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भाजपा की पराजय समीक्षा रिपोर्ट

जनमत

 

भाजपा की पराजय समीक्षा रिपोर्ट

कनक तिवारी

 

लोकसभा के चुनाव परिणाम आ गए हैं. जैसी उम्मीद थी कांग्रेस और यूपीए जीत गए बल्कि 2004 के चुनाव से बहुत बेहतर स्थिति में हैं. भाजपा और राजग बुरी तरह हार गए हैं. चुनाव के बाद कांग्रेस को तो मंत्रिपरिषद गठित कर सरकार बनाने जैसा छोटा मोटा काम करना होगा लेकिन राजग और उससे ज्यादा भाजपा को अ-शोक रोड के दफ्तर में बैठकर शोक करते हुए चुनाव पराजय की समीक्षा करनी होगी. हर पराजित पार्टी के लिए यह एक राष्ट्रवादी और भविष्यमूलक कृत्य होता है. भाजपा वह पार्टी है जो खुद को राष्ट्रवादी कहती है और सुनहरे भविष्य में सदैव विश्वास करती है क्योंकि उसके पास गौरव करने लायक अतीत नहीं है और वर्तमान को भाजपा का गौरव बढ़ाने में कोई दिलचस्पी नहीं है. भाजपा यदि अपनी पराजय समीक्षा की रिपोर्ट को देशहित में (नहीं नहीं राष्ट्र हित में) श्वेत पत्र की तरह प्रकाशित करे तो वह एक नई परंपरा स्थापित कर सकेगी. खुद को जनता की पार्टी बताने वाली भाजपा यदि अपनी पराजय समीक्षा बैठक में दीवाने खास के बदले दीवाने आम में विर्मश करे तो जनता को भी उससे जुड़ने का अवसर मिलेगा क्योंकि भाजपा भारतीय तो है और पार्टी भी लेकिन इनके बीच से जनता खिसक जो गई है. इसलिए यह सार्वजनिक पराजय रिपोर्ट भाजपा को एक नागरिकमतदाता की ओर से श्रद्धांजलि के तोहफे के रूप में कुबूल करनी चाहिए.

देश की समझ के अनुसार भाजपा नीत राजग की पराजय के निम्नलिखित मुख्य कारण हैं:-

1. भाजपा की पराजय का मुख्य कारण उनके प्रधानमंत्री पद के हाई फाई उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी को व्यक्तिगत रूप में प्रोजेक्ट करना रहा है. अटल बिहारी वाजपेयी के मुकाबले आडवाणी में ऐसा कोई करिश्मा नहीं है जिसके कारण उन्हें देश का नेता बनाने की जबरिया कोशिश की जाती. अपनी युवावस्था से आडवाणी एक कट्टर हिन्दू महासभाई और आरएसएस क़े स्वयंसेवक रहे हैं. उनमें कभी भी राजनीतिक उदारता के लक्षण दिखाई नहीं दिए. वे हवाला कांड और बाबरी मस्जिद कांड के अभियुक्त भी रहे हैं भले ही भाजपा ने इस व्यक्तित्व पर नैतिक चरित्र का पलस्तर चढ़ाने की कोशिश की हो.

राजनाथ सिंह भाजपा के गंभीर अध्यक्ष नहीं हैं. वे कनिष्ठ पदाधिकारियों से तालमेल बिठाने के बदले उनको चुनौती देते हुए लड़ने की मुद्रा में ज्यादा दिखाई देते रहते हैं.


2. भाजपा का चुनाव अभियान नकारात्मक रहा है. उसे मनमोहन सिंह कमजोर प्रधानमंत्री, सोनिया गांधी विदेशी, राहुल गांधी अपरिपक्व और कांग्रेस पार्टी सवा सौ साल की बुढ़िया नजर आई. भाजपा के नेता और प्रचारक अपने भाषणों में अधिकांश वक्त कांग्रेस और नेहरू परिवार की बखिया उधेड़ने में लगे रहते थे और अपने घोषणा पत्र तक के बारे में एक वाक्य नहीं कहते थे. वे भूल गए कि एक सिख कभी कमजोर नहीं होता और सोनिया गांधी विदेशी नहीं पूरी तौर पर भारतीय हैं. यह भी कि देश के युवाओं का रुझान राहुल गांधी की तरफ है और कांग्रेस एक कद्दावर काठी की बूढ़ी पार्टी होने के बावजूद देश की जनता की प्रतिनिधि है.

3. भाजपा के नेताओं के भाषणों का तेवर पूरी तौर पर शालीन नहीं कहा जा सकता क्योंकि वे खिल्ली उड़ाने, कटाक्ष करने और चरित्र हत्या की बानगी से भरा होने के कारण आक्रामक रहे हैं. इस देश के मतदाता अब 1952 के चुनाव के मतदाता नहीं हैं. वे विश्व के स्तर पर शिक्षित, सुसंस्कृत और बौद्धिक होते जा रहे हैं. उनमें भाषा की तमीज है और वे तमीज की भाषा का आदर करते हैं. सोनिया, राहुल, प्रियंका, मनमोहन सिंह सहित कांग्रेस के अधिकांश शीर्ष प्रचारक अपने भाषणों में अपशब्दों का इस्तेमाल नहीं करते. कांग्रेस की शाइस्तगी उसके लिए वोट कबाड़ लाई-यह भाजपा को समझना होगा.

4. जब इंडिया शाइनिंग और फीलगुड जैसे नारे पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा के काम नहीं आए और 'मेरा भारत महान' जैसा नारा कांग्रेस के लिए भी 1989 के चुनाव में काम नहीं आया तब केवल शोशेबाजी का सहारा लेकर भाजपा ने विदेशी बैंकों में जमा भारतीय धन को वापस लाने की साजिशी चाल चली. वर्षों तक सत्ता में रहने के बावजूद जब भाजपा ने खुद यह धन वापस लाने की पहल नहीं की तो जनता ने भी उस पर विश्वास नहीं किया.

5. भाजपा की अंतर्कलह उसी तरह सामने आ गई जैसे वाल्मीकि रामायण में राम ने लक्ष्मण को 'रामस्य बर्हिआत्मा' कहा था. राजनाथ सिंह भाजपा के गंभीर अध्यक्ष नहीं हैं. वे कनिष्ठ पदाधिकारियों से तालमेल बिठाने के बदले उनको चुनौती देते हुए लड़ने की मुद्रा में ज्यादा दिखाई देते रहते हैं.

6. वर्षों पहले रेल के डिब्बे में जो पंखे लगे होते थे उनमें रेगुलेटर नहीं होता था. वे शुरू से ही फुल स्पीड में चलते थे. इसी तरह भाजपा के तथाकथित स्टार प्रचारक लालकृष्ण आडवाणी, नरेन्द्र मोदी, सुषमा स्वराज, रविशंकर प्रसाद, अरुण जेटली, मुरलीमनोहर जोशी, वेंकैया नायडू वगैरह इतनी जोर से बोलते हैं कि मतदाताओं को बहरापन होने का बोध होता है. इसके बरक्स दस-दस मिनट के छोटे भाषण देने वाले राहुल और प्रियंका गांधी, लिखे हुए भाषण को पढ़ने वाले डॉक्टर मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी लोगों को ज्यादा रुचिकर लगे क्योंकि लोग मुद्दों पर सुनना चाहते हैं. उन्हें किसी नेता की आवाज के सप्तम सुर से क्या लेना देना.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

satish pandey(haribhoomi) () raipur.cg

 
 आपकी समीक्षा बहुत हद तक ठीक है पर आपने कांग्रेस की ज्यादा ही स्तुती कर डाली है.कांग्रेस की जीत जनता के मन का गुबार है,सच्चाईयों के नज़दीक आपकी ये समीक्षा मुबारकबाद की हकदार है.  
   
 

sandeep (sandeep9935131246@gmail.com) allahabad. up

 
 आपकी समीक्षा बहुत हद तक ठीक है पर क्य़ा आपको नहीं लगता की आपने कांग्रेस की कुछ ज्यादा ही स्तुती कर डाली. कांग्रेस की जीत जनता के मन का गुबार हो सकती है पर वो कारण नहीं है जिन्हें आपने point wise लिखा है  
   
 

keshav murti singh () janjgir

 
 इस देश में सांप्रदायिकता की बुनियाद पर टिकी इमारत की उम्र लंबी नहीं होगी. 
   
 

ZULAIKHA JABEEN raipur chhattisgirh

 
 बेशक भारतीय जन बौद्धिक रूप से न तो बांझ है और न ही किसी राजनीतिक पार्टी का बंधवा मजदूर - मौजूदा राजनीतिक रिजल्ट इसी बात का सबूत है. मुल्क की so called अनपढ़ जनता ने एक बार फिर इस महान देश को fascist हाथों में जाने से रोका है.
सायादार डालों की ठंडी हवा में बतियाते leftist बुद्धिजीवी भी इस चमत्कारी नतीजों से सबक ले पाएं तो शायद कुछ काम बने. इसी बहाने संगठन, groups और व्यक्ति भी सराहना के हकदार हैं जिन्होंने अपने सीमित संसाधनों के बावजूद आमजन के साथ संवाद कायम रखा और भगवा रंग से ही नहीं - संघी जहानियत की पिटाई भी झेली मगर डटे रहे. सच्चाईयों के नज़दीक आपकी ये समीक्षा मुबारकबाद की हकदार है.
 
   
 

दीपक (deepakrajim@gmail.com) कुवैत

 
 इस चुनाव मे वरुण गांधी जैसो को सर पर बिठाने वाली भाजपा के लिये जनता ने अपने वोट से बस यही कहा कि....

हर एक लहु मिला है यहाँ की माटी मे
किसी के बाप का हिन्दोस्तान नही है ॥
 
   
 

vivek sanyal (vvksanyal@gmail.com) Mumbai

 
 क्या बीजेपी इस हार से सबक लेकर उन्माद की राजनीति छोडेगी और मुद्दों की राजनीति देश में फिर से बहाल हो पाएगी ? देश की जनता ने शायद यही सवाल सामने रखा है... 
   

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