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उदार शिवाजी के क्षुद्र प्रशंसक

विचार

 

उदार शिवाजी के क्षुद्र प्रशंसक

राम पुनियानी

कुछ समय पहले, महाराष्ट्र सरकार ने शिवाजी की एक बड़ी मूर्ति मुंबई के पास अरब सागर में लगाने का निर्णय लिया था. इस परियोजना पर 300 करोड़ रूपये का खर्च अनुमानित था. जिस समय यह निर्णय लिया गया था, उस समय इस पर व्यापक बहस हुई थी. मुद्दा यह था कि क्या करदाताओं का 300 करोड़ रूपया इस तरह की परियोजना पर खर्च करना उचित है?

सरकार ने अपना निर्णय नहीं बदला और अब इस विवादास्पद मुद्दे ने जातीय कलह का रूप ले लिया है. सरकार ने बाबासाहब पुरंदरे नाम के एक ब्राहम्ण को इस परियोजना पर अमल करने वाली समिति का अध्यक्ष नियुक्त करने का निर्णय लिया है. बाबासाहब पुरंदरे, शिवाजी पर केन्द्रित एक नाटक, जिसका देश भर में मंचन किया जाता रहा है, के लेखक हैं.

 

मराठा महासंघ के प्रमुख पुरूषोत्तम खेड़ेकर ने एक ब्राहम्ण को मराठा योद्धा की मूर्ति लगाने की परियोजना का मुखिया बनाने का कड़ा विरोध किया. श्री खेड़ेकर का कहना था कि अगर उनके फतवे का पालन नहीं हुआ तो वे हिंसा भी कर सकते हैं. राज ठाकरे, जो हिंसक मनोवृत्ति वाले एक अन्य राजनैतिक दल के नेता हैं, भी इस विवाद में कूद पड़े. उन्होंने धमकी दी कि अगर पुरंदरे को समिति के अध्यक्ष पद से हटाया गया तो अच्छा नहीं होगा.


खेड़ेकर और राज ठाकरे की यह संकीर्ण राजनीति निंदनीय है. पूरे मुद्दे को जातिवादी रंग दिया जाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है. परंतु फिर भी, बाबासाहब पुरंदरे को इस समिति में नहीं रहना चाहिए. इसका कारण यह नहीं है कि श्री पुरंदरे जाति से ब्राहम्ण हैं बल्कि यह है कि उन्होंने शिवाजी का घोर साम्प्रदायिक चित्रण किया है. उन्होंने शिवाजी के व्यक्तित्व और जीवन का ठीक वही चित्रण किया है जो अंग्रेज इतिहासकारों ने बांटो और राज करो की ब्रिटिश नीति के अनुपालन में किया था.

आज घोर जातिवादी और साम्प्रदायिक ताकतें शिवाजी के नाम का इस्तेमाल अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने के लिए कर रही हैं. जबकि शिवाजी को न तो मुसलमानों से घृणा थी और न ही इस्लाम से

 

महाराष्ट्र में शिवाजी की कई छवियां हैं. पुरंदरे के शिवाजी मुस्लिम-विरोधी शिवाजी हैं. उनके नाटक ''जाणता राजा'' (राजा, जो सब जानता है) के शिवाजी ब्राहम्णों और गायों के पुजारी हैं. पुरंदरे के नाटक का संदेश यह है कि शिवाजी हिन्दू राष्ट्र का निर्माण करना चाहते थे. यह न केवल इतिहास को झुठलाना है बल्कि इसके पीछे समाज को बांटने की साजिश भी है.

शिवाजी जनता में इसलिए लोकप्रिय नहीं थे क्योंकि वे मुस्लिम-विरोधी थे या वे ब्राहम्णों और गायों की पूजा करते थे. वे जनता के प्रिय इसलिए थे क्योंकि उन्होंने किसानों पर लगान और अन्य करों का भार कम किया था. शिवाजी के प्रशासनिक तंत्र का मानवीय चेहरा था और वह धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करता था. सैनिक और प्रशासनिक पदों पर भर्ती में धर्म को शिवाजी कोई महत्व नहीं देते थे. उनकी सेना के एक तिहाई सैनिक मुसलमान थे.

 

शिवाजी की जल सेना का प्रमुख सिद्दी संबल नाम का मुसलमान था और उसमें बड़ी संख्या में मुस्लिम सिद्दी थे. दिलचस्प बात यह है कि शिवाजी की सेना से भिड़ने वाली औरंगजेब की सेना का नेतृत्व मिर्जा राजा जयसिंह के हाथ में था, जो कि राजपूत था. जब शिवाजी आगरा के किले में नज़रबंद थे तब कैद से निकल भागने में जिन दो व्यक्तियों ने उनकी मदद की थी उनमें से एक मुसलमान था, जिसका नाम मदारी मेहतर था. उनके गुप्तचर मामलों के सचिव मौलाना हैदर अली थे और उनके तोपखाने की कमान इब्राहिम गर्दी के हाथ में थी.

शिवाजी सभी धर्मों का सम्मान करते थे. उन्होंने फादर अंब्रोस और हजरत बाबा याकूत थोरवाले को जीवनपर्यन्त पेंशन दिए जाने का आदेश दिया था. अपनी राजधानी रायगढ़ में उन्होंने अपने महल के ठीक सामने एक मस्जिद का निर्माण करवाया था जिससे उनके अमले के मुस्लिम सदस्य नमाज़ अदा कर सकें. ठीक इसी तरह उन्होंने महल के दूसरी ओर स्वयं की नियमित उपासना के लिए जगदीश्वर मंदिर बनवाया था.

अपने सैनिक अभियानों के दौरान शिवाजी का सैनिक कमांडरों को यह स्पष्ट निर्देश रहता था कि मुसलमान महिलाओं और बच्चों के साथ कोई दुर्व्यवहार नहीं किया जाए. मस्जिदों और दरगाहों को सुरक्षा दी जाए और यदि कुरान की प्रति किसी सैनिक को मिल जाए तो उसे सम्मान के साथ किसी मुसलमान को सौंप दिया जाए.

एक विजित राज्य के मुस्लिम राजा की बहू को जब उनके सैनिक लूट के सामान के साथ ले आए तो शिवाजी ने उस महिला से माफी मांगी और अपने सैनिकों की सुरक्षा में उसे उसके महल तक वापस पहुंचवाया. शिवाजी को न तो मुसलमानों से घृणा थी और न ही इस्लाम से. उनका एकमात्र उद्धेश्य बड़े से बड़े क्षेत्र पर अपना राज कायम करना था और हर बुद्धिमान शासक की तरह वे यह जानते थे कि सभी धर्मों के मानने वालों के साथ एक सा व्यवहार न करने वाला राजा न तो बहुत बड़ा बन सकता है और न ही बहुत लंबे समय तक राज कर सकता है. शिवाजी को मुस्लिम-विरोधी या इस्लाम-विरोधी बताना इतिहास का मखौल बनाना है.

आज घोर जातिवादी और साम्प्रदायिक ताकतें शिवाजी के नाम का इस्तेमाल अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने के लिए कर रही हैं. कुछ समय पूर्व मानवाधिकार कार्यकर्ता सुश्री तीस्ता सीतलवाड़ ने स्कूली शिक्षकों के लिए इतिहास की एक छोटी सी पुस्तक तैयार की थी. इस पुस्तक में बताया गया था कि चूंकि शिवाजी शूद्र थे इसलिए महाराष्ट्र के ब्राहम्ण उनका राजतिलक करने के लिए तैयार नहीं थे. मजबूरन काशी से गागा भट्ट नामक ब्राहम्ण को उनका राजतिलक करने के लिए बुलाया गया था. गागा भट्ट ने भी अपने बाएं पैर के अंगूठे से शिवाजी का तिलक किया क्योंकि वह अपने हाथ से एक शूद्र को तिलक नहीं लगा चाहता था.

 

शिवसेना ने इस पुस्तक का इस आधार पर विरोध किया था कि उसमें शिवाजी को शूद्र बताया गया था. सच यह है कि शिवाजी शूद्र थे और पैर के अंगूठे से उनका तिलक किए जाने की घटना सही है. इसी तरह खेड़ेकर और उनके साथियों ने पुणे के भंडारकर इंस्टीट्यूट पर हल्ला बोला था क्योंकि इस्टीट्यूट ने जेम्ल लेन को शिवाजी पर उनकी पु्स्तक लिखने के लिए सामग्री उपलब्ध कराई थी. इस पुस्तक में शिवाजी के कथित असली पिता के बारे में अफवाहों का जिक्र किया गया था.

हमें आशा है कि सरकार सार्वजनिक धन को मूर्तियां लगाने से बेहतर किसी काम में खर्च करेगी. अरब सागर में मूर्ति लगाने से पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए. अगर इसका कोई प्रतिकूल पर्यावरणीय प्रभाव नहीं पड़ने वाला हो तो मूर्ति लगाई जा सकती है परंतु इसके लिए पैसा जनता से चंदे के रूप में आना चाहिए न कि सरकारी खजाने से.

 

05.06.2009, 12.15 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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harinath (harinath_r@in.com) Raipur

 
 सच है इस तरह का प्रयास छत्तीसगढ़ सरकार का भी रहा है सतनामी समाज को खुश करने के लिए कुतुबमीनार से भी ऊँचा जैतखंभ बनाने की, इस सोच पर तरस आता है. नेता अपना वोट बैंक पक्का करने की जगह कोई उसी बजट में सोसाइटी के भले के लिए स्कूल कॉलेज या अस्पताल का निर्माण करवाए ताकि समाज का भला हो.
 
   

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