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वोट से कितना बदलाव!

जनमत

 

वोट से कितना बदलाव!

प्रीतीश नंदी

 

आप जैसे ज्यादातर लोगों की तरह मैं भी आम चुनाव के इन नतीजों से खुश हूं. इस बार शासन चलाने के लिए स्पष्ट जनादेश मिला है. यह पिछली बार के खिचड़ी गठबंधन की तरह नहीं है, जहां हर कोई रार ठाने हुए था. डॉ. मनमोहन सिंह भाग्यशाली थे जो इस तीखी नोक-झोंक के बीच पांच वर्षो तक बचे रहे.

वे इस मायने में भी भाग्यशाली थे कि वैश्विक आर्थिक उछाल के दौर में चार वर्षो तक देश की आर्थिक विकास दर 8 फीसदी तक बनी रही और उन्हें इसके लिए ज्यादा कुछ नहीं करना पड़ा. गलती उनकी नहीं थी. लेफ्ट ने महत्वपूर्ण सुधारों को थामे रखा. ऐसे कई और भी काम थे, जो वे कर सकते थे, लेकिन उन्होंने नहीं किए. सलन वे भ्रष्ट मंत्रियों को हटा सकते थे, लेकिन वे इससे बचते रहे. उन दिनों सब कुछ आसान हुआ करता था, जब तक कि आर्थिक उछाल का गुब्बारा नहीं फूटा. इसके बाद हालात बिगड़ने लगे.

खैर, अच्छी खबर यह है कि यूपीए, या कहें कि कांग्रेस ने इस बार इतनी सीटें जीत ली हैं कि उसे अपने वादों पर खरा न उतरने के लिए अब कोई सफाई देने की जरूरत नहीं है. उससे हमारी उम्मीदें बढ़ गई हैं. जिस तरह राजीव गांधी के पदभार संभालते समय काफी उम्मीदें लगाई गई थीं, उसी तरह डॉ. सिंह पर भी जल्द नतीजे देने का भारी बोझ होगा. ऐसा सभी मोर्चो पर न हो, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों मसलन अर्थव्यवस्था को उबारने, खाद्य कीमतों को नीचे लाने, नौकरियां बचाने और आतंकवाद के खिलाफ लोगों में सुरक्षा की भावना पैदा करने जैसी अपेक्षाएं तो उनसे होंगी ही. यह उनकी जिम्मेदारी बनती है.

देश के मतदाता यूपीए को इसलिए वापस लाए क्योंकि इसे दोबारा न चुनने से अस्थिरता पैदा हो सकती थी. हमने दरअसल निरंतरता के लिए वोट दिया और उसे ही स्थिरता समझ लिया.



सौभाग्य से अब उनके पास कहीं ज्यादा युवा लोकसभा है, जिसमें 82 सांसदों की उम्र 40 वर्ष से कम है. इनमें से ज्यादातर कांग्रेसी हैं. वैसे यदि हम कैबिनेट मंत्रियों की पहली सूची पर नजर डालें तो हमें ज्यादातर पुराने चेहरे ही नजर आएंगे. यहां तक कि एजेंडा भी पहले जैसा ही है. जैसा कि किसी ने कहा, यह पुरानी एंबेसडर कार की तरह है जो अपना बंपर बदलकर नई दिखने की कोशिश कर रही है. डॉ. सिंह स्पष्ट तौर पर यह जता रहे हैं कि पिछली बार उनके पास बेहतरीन टीम थी, जिसे काम नहीं करने दिया गया. लिहाजा उन्हें दूसरा मौका देना चाहिए.

ठीक है, उन्हें दूसरा मौका मिल गया. बेशक यह सिर्फ युवा सांसद ही नहीं हैं, जिनकी संख्या दोगुनी हो गई है. लोकसभा में करोड़पति भी दोगुने हो गए हैं. यह कोई ज्यादा आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि इन दिनों राजनीति में आदर्श रसातल में चले गए हैं और राजनीति पैसा बनाने का जरिया बन गई है. चुनाव के दौरान उम्मीदवारों द्वारा व्यापक पैमाने पर जो खर्चा किया गया है, उन्हें अपने उपकारियों को इसका बदला देना होगा. हम जानते हैं कि इसका आशय क्या है. कारोबारी समूहों पर और कृपा बरसाना. और ज्यादा भ्रष्टाचार. यही भारत को एक बेदाग छवि का प्रधानमंत्री होने के बावजूद दुनिया के भ्रष्ट देशों की सूची में रखता है.

वैसे एक अच्छी खबर यह है कि पहले की तुलना में इस बार ज्यादा महिला सांसद हैं. इससे पता चलता है कि हम लैंगिक पूर्वाग्रहों से लड़ते हुए उनके लिए अवसरों के नए द्वार खोल रहे हैं, जो पारंपरिक राजनीतिक वर्ग में नहीं आते. एक और अच्छी खबर यह है कि जाति, धर्म और क्षेत्र से जुड़े मसलों की इन चुनावों में ज्यादा भूमिका नहीं रही है. इसमें भारत ही मुख्य मुद्दा था. जनता ने बदलाव की राष्ट्रीय रूप-रेखा के लिए वोट दिया.

इस चुनाव में ऐसे विवादास्पद मसलों को किनारे कर दिया गया, जो दशकों से हमारी राजनीति को सता रहे थे. क्या इसका यह मतलब है कि हम वीपी सिंह की विरासत को चुपचाप दफन कर सकते हैं या मायावती की राजनीति से छुटकार पा सकते हैं? क्या इसका यह मतलब है कि नरेंद्र मोदी अब भारतीय जनता पार्टी (और कारोबारी समुदाय) की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं हैं? क्या इसका यह मतलब है कि हम लालू और मुलायम को खारिज कर सकते हैं? मैं इतना निश्चिंत नहीं हूं.

कोई भी भयावहता इतनी आसानी से पीछा नहीं छोड़ती, लेकिन हां, राष्ट्र के पुनर्निर्माण और आर्थिक पुनरुद्धार की खातिर समय के साथ-साथ सब कुछ पीछे छूट जाएगा. अगले दरवाजे पर तालिबान हो सकते हैं. लिट्टे चुपके से सेंध लगाने की कोशिश कर सकता है. नेपाल के माओवादी और बांग्लादेश के हूजी गंभीर चिंता का विषय हैं. लेकिन पहले वही काम करना होगा, जो सबसे जरूरी है. अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर लाना होगा. हालांकि हर किसी को इस बात पर यकीन नहीं है कि डॉ. सिंह इसे १क्क् दिनों में कर सकते हैं, जैसा उन्होंने चुनाव के दौरान वादा किया था.

वैसे इसके दूसरे पहलू को देखें तो बुरी खबर यह है कि अब हमारे यहां आपराधिक रिकॉर्ड वाले ज्यादा सांसद हैं. इसके अलावा कई सांसदों की घोषित संपत्ति उनके आय के ज्ञात स्रोतों से कहीं अधिक है, जिससे कर व्यवस्था से जुड़े लोग भी आश्चर्यचकित हैं. वास्तव में ऐसी जबरदस्त संपत्ति घोषित करने वाले कई सांसद (और सांसद बनने के आकांक्षी) करदाताओं की सूची से गायब हैं. यह साफ है कि राजनीति एक बेहद कमाऊ जरिया है.

हमारे पिछले समूह के सांसदों की सकल संपत्ति में हुई बढ़ोतरी से यह बात साबित होती है. कोई आश्चर्य नहीं कि इनमें से कई लोग अपनी पत्नी, बेटों और बेटियों को इस बार इस समर में ले आएं. अब यहां भाई-भतीजावाद कोई गंदा शब्द नहीं है.

मैं यहां क्या छोड़ रहा हूं? राहुल गांधी को? स्पष्ट तौर पर कहूं तो इस युवा पर यूपीए के वादों को पूरा करने की भारी जिम्मेदारी डालना ठीक नहीं होगा. उनका ताजगी भरा चेहरा मतदाताओं को तो लुभा सकता है, लेकिन आप उन पर भारी उम्मीदों का बोझा लादकर उनकी वास्तविक क्षमता यानी सजग प्रहरी की भूमिका को खत्म कर देंगे. यदि वे यह भूमिका बेहतर ढंग से निभाते हैं तो इससे कांग्रेस की राजनीति में भारी बदलाव आ सकता है.

हमें इस बात को स्वीकार करना होगा कि हमने बड़ी-बड़ी बातें करने के बावजूद वास्तव में बदलाव के लिए वोट नहीं दिया है. हमने दरअसल निरंतरता के लिए वोट दिया है. हमने गलती से निरंतरता को स्थिरता समझ लिया है. हालांकि यह निरंतरता स्थिरता के लिहाज से कारगर हो सकती है, लेकिन यूपीए बहुत बड़ी गलती करेगा यदि वह यह समझता है कि मतदाताओं ने उसे दोबारा इसलिए चुना क्योंकि उसने पिछली बार अच्छा काम किया था.

देश के मतदाता यूपीए को इसलिए वापस लाए क्योंकि इसे दोबारा न चुनने से अस्थिरता पैदा हो सकती थी. भारतीय अर्थव्यवस्था अस्थिरता को और ज्यादा देर तक वहन नहीं कर सकती. हमें इस उलझन से बाहर निकलना होगा. इनकार कोई समाधान नहीं है.

 

26.05.2009, 16.15 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

kisan (kisanman@rediffmail.com) jaipur

 
 लेख बहुत ही अच्छा है. किसानों के बारे में भी सोचना चाहिए. उत्पादनकर्ता उपभोक्ता को न्याय मिलना चाहिए 
   

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