कहां

राम पुनियानी

 


कुछ समय पहले तक श्री लालकृष्ण आडवाणी अपनी लगभग हर आमसभा में डॉ मनमोहन सिंह को देश का अब तक का सबसे कमजोर प्रधानमंत्री बताते रहे हैं. आडवाणी ने चुप्पी तब साधी जब डॉ मनमोहन सिंह ने उनपर पलटवार करते हुए भाजपा नेता को कंधार कांड, बाबरी मस्जिद के ढहाये जाने और गुजरात कत्लेआम में उनकी भूमिका की याद दिलाई. श्रीमती सोनिया गांधी ने 15 अप्रैल को कर्नाटक के बीदर में भाषण देते हुए आडवाणी और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को आरएसएस का गुलाम निरूपित किया. इस हमले से भाजपा बौखला गई और उसके नेतृत्व ने कमजोर और अस्पष्ट सा स्पष्टीकरण दिया.

भाजपा और संघ के आपसी रिश्ते एक बार फिर सार्वजनिक मंचो पर चर्चा का विषय बन गए हैं. इसमें कोई संदेह नहीं कि विचारधारा और संगठन-दोनों ही स्तरों पर आरएसएस देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी पर अपना कड़ा और पूरा नियंत्रण रखता है. संघ हमेशा से स्वयं को सांस्कृतिक संगठन कहता रहा है परंतु हम सब जानते हैं कि आरएसएस एक राजनैतिक संगठन है जो बड़ी संख्या में स्वयंसेवक तैयार करता है. ये स्वयंसेवक समाज में फैलकर अलग-अलग मंचों और संगठनों से राजनीति में दखल देते हैं. इन संगठनों में सन् 1936 में बनाई गई राष्ट्र सेविका समिति से लेकर बाद के वर्षों में अस्तित्व में आए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, भारतीय जनसंघ, विश्व हिन्दू परिषद, वनवासी कल्याण आश्रम इत्यादि शामिल हैं.

जब अटलबिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तब अमेरिका के स्टेटिन आयलैंड में भाषण देते हुए उन्होंने अपने आपको पहले स्वयंसेवक और बाद में प्रधानमंत्री बताया था.


इन सभी संगठनों का गठन आरएसएस के प्रशिक्षित स्वयंसेवको द्वारा किया गया है और स्वयंसेवकों के जरिए ही संघ इन पर विचारधारा के स्तर पर नियंत्रण रखता है. इन संगठनों के कर्ता-धर्ता संघ की मध्यस्थता से आपस में समन्वय बनाए रखते हैं. इन सभी संगठनों का लक्ष्य और कार्य आरएसएस के काम को आगे बढ़ाना: अर्थात भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना है. यह महत्वपूर्ण है कि संघ परिवार के सभी प्रमुख व्यक्तित्व कभी न कभी प्रशिक्षित संघ प्रचारक रहे हैं-फिर चाहे वे नाथूराम गोडसे हों, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी या फिर नरेन्द्र मोदी.

जहां तक भाजपा का सवाल है, वह भारतीय जनसंघ का ही अवतार है. भारतीय जनसंघ की स्थापना श्यामाप्रसाद मुकर्जी ने सन् 1951 में की थी. महात्मा गांधी की हत्या के बाद भारत सरकार ने संघ को प्रतिबंधित कर दिया था. उस समय सरदार पटेल देश के गृहमंत्री थे. संघ को अपना काम चलाते रहने के लिए एक राजनैतिक संगठन की आवश्यकता थी और यह आवश्यकता जनसंघ ने पूरी की. भारतीय जनसंघ के निर्माण के समय आरएसएस ने अपने तीन प्रमुख प्रचारक-वाजपेयी, आडवाणी और दीनदयाल उपाध्याय की सेवाएं जनसंघ को सौंप दी थीं.

सन् 1954 के मार्च महीने में महाराष्ट्र के वर्धा में 300 प्रचारकों का राजनैतिक प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया. शिविर का उद्धेश्य आरएसएस के इन प्रचारकों को यह सिखाना था कि जनसंघ के जरिए वे किस तरह राष्ट्रीय राजनीति में अपनी पैठ बनाएं.

शिविर में जनसंघ कैसा होना चाहिए इस बारे में भाषण देते हुए तत्कालीन सरसंघ चालक एमएस गोलवलकर ने 16 मार्च 1954 को कहा – “अगर हम यह मानते हैं कि हम किसी संगठन के सदस्य हैं और हम उसके अनुशासन को स्वीकार करते हैं तब हम अपने जीवन का रास्ता चुनने का अधिकार को समर्पित कर देते हैं. हमें वही करना है जो हमसे कहा जाए. अगर कबड्डी खेलने को कहा जाए तो कबड्डी खेलो, अगर बैठक करने को कहा जाए तो बैठक करो. हमारे कुछ साथियों से राजनीति के क्षेत्र में काम करने के लिए कहा गया है. इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्हें राजनीति में कोई रूचि है. अगर उन्हें आज राजनीति से बाहर आने को कहा जाए तो भी कोई आपत्ति नहीं होगी. उनकी मर्जी का कोई महत्व ही नहीं है.” (श्री गुरूजी समग्र र्दशन, खण्ड 3 पृष्ठ 32, भारतीय विचार साधना, नागपुर). स्पष्ट है कि भाजपा में भेजे गए स्वयंसेवकों का काम भी आरएसएस के एजेन्डे को लागू करना है.

आपातकाल के बाद भारतीय जनसंघ, जनता पार्टी में शामिल हो गया. जयप्रकाश नारायण द्वारा बनाई गई जनता पार्टी दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर टूट गई. पार्टी के समाजवादी सदस्यों का कहना था कि जनता पार्टी के सदस्य साथ-साथ आरएसएस से जुड़े नहीं रह सकते. जनता पार्टी के जनसंघी नेता इस मुद्दे पर समझौते के लिए राजी नहीं हुए. उनके लिए जनता पार्टी के प्रति वफादारी से कहीं अधिक महत्वपूर्ण आरएसएस की सदस्यता थी. इससे एक बार फिर यह साफ हो गया कि जनसंघ के नेता मात्र कठपुतली थे, जिनका नियंत्रण आरएसएस के हाथों में था.

बाद में जनता पार्टी से अलग हुए जनसंघी, भारतीय जनता पार्टी का वेश धरकर सामने आए. उन्होंने गांधीवादी समाजवाद को अपना लक्ष्य घोषित किया. यह मात्र भुलावा था क्योंकि वे मौका मिलते ही राम रथ पर सवार हो गए और राम के नाम का जमकर शोषण किया. धीरे-धीरे उनकी ताकत बढ़ती गई परंतु सत्ता में आने के बाद भी आरएसएस का भाजपा पर शिकंजा जरा भी ढ़ीला नहीं पड़ा. संगठन और विचारधारा के स्तर पर तो भाजपा संघ से नियंत्रित थी ही, छोटे-छोटे मसलों पर भी संघ की स्वीकृति के बिना वह कुछ नहीं कर सकती थी. उदाहरण के लिए जब जसवंत सिंह को वित्त मंत्री बनाने का निर्णय हुआ तो आरएसएस को यह पसंद नहीं आया. अंतत: आरएसएस के दबाव में यशवंत सिन्हा को वित्त मंत्री बनाया गया.

जब अटलबिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तब अमेरिका के स्टेटिन आयलैंड में भाषण देते हुए उन्होंने अपने आपको पहले स्वयंसेवक और बाद में प्रधानमंत्री बताया था. आडवाणी का दिल्ली के झंडेवालान एस्टेट स्थित आरएसएस कार्यालय में आना-जाना लगा रहता है. वे आरएसएस के नागपुर मुख्यालय के भी नियमित मेहमान रहते हैं. आडवाणी का पाकिस्तान में जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष बताना आरएसएस को इतना खला कि उसने आडवाणी को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद छोड़ने पर मजबूर कर दिया.

भाजपा में विभिन्न स्तरों पर संगठन मंत्री का पद रहता है. इस पद पर हमेशा संघ के प्रचारक रहते हैं और इनके जरिए संघ भाजपा पर नियंत्रण बनाए रखता है. आरएसएस में भी एक वरिष्ठ पदाधिकारी भाजपा से जुड़े मसलों को देखता है.

श्रीमती सोनिया गांधी ने जो कुछ कहा उससे हम सहमत नहीं हैं. गुलाम तो केवल मजबूरी में मालिक की आज्ञा का पालन करते हैं, भाजपा का नेतृत्व न केवल आरएसएस की आज्ञाओं का पालन करता है बल्कि वो आरएसएस के एजेन्डे को अपना एजेन्डा मानता है, आरएसएस के लक्ष्यों की पूर्ति करना अपना पावन कर्तव्य समझता है और इस गुलामी में कुछ भी गलत नहीं देखता. जब भी भाजपा सत्ता में आती है तो वह राज्यतंत्र, सामाजिक संगठनों, शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में संघ की मानसिकता के व्यक्तियों की घुसपैठ कराने में कोई कसर बाकी नहीं रखती ताकि अपनी-अपनी जगहों से वे लोग आरएसएस के सपनों के भारत के निर्माण का काम करते रहें.

 

24.04.2009, 10.15 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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