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सिक्खों पर जज़िया

मुद्दा

 

सिक्खों पर जज़िया

राम पुनियानी

 

पाकिस्तान इन दिनों गहरे संकट के दौर से गुजर रहा है. तालिबान ने स्वात घाटी सहित देश के कई हिस्सों को अपने कब्जे में ले लिया है. वे न केवल मुसलमानों पर अपने निहायत दकियानूसी और बेहूदा विचार लाद रहे हैं वरन् उन्होंने गैर-मुसलमानों पर जज़िया भी थोप दिया है. जज़िया अदा न करने वाले सिक्खों को प्रताड़ित किया जा रहा है. कुछ का अपहरण कर लिया गया है और कुछ का घरेलू सामान जब्त कर लिया गया है. तालिबान का कहना है कि जज़िया लगाने का उनका निर्णय इस्लामिक सिद्धान्तों के अनुरूप है.

जज़िया क्या इस्लामिक है और क्या आज के युग में यह प्रासंगिक है? कुरान में जज़िया का जिक्र है. यह वो कर था, जिसे जीते गए इलाकों के गैर-मुस्लिम रहवासियों पर लगाया जाता था. ध्यान देने की बात यह है कि मदीना-जहापैगंबर मोहम्मद लंबे समय तक रहे थे; में जज़िया नहीं था. जज़िया केवल जीते गए इलाकों में लगाया जाता था. चूंकि गैर-मुसलमानों के लिए सेना में काम करना अनिवार्य नहीं था और चूंकि वे मुसलमान शासक के संरक्षण में रहते थे, इसलिए गैर-मुसलमानों से यह अतिरिक्त कर वसूला जाता था.

जज़िया साल के अंत में अदा करना होता था और उसकी राशि मोल-भाव के आधार पर तय की जाती थी. केवल कमाने वालों पर जज़िया लगता था.

जिस तरह जज़िया केवल गैर-मुसलमानों पर लगाया जाता था उसी तरह एक ऐसा कर भी था जिसे केवल मुसलमान चुकाते थे. यह कर था ज़कात और कई मामलों में यह जज़िया से ज्यादा रहता था. ऐसे भी उदाहरण हैं जब मुस्लिम विजेताओं द्वारा लगाया गया जज़िया पुराने शासकों द्वारा वसूले जा रहे करों से काफी कम था. यह साफ है कि जज़िया कभी भी इस्लाम का अविभाज्य हिस्सा नहीं रहा. वो तो तत्कालीन परिस्थितियों के अनुरूप लगाया जाता था.

भारत में भी कई मुस्लिम शासकों ने अपनी गैर-मुस्लिम प्रजा पर जज़िया लगाया था परंतु उसका उद्धेश्य न तो गैर-मुसलमानों को सजा देना था और न ही उन पर मुसलमान बनने के लिए दबाव डालना था. सांप्रदायिक चश्मे से इतिहास को देखने वाले यह आरोप लगाते हैं कि औरंगजेब और कुछ दूसरे मुस्लिम शासकों ने हिन्दुओं को मुसलमान बनाने के लिए जज़िया लगाया था. इस आरोप में कोई दम नहीं है क्योंकि गैर-मुसलमानों को मुसलमान बनने से जहाँ जज़िया से मुक्ति मिलती वहीं ज़कात का बोझ उनके सिर पर लद जाता.

अलकायदा और उसके मुखिया ओसामा बिन लादेन को सीआईए ने हर तरह की मदद मुहैय्या की जिसमें भारी मात्रा में धन और हथियार शामिल थे.


तालिबान, दकियानूसी और प्रतिगामी सोच वाले लगभग पागल लोगों का समूह है. महिलाओं पर तालिबान जो अत्याचार कर रहे हैं वह निंदनीय और घृणास्पद हैं. सिक्खों पर जज़िया लगाना भी उनकी जंगली नीतियों का उदाहरण है. कुछ सालों पहले तालिबानियों ने अफगानिस्तान के बामियान में भगवान बुद्ध की मूर्तियों को जमींदोज किया था.

तालिबान, दरअसल धर्म के राजनैतिक इस्तेमाल से पैदा हुई कई बुराईयों में से एक है. कट्टरपंथी इस्लामिक धाराओं से प्रेरित तालिबान सबसे पहले सऊदी अरब और कुवैत जैसे तेल के धनी देशों में उभरे थे. इन देशों के शासक जहाँ एक ओर अमरीका के इशारे पर नाचते रहे हैं वहीं दूसरी ओर अपने देश की जनता को दबाए रखने और उसमें प्रजातंत्र की प्यास न जागने देने के लिए वहाबी और सलाफी जैसी इस्लाम की कट्टरपंथी धाराओं का इस्तेमाल करते रहे हैं.

इन देशों से इस्लाम के धर्मान्ध संस्करण का निर्यात अफगानिस्तान में हुआ जहाँ उस समय अमरीका किसी भी तरह सोवियत सेनाओं को देश के बाहर खदेड़ना चाहता था.

अमरीका चाहता था कि वो सोवियत सेनाओं से लड़ने के लिए अफगानी युवकों का इस्तेमाल करे. इसके लिए अमरीका ने इस्लाम की कट्टरपंथी धाराओं के ‘काफिर’ और ‘जिहाद’ जैसे शब्दों को तोड़-मरोड़ कर उनका जम कर इस्तेमाल किया. इन शब्दों के असली अर्थ के बजाय जोर इस बात पर दिया जाने लगा कि हर गैर-मुसलमान काफिर है और काफिरों को मारना ज़िहाद है. मुस्लिम युवकों के दिमागों में जहर भरने का पाठयक्रम वांशिगटमें तैयार हुआ और उसे पाकिस्तान में विशेष रूप से खोले गए मदरसों में लागू किया गया.

इन मदरसों से पढकर निकले छात्र ही अलकायदा के लड़ाके बने. अलकायदा और उसके मुखिया ओसामा बिन लादेन को सीआईए ने हर तरह की मदद मुहैय्या की जिसमें भारी मात्रा में धन और हथियार शामिल थे. इन्हीं हथियारों के सहारे अलकायदा ने सोवियत सेनाओं के दांत खट्टे कर दिए. सोवियत सेनाओं की वापिसी के बाद तालिबान, अफगानिस्तान में और शक्तिशाली होकर उभरे.

9/11 के पहले तक, अमरीका को तालिबान से कोई विशेष शिकायत नहीं थी. 9/11 के बाद अफगानिस्तान पर अमरीका ने हमला किया परंतु इससे भी तालिबान खत्म नहीं हो सके हैं. अमरीका द्वारा बोई गई यह जहरीली बेल आज भी हरी-भरी है और अब पाकिस्तान में भी फैल गई है.
तालिबान और अलकायदा की हरकतों से हमें इस्लाम का आंकलन नहीं करना चाहिए. कई शासकों ने अलग-अलग समय में अपनी धार्मिक पहचान का इस्तेमाल अपने साम्राज्यों के विस्तार के लिए किया है.

क्रूसेड्स, धर्मयुद्ध औजिहाद के नाम पर क्रूर लड़ाईयाँ लड़ी गई हैं. धर्म के नाम पर युद्ध करने और धर्म का राज्य के विस्तार के लिए उपयोग करने का फायदा मिला शासक और पुरोहित वर्ग को जबकि साधारण लोगों और सैनिकों ने नुकसान उठाया.

धर्म का जब भी राजनीति में इस्तेमाल हुआ है, उसके ऊपरी, दिखावटी पक्ष पर जोर दिया गया है न कि उसके नैतिक मूल्यों और मूल शिक्षाओं पर. तालिबान और अलकायदा इस तरह के अकेले संगठन नहीं हैं जो धर्म के नाम पर अपने से इतर धर्मों के लोगों पर अत्याचार करते हैं.

हम इस मुद्दे पर सिक्ख समुदाय के साथ हैं. तालिबान का सिक्खों पर जज़िया लगाने का निर्णय अनुचित, अन्यायपूर्ण और निंदनीय है. हमें भारत के उन मुस्लिम नेताओं को भी अपना समर्थन देना चाहिए जिन्होंने तालिबान के जुल्मों की खुलकर निंदा की है.

13.05.2009, 19.50 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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dinesh singh (dinesh.ujjwal@gmail.com) faizabad

 
 सभी तरह की कट्टरपंथी ताकतों के खिलाफ खुल कर बोलने का लमय है. लेख तार्किक सरल है. हिंदू मुस्लिम प्रश्न को काफी जटिल बना दिया गया है. इस तरह के लेखों की प्रासंगिकता बढ़ गई है. 
   

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