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अनहद से डरता कौन है

मुद्दा

 

अनहद से डरता कौन है

शबनम हाशमी

 

 

बीस अप्रैल को अडवाणी जी के गाँधीनगर में अनहद, ऊर्जाघर और अमन समुदाय के 25 युवा कार्यकर्ताओं को घेर कर भाजपा के गुंडों ने खूब मारा-पीटा. लात-घूसे, थप्पड़-मुक्के, गालियाँ कुछ भी ऐसा नहीं था, जो उन नौजवानों को नही खाना पड़ा.

ये 25 नौजवान एक प्रधान मंत्री (बनने के इंतजार में... ) का आख़िर क्या बिगाड़ लेते ? क्या उस क्षेत्र के भाजपा के सदस्यों को इतना भी विश्वास नहीं था अपने अटल और मज़बूत नेता पर और उस अटल और मज़बूत नेता के 83 साल के अनुभव और काम पर कि उन्हें इन नौजवान बच्चों से इतना डर लग गया ?

पिछले सात साल में अनहद के कार्यकर्ताओं पर गुजरात में ही लगभग 20 हमले हो चुके हैं. भाजपा, विहिप और संघ परिवार के अन्य दल तो हमले करते ही हैं लेकिन कुछ अपने भी यही कहते सुने गये– इन पर ही हमला क्यों होता है? पहले बड़ी तादाद में फोन आते थे मगर अब अपनों के फोन आने भी बंद हो गये पूछने को कि ज़िंदा तो हो?

अगर ऐसा हमला मायावती, लालू या किसी वामपंथी नेता के क्षेत्र में हुआ होता तो यह सब टेलीविज़न चैनल्स की सुर्ख़ियों में होता. क़ानून व्यवस्था, गुंडागर्दी, अभिव्यक्ति की आज़ादी और बहुत सारे प्रश्न बार-बार सामने आ जाते. लेकिन 20 अप्रैल ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया कि मीडिया और खास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का ज़्यादातर भाग बहुत तेज़ी से एक ओर दौड़ रहा है. इसके साथ-साथ वह एक वर्ग, एक जाति, एक धर्म का पक्षधर भी होता जा रहा है.

गुजरात में जिन लोगों ने ज़मीन पर काम किया है, वो शायद मेरी बात को समझ सकते हैं. संघ परिवार का जो सारा करिश्मा है, वो इसमें है कि उसने जनता तक सच्चाई पहुँचने के सारे रास्ते बंद कर दिए हैं. यह काम एक दिन में नही हुआ बल्कि यह बरसों की मेहनत का कमाल है.

गुजरात का जानमानस राष्ट्रीय अख़बार नही पढ़ता, राष्ट्रीय खबरें नही देखता. स्थानीय बड़े अख़बारों पर पूरी तरह से एक ही सोच, एक ही विचार का क़ब्ज़ा है. यह क़ब्ज़ा दिमागी भी है और इसे कायम रखने के लिए लगातार धन की आरती भी उतरी जाती है. पिछले 20 वर्षों में एक पूरी पीढ़ी के सोचने की प्रक्रिया को ऐसी ज़ंजीरों में जकड़ा गया है कि वे निर्देशों पर काम करना तो जानते हैं लेकिन सोचना, सवाल करना नही जानते.

राष्ट्रीय परिवार कल्याण एवं स्वास्थ्य सर्वेक्षण-3 के अनुसार गुजरात में 42.4 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. गुजरात में 80.1 प्रतिशत बच्चों में खून की कमी है.


राजनीति से जुड़े ज़्यादातर लोगों के मस्तिष्क पर इस माहौल का गहरा प्रभाव है. ऐसी हालत में आम आदमी तक जरुरी सूचनाओं को पहुंचाने का एकमात्र तरीका होता है घर-घर जाना. और जब इस माहौल में ऐसे काम के लिए कोई सिरफिरा निकलता है तो संघ को उससे बड़ा ख़तरा कोई और नही दिखता.

संघ ने नफ़रत फैलाने के जो तरीके सोचे और निकाले, उससे टक्कर लेने के लिए एक सिरफिरों की फौज चाहिए. उसके लिए जुनून चाहिए, दुनिया बदलने का, रुके हुई पानी में पत्थर मारने का. लेकिन जो भी उस पानी में लहरें उत्पन्न करने की कोशिश करता है, चाहे वो कितनी ही छोटी क्यों ना हो; वह व्यक्ति या संस्था संघ का एक बड़ा दुश्मन घोषित कर दिया जाता है.

पिछले सात साल में यह प्रयास कई लोगों, संस्थाओं ने किए हैं. उनकी गिनती छोटी तो नही लेकिन बड़ी भी नही है. अनहद ने उसमें एक अहम भूमिका निभाई है. 650 गावों में जाकर ‘लोकतंत्र बचाओ अभियान’ के माध्यम से, युवा सम्मेलनों, गोष्ठियों, नुक्कड़ नाटक, जनसंपर्क, पर्चों के माध्यम से लगातार गुजरात की आम जनता के सामने सच्चाई रखने का प्रयास किया है. पिछले सात साल में पांच हजार से अधिक नौजवानों को प्रशिक्षण के माध्यम से कम-से कम प्रश्न पूछने के मुकाम तक पहुँचाया है.

गुजरात और देश की मीडिया का बड़ा हिस्सा पूंजीपतियों के साथ मिल कर कह रहा है कि गुजरात देश में नंबर वन है, करोड़ों रुपये के करार हो रहे हैं वाइब्रैंट गुजरात में. ठीक उसी समय अनहद के नौजवान साथी गली-गली अपने पर्चे बांट कर इसका सच सामने ला रहे हैं. नौजवान बता रहे हैं कि गुजरात में किसान लगातार आत्महत्या कर रहे हैं, राज्य पर 94,000 करोड़ रुपये का क़र्ज है, जो 2001-02 में 45,301 करोड़ था. अब तक राज्य में हीरा उद्योग के 4.13 लाख मज़दूरों की नौकरियाँ जा चुकी हैं.

अनहद के पर्चे घर-घर पहुंचने लगे कि राष्ट्रीय परिवार कल्याण एवं स्वास्थ्य सर्वेक्षण-3 के अनुसार गुजरात में 42.4 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं या गुजरात में 80.1 प्रतिशत बच्चों में खून की कमी है. जाहिर है, यह सब भाजपा के लिए बर्दाश्त करना नामुमकिन हो जाता है.

राज्य की ज्यादातर राजनीतिक और सामाजिक संस्थाएं प्रेस विज्ञप्ति या 2-3 हजार पर्चों के सहारे लोगों तक पहुंचती हैं लेकिन तमाम तरह की मुश्किलों, मारपीट के बाद भी अनहद के कार्यकर्ता घर-घर पहुंचते हैं. यही कारण है कि अनहद पर ही बार-बार हमला होता है.

पिछले साल राज्य के मुख्यनंत्री नरेंद्र मोदी के क्षेत्र में अनहद कार्यकर्ता 10 दिन में अपना प्रचार करते हुए 80,000 घरों तक पहुंचे. इस दौरान भी अनहद कार्यकर्ताओं पर हमले हुए, उन्हें गिरफ्तार किया गया.

बहुत सारे ‘दोस्तों’ ने मज़ाक भी उड़ाया-“क्या हरा दिया भाजपा को?”

सवाल यह नहीं है कि हमारे काम करने से भाजपा या कोई और पार्टी हार या जीत सकती है. सवाल केवल इतना भर है कि जिस नफ़रत और फरेब के बीज वर्षों पहले बोए गये और उसकी फसलें अब भी कटी जा रही हैं, उन कांटों के बीच क्या हमारे फूल खिलने शुरू होंगे ?

मैं मानती हूं, ज़रूर होंगे. आज अनहद के मंच पर पूजा पटेल, सचिन पांड्या, देव देसाई, मनोज शर्मा, मनीषा त्रिवेदी, जुनेद अंसारी और ईमानुएल जैसे सैकड़ों नौजवान कार्यकर्ता खुल कर काम कर रहे हैं, लोगों तक अपनी बात ले जा रहे हैं. इसका असर तो होगा ही. संभव है, इसमें वक्त लगे लेकिन ज़मीन पर किया हुआ कोई भी काम कभी जाया नहीं होता.

 

27.04.2009, 01.41 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Parshuram Tiwari (drptiwari@yahoo.co.in) Bhopal

 
 Most of the reactions mantioned by Shabnam in this articale are vary true, but I am not agreed with this coments -अडवाणी जी के गाँधीनगर में.This not correct. Any of the city/district area is not the personal property of any politician. We have to carefull in writing such type of thought.  
   
 

Dr.Lal Ratnakar (ratnakarlal@gmail.com) India

 
 हमारे समाज में अराजकता इस कदर बढ़ गयी है की पढ़े लिखे लोग इस कदर अराजक हो गए है की जीतनी अपराधिक हरकते हो सकती है वह कर रहे है,इसका उदहारण एम् .एम .एच .कालेज गाजियाबाद के शिक्षको के बीच जाकर देखना चाहिए,वहा एसे उदहारण साक्षात् मिल जायेगे ! वहां इतनी मोटी तनखाह के बाद भी प्रिंसिपल के निक्कम्मे पन पर एसे चुप रहते है जैसे प्रिंसिपल न होकर कोयी तानाशाह हो संयोग से यह उत्तर प्रदेश का कॉलेज है और इसके साथ हरिजन भी लगा है ! इसके साथ-साथ वही वह एक वर्ग, एक जाति, एक धर्म का पक्षधर भी होते जाना तो आम बात है यदि आप प्रतिभावन है तो आपका मूल्यांकन वो करेंगे जो सीढियाँ लगा कर यहाँ पहुचे है , उनकी रक्षा करने के लिए वह लोग आयेंगे जो आदर्श की बात करते थकते नहीं है !
यदि थोरे दिन यही सब चलता रहा तो गुजरात जैसे हल यहाँ भी होने है ! यहाँ जितने दिन पढाई नहीं होती उससे ज्यादा दिन तानाशाह की तारीफ में कटे जाते है और पढ़ने पढाने वाले को बर्खास्त करने कराने के हथकंडे अख्तियार किये जाते है ! यह सब आपके लेख के साथ लिखने से कुछ सजग लोग पढ़ सकेंगे और समझ सकेगे गुंडे अकेले गुजरात में ही नहीं पाए जाते है सब जगह है और वैसे ही !
 
   
 

Ravi New Delhi

 
 यहां भी शबनम जी वही रूढ़ बातें करती दिखीं. भाजपा के विरोध के अलावा इनके पास कोई मुद्दा नहीं है. देश को सिर्फ नेता की जरूरत नहीं है. हर उस जागरुक जनता की जरूरत भी है जो अपने कर्तव्य और अधिकार का पूरा उपयोग कर रही हो.
मेरी मानो तो शबनम नेता बनने का सपना छोड़कर लोगों को कर्तव्य और अधिकार के लिए जागरुक करो. लगता है तुम आडवाणी और भाजपा को बड़ा बनाना चाहती हो. तभी तो बराबर उसका विरोध करती दिखती हो.
खुदा के लिए इसे बंद करो
 
   
 

virendra jain (j_virendra@yahoo.com) bhopal

 
 मिरे जुनूं का नतीजा ज़रूर निकलेगा
इसी सियाह समुन्दर से नूर निकलेगा.
 
   
 

दीपक (deepakrajim@gmail.com) कुवैत

 
 कोई भी कोशिश कभी नाकाम हो सकती नही
मंजिले ना भी मिले तो फ़ासले घट जायेंगे !!

एक सराहनीय प्रयास है ॥
 
   

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