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दुनिया जिधर जा रही है

विचार

 

दुनिया जिधर जा रही है

प्रीतीश नंदी

 

मैं शीतयुद्ध के उस दौर में बड़ा हुआ, जब दुनिया दो भागों में बंटी हुई थी. एक ओर था अमेरिका नीत मुक्त जगत जो लोकतंत्र, निजी उद्यम, सांस्कृतिक आजादी और पश्चिमी राजनीतिक प्रभुत्व का प्रतीक था. दूसरी ओर सोवियत संघ और इसके पूर्वी यूरोपीय सहयोगी थे, जो साम्यवादियों, समाजवादियों और स्वतंत्र सोच रखने वाले तीसरी दुनिया के देशों के कठोर और दमनकारी जगत का प्रतिनिधित्व करते थे.

इस जगत के देशों को लगता था कि अमेरिकी साम्राज्यवाद वैश्विक आधिपत्य स्थापित करने की कोशिशों में लगा हुआ है. भारत जैसा कि हम सब जानते हैं, इस दूसरे समूह में था. हालांकि वह गुटनिरपेक्ष होने का दावा करता रहा. इसका कारण बहुत सीधा था. हमारे प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को उस समय चल रहे समाजवाद पर बहुत भरोसा था और उन्हें लगता था कि भारत इसी के जरिए दुनिया में अपनी साख स्थापित कर सकता है.

हालांकि इसी ने हमें तकरीबन आधी सदी तक आर्थिक गुलामी की जंजीरों में जकड़े रखा, जिसमें सिर्फ सरकार और इसके धूर्तो की टोली के प्रभुत्व व संपत्ति में बढ़ोतरी हुई, जबकि आप और हम जैसे बाकी सब लोग समाजवाद की दोहरी बातों के साए तले सड़ते रहे.

हम आज संयुक्त दुनिया में रह रहे हैं और यह संभव नहीं कि इसका आधा हिस्सा नीचे लुढ़कता रहे और दूसरा भाग फले-फूले. वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं के भविष्य अटल रूप से एक-दूसरे से जुड़े हैं


हालांकि यह एक और कांग्रेसी नरसिंह राव ही थे, जिन्होंने आखिरकार इस सबको बदल दिया. राव को बहुत अच्छा प्रधानमंत्री नहीं कहा जा सकता, लेकिन उनके पद भार संभालते समय हमारी अर्थव्यवस्था इस कदर बदहाल थी कि उनके समक्ष दशकों से चली आ रही वैचारिक गुलामी को झटकने और उदारीकरण की प्रक्रिया को आरंभ करने के अलावा और कोई चारा नहीं था. ऐसी प्रक्रिया जिसे आगे ले जाने के लिए आज हमारे प्रधानमंत्री संघर्ष कर रहे हैं.


वे अपने पहले कार्यकाल के दौरान इसे कहीं आगे तक ले जा सकते थे, लेकिन लेफ्ट के अड़ंगों की वजह से ऐसा नहीं कर पाए. लेकिन मजेदार बात यह है कि हम अपने कुछ अति महत्वपूर्ण आर्थिक सुधारों को थामने के लिए भले ही लेफ्ट को कितना भी कोसें, लेकिन वास्तव में यह हमारी खुशकिस्मती रही कि उसने ऐसा किया.

कुछ महीने पहले जब अमेरिकी पूंजीवाद से ताकत हासिल करने वाली तथाकथित मुक्त जगत की अर्थव्यवस्थाएं ढह गईं तो इसके साथ-साथ समूची वैश्विक अर्थव्यवस्था भी नीचे आ गई, जिसमें रूस के साथ साथ पूर्ववर्ती सोवियत ब्लॉक के बाकी देश भी शामिल थे, जिन्होंने अपने पुराने मार्क्‍सवादी सिद्धांतों को झटकते हुए खुले समाज के बजाय ज्यादा खुली अर्थव्यवस्था को चुना.

इस दौर में भी चीन और भारत जैसे देश इस संकट से किसी तरह बचे रहे. इसकी वजह सिर्फ यही है कि वे वैश्विक अर्थव्यवस्था से इस कदर मजबूती से नहीं जुड़े थे. अब यदि आप गौर से देखें कि दुनिया कहां जा रही है तो आप नई द्विध्रुवीयता को उभरता हुआ पाएंगे. जहां अमेरिकी अर्थव्यवस्था पिछली तिमाही में 6 फीसदी से ज्यादा, यूरोप की 10 फीसदी और जापान की भयावह ढंग से 15 फीसदी तक संकुचित हो गई है. चीन की अर्थव्यवस्था इस वर्ष 7 से 8 फीसदी और भारत की अर्थव्यवस्था 6 फीसदी की दर से बढ़ने के लिए तैयार है. यहां तक कि इंडोनेशिया की अर्थव्यवस्था भी 4 फीसदी की दर से बढ़ सकती है.

मौजूदा हालात में भले ही हर कोई थोड़े समय के लिए चिंतित हो, लेकिन दीर्घकाल में हम नई, उभरती विश्व व्यवस्था देखने जा रहे हैं, जहां कुछ खास एशियाई देश, जिनके घरेलू बाजार अपने विकास को जारी रखने में सक्षम हैं, वैश्विक अर्थव्यवस्था के चालक के रूप में उभर सकते हैं. इसलिए अमेरिकी, यूरोपीय और जापानी निवेशक जो अब तक इन तथाकथित उभरती अर्थव्यवस्थाओं में अपने पोर्टफोलियो का छोटा सा हिस्सा निवेश कर रहे थे, वे अपने वैश्विक जोखिम में संतुलन कायम करने के लिए ठीक इसका उलट भी कर सकते हैं.

वे अपना ज्यादातर धन भारत और चीन में निवेश कर सकते हैं, जहां वे बेहतर, कहीं ज्यादा सुरक्षित और ज्यादा स्थायी प्रतिफल पाने की उम्मीद कर सकते हैं. भारतीय बैंकों ने भी अमेरिका के जोखिमपूर्ण बैंकों के मुकाबले खुद को ज्यादा स्थिर और भरोसेमंद साबित कर दिया है.

इसमें कोई संदेह नहीं कि हम आज एक संयुक्त दुनिया में रह रहे हैं और अब यह संभव नहीं है कि इसका आधा हिस्सा नीचे लुढ़कता रहे और दूसरा भाग फलता-फूलता रहे. इस वजह से हमें आनंद मनाना छोड़ इस बात को महसूस करना होगा कि भारत और चीन जैसे देश पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं या जापान की कीमत पर जश्न नहीं मना सकते. हमारे भविष्य अटल रूप से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं.

लेकिन हां, अब हम कोई नाकाबिल या असफल नहीं हैं. अब हम हर तरह के विकास, हर तरह की उन्नति के साझेदार हैं और यदि हम अपनी लालसा और तड़क-भड़क को काबू में रख पाएं तो संभवत: आने वाले कल की दुनिया के लीडरों में शुमार हो सकते हैं. इसका मतलब होगा, अपने अति उपभोग में कटौती करना. यह ऐसी प्रवृत्ति है, जो अमेरिका में चलन में है.

इसके अलावा हमें पर्यावरण की खास चिंता करनी होगी, अति-संपन्न और अति-गरीब लोगों के बीच की खाई को कम करना होगा, जिसकी वजह से हिंसा, आतंकवाद और सामाजिक अशांति जैसे विकारों को बढ़ावा मिलता है. इसका मतलब हमें जाति, क्षेत्र और क्षेत्रीय राजनीति जैसे मसलों को भी निपटाना होगा. ऐसा सिर्फ प्रतीकात्मक उपायों से ही नहीं होगा, वरन इसके लिए सहज रूप से सर्वसम्मति विकसित करनी होगी. इसका मतलब है राजनीति में आक्रामकता के बजाय सामाजिक और आर्थिक विकास में आक्रामकता लाई जाए.

नहीं, इसका मतलब खराब नीतियों पर धन लुटाना नहीं है. बदलाव और विकास के नाम पर आप हमेशा राजकोषीय घाटे को नहीं बढ़ा सकते. न ही जबर्दस्ती थोपे गए करों से ऐसा होगा, जो उद्यमिता को हतोत्साहित करते हैं. हमें कोई आरक्षी व्यवस्था नहीं चाहिए. हमें ऐसी व्यवस्था चाहिए, जो अमीर और गरीब समेत अपने सभी लोगों का बराबरी से जिम्मा उठाए और उन्हें जीवन में आगे बढ़ने के लिए समान अवसर मुहैया कराए.

क्या हम ऐसा कर सकते हैं? या फिर हम अपने पिछले इतिहासों के साए में रहने, पुराने दुराग्रहों से लड़ने और अपने से पहले की पीढ़ियों की गलतियों को दुरुस्त करने की कोशिश ही करते रहेंगे? क्या यह कहीं ज्यादा आसान नहीं होगा कि हम स्पष्ट सोच के साथ एक नई शुरुआत करें और अपना भविष्य उस तरह से लिखें, जैसा हम चाहते हैं? आज की युवा पीढ़ी दुनिया की बेहतरीन चीजों से होड़ लेने के लिए तैयार है. हमें उस पर इतिहास या गलतियों का बोझ नहीं लादना चाहिए

11.06.2009, 18.15 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

DR.PUSHPENDRA PRATAP () BHOPAL

 
 लोग इतिहास लिखते हैं. आप भविष्य लिखने की बात कर रहे हैं. उत्तम, अति उत्तम. शुभकामनाएं. 
   

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