आध्यात्म बन सकता है शांति का वाहक
विचार
आध्यात्म बन सकता है शांति का वाहक
राम पुनियानी
ऐसा कहा जाता है कि आस्था में बहुत ताकत होती है. आस्था पहाड़ तक को अपनी जगह से
हिला सकती है. परंतु क्या आस्था समाज में शांति और न्याय की स्थापना का जरिया बन
सकती है ?
इस मुद्दे पर जून के दूसरे सप्ताह में मुंबई में एक उच्चस्तरीय संवाद का आयोजन किया
गया. इस संवाद में हिन्दू और ईसाई धर्मों के शीर्ष धर्माचार्य शामिल हुए. संवाद में
धर्माचार्यों के बीच इन मुद्दों पर सहमति बनी कि अल्पसंख्यकों के विरूद्ध हिंसा
नहीं होनी चाहिए, धर्म परिवर्तन बंद होना चाहिए और धार्मिक संगठनों को अपने
संसाधनों का उपयोग परोपकार के कार्यों में करना चाहिए.
पिछले कुछ दशकों में देश में धर्म के नाम पर हिंसा बढ़ी है. धार्मिक आस्था और
विश्वास का इस्तेमाल निहित स्वार्थी तत्व बड़ी कुटिलता से हिंसा और घृणा फैलाने के
लिए करते रहे हैं. इन निहित स्वार्थी तत्वों की राजनैतिक महत्वाकांक्षाएं भी कभी
छुपी नहीं रहीं. सत्ता में आने के लिए धर्म के दुरूपयोग से उन्होंने कभी गुरेज नहीं
किया.
इस पृष्ठभूमि में अंतरधार्मिक संवाद की उपयोगिता और आवश्यकता को नजरअंदाज करना
मुश्किल है. ऐसे संवाद के जरिए धर्मगुरू और धार्मिक नेता समाज में शांति बनाए रखने
में अपना सहयोग दे सकते हैं. हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अधिकांश मामलों में
धार्मिक नेता और धर्मगुरू, आस्था के दुरूपयोग के लिए जिम्मेदार नहीं रहे हैं. यह
काम अधिकांश मामलों में बाहरी लोग करते रहे हैं.
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सत्ता केन्द्रों से
जुड़कर अन्यायपूर्ण सामाजिक-आर्थिक
व्यवस्था को
बनाए रखने में सहायक बनने की बजाए धर्मगुरूओं को पीड़ित मानवता की भलाई
में अपनी उर्जा
खर्च करनी चाहिए |
पिछली लगभग चौथाई सदी में हमने देखा की किस तरह अमेरिका ने अपने राजनैतिक
लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए आस्था का दुरूपयोग किया. पहले उसने धर्म के नाम पर
आतंकी संगठन खड़े किए और बाद में उसी धर्म को कठघरे में खड़ा कर दिया और मनगढ़ंत आरोप
लगाकर अफगानिस्तान सहित दूसरे देशों पर हल्ला बोला.
अल्-कायदा और तालिबान ने जेहाद और काफिर जैसी धार्मिक अवधारणाओं का बेज़ा इस्तेमाल
अपनी कथित बदले की कार्यवाही को उचित ठहराने के लिए किया.
भारत में राम रथयात्रा के नाम पर यही कुछ हुआ. आस्था के इस रथ के कारण देश में खून
की होली खेली गई. सत्ता पाने की अपनी हवस में अंधी हो गई संकीर्ण ताकतों ने
रथयात्रा के सहारे छ:ह साल तक दिल्ली में राज किया. उनकी रथयात्रा से कितने
निर्दोषों का खून बहा, इसकी उन्हें न तो कभी परवाह थी और न है.
धार्मिक आस्था और विश्वास के दुरूपयोग का एक और उदाहरण है हिन्दू संगठनों की
आदिवासी इलाकों में घुसपैठ. कई स्वामी और गुरू आदिवासी इलाकों में प्रगट हो गए और
स्वयं को हिन्दू धर्म का रक्षक और आदिवासियों की भलाई के लिए काम कर रही ईसाई
मिशनरियों को हिन्दू धर्म का दुश्मन करार देने लगे. नफरत के इन सौदागरों के फैलाए
जहर के चलते कुष्ठ रोगियों के बीच काम करने वाले एक पॉस्टर को अपने दो मासूम बच्चों
के साथ जिन्दा जला दिया गया. गुजरात के डांग से लेकर उड़ीसा के कंधमाल तक पूरी
आदिवासी पट्टी में हिंसा फैल गई.
धर्मगुरूओं द्वारा शांति की स्थापना के प्रयास सराहनीय और प्रशंसनीय हैं. समाज का
एक बड़ा हिस्सा उन्हें अपने पथ-प्रर्दशक के रूप में देखता है.
हमारे नए विश्व में धार्मिक नेताओं और धर्म की भूमिका बदल गई है. सामंतवादी युग में
धर्मगुरू, राजाओं से जुड़े रहते थे और धर्म का इस्तेमाल महिलाओं, किसानों और कमजोर
वर्गों के शोषण को सही ठहराने के लिए करते थे. प्रजातंत्र में धर्मगुरूओं की भूमिका
एकदम अलग है. सत्ता केन्द्रों से जुड़कर अन्यायपूर्ण सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था को
बनाए रखने में सहायक बनने की बजाए धर्मगुरूओं को पीड़ित मानवता की भलाई में अपनी
उर्जा खर्च करनी चाहिए.
इस सिलसिले में शंकराचार्यों और आर्कबिशपों का हालिया संवाद स्वागतयोग्य है. अगर
धर्मगुरू स्वयं जनता से सीधा संवाद करेंगे तो धर्म के नाम पर हिंसा और घृणा फैलाने
वालों की दुकानें बंद हो जाएंगी. यह समाज में शांति की स्थापना की ओर एक बड़ा कदम
होगा.
बैठक में कार्डीनल ग्रेश्यिस ने कहा कि भारत एक आध्यात्मिक देश है. श्री सरस्वती का
कहना था कि भारत को आध्यात्मिक राज्य घोषित कर देना चाहिए. इस मांग से सहमत होना
कठिन है. आध्यात्म एक व्यक्तिगत मसला है. आध्यात्म के जरिए व्यक्ति अपने अस्तित्व
से जुड़ी जिज्ञासाओं का उत्तर ढूढ़ता है और दैवीय शक्तियों से स्वयं को जोड़ने का
प्रयास करता है. यह एक निजी प्रयास है और इस मामले में राज्य की कोई भूमिका नहीं
है. राज्य न तो आध्यात्मिक हो सकता है और न ही उसे आध्यात्मिक घोषित किया जाना
चाहिए. आध्यात्म का कोई रंग-रूप नही होता. वह अमूर्त है. वह जीने और सोचने-समझने का
एक तरीका है, अखिल विश्व के साथ स्वयं को जोड़ने का माध्यम है. आध्यात्म और धार्मिक
पहचान के बाहरी लक्ष्णों में अंतर है.
नागरिकों के आध्यात्मिक होने से उनका देश आध्यात्मिक नहीं हो जाता. आध्यात्म
व्यक्तिगत मसला रहता है जबकि राज्य अपने नागरिकों की दुनियावी आवश्यकताओं को पूरा
करता है. प्रजातांत्रिक समाज में आध्यात्म और धर्म, दोनो ही नागरिकों के पूरी तरह
निजी मसले हैं.
भारत को आध्यात्मिक देश बताना कोई नई बात नहीं है. हमारे अंग्रेज शासकों ने सबसे
पहले यह कहना शुरू किया था कि भारत मूलत: एक धार्मिक देश है और आध्यात्म उसकी आत्मा
है. इस मिथक को जन्म देने के पीछे ठोस कारण थे. अंग्रेज भारत पर कब्जा जमाना चाहते
थे. भारत को आध्यात्मिक और धार्मिक देश निरूपित करके वे यह संदेश देते थे कि
राजनैतिक-सामाजिक और अन्य दुनियावी मसले उनके क्षेत्राधिकार में हैं जबकि भारतीयों
को आध्यात्म में खोए रहना चाहिए. भारतीयों को आध्यात्मिक बताकर वे उन्हें सामाजिक,
आर्थिक और राजनैतिक मसलों से दूर रखना चाहते थे.
सच यह है कि भारत कभी पूरी तरह से आध्यात्मिक देश नहीं रहा. भारत के नागरिक सदियों
पहले विदेशों से व्यापार करते थे. भारतीय कला उच्च स्तरीय थी. खजुराहो के मंदिरों
से लेकर ताजमहल की भव्य इमारत तक इस बात का सुबूत है कि भारतीयों ने जीवन के भौतिक
पक्ष को उतना ही महत्व दिया जितना आध्यात्मिक पक्ष को.
विभिन्न धर्मों के नेताओं द्वारा एक दूसरे को समझने का प्रयास सराहनीय है. यह भी
प्रसन्नता का विषय है कि अपने धर्म को श्रेष्ठ और दूसरे के धर्म को नीचा मानने की
प्रवृत्ति ऐसे संवादों से कम होती है. हमें उम्मीद है कि धर्माचार्य स्वयं को और
अपने अनुयायियों को प्रजातांत्रिक व्यवस्था और सोच से जोड़ेंगे और बांटने की राजनीति
करने वालों या हमारे पूर्व विदेशी शासकों द्वारा गढ़े गए खोखले शब्दों और अवधारणाओं
से दूर रहेंगे.
18.06.2009, 15:32 (GMT +05:30) पर प्रकाशित