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बदहाल नरेगा के मजदूर

मुद्दा

 

बदहाल नरेगा के मजदूर

संदीप पांडे

 

2005 में जब पहले सूचना का अधिकार और फिर रोजगार गारंटी कानून लागू हुआ तो देश में एक नई लोकतांत्रिक चेतना की लहर पैदा हुई. ऐसा लगा मानो वर्षों से अपने मौलिक अधिकारों से वंचित आम जनता के लिए लोकतंत्र की व्यवस्था में एक खिड़की खुली गई है. जनता को इसका कुछ फायदा भी हुआ.

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम में प्रदत्त सोशल आडिट के अधिकार का इस्तेमाल कर लोगों ने अपनी-अपनी पंचायतों में कराए गए कार्यों का विवरण मांग कर सरकारी योजनाओं की प्रगति का भौतिक सत्यापन किया. सूचना मांगने व सोशल आडिट की प्रक्रिया से निश्चित रूप से लोगों का सशक्तीकरण हुआ है. जो जन प्रतिनिधि या सरकारी अधिकारी-कर्मचारी अनियमितताएं अथवा भ्रष्टाचार किया करते थे, वे भी सजग हो गए. उनके अंदर थोड़ा-सा डर समाया है कि अब जनता के प्रति जवाबदेह बनना होगा.

अभी लोग अपने मौलिक अधिकारों के प्रति जागरूक हो ही रहे थे कि जनप्रतिनिधियों और नौकरशाहों ने तय किया कि बहुत हो चुका. जनता को इतनी छूट की जरूरत नहीं. यदि उन्हें पूरे लोकतंत्र का दर्शन हो गया तो शासन-प्रशासन को कौन पूछेगा? अत: उन्होंने जनता को सताना शुरू कर दिया है.

पिछले कुछ समय में कई ऐसी घटनाएं हुईं जिनमें दलित मजदूरों द्वारा अपने मौलिक अधिकारों की मांग किए जाने पर ग्राम प्रधान, अन्य दबंग लोगों, पुलिस या विकास खंड कार्यालय के कर्मचारियों द्वारा मजदूरों की पिटाई की गई. जिन लोगों ने पिटाई की उन्हें राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था तथा उनके खिलाफ आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है.

इस संदर्भ में उत्तर प्रदेश के अनेक जिलों में घटीं घटनाओं का उदाहरण दिया जा सकता है.

कुशीनगर जिले के एक गांव में गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वालों के सर्वेक्षण में अनियमितताओं और इंदिरा आवास तथा महामाया आवास योजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार पर कुछ लोगों ने सवाल उठाया तो ग्राम प्रधान के इशारे पर उनकी पिटाई की गई.

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इसी प्रकार हरदोई जिले में मजदूरी की मांग करने वाले श्रमिकों पर पुलिस की मौजूदगी में लाठियां बरसाई गईं. ऐसा ही एक मामला जिला मऊ का है. वहां कई गांवों के मजदूरों ने जब छह माह पहले किए गए काम की मजदूरी मांगी तो खंड विकास अधिकारी ने अपने साथियों के साथ मिलकर उन्हें लाठियों से जमकर पीटा.

सीतापुर में तालाब की खुदाई कर रहे मजदूरों ने जब पास के एक हैंडपंप से पानी पीना चाहा तो उनके साथ अभ्रदता की गई. बाद में थाने पर पुलिसकर्मियों ने मजदूरों की जमकर धुनाई की.

इसी प्रकार वाराणसी जिले के तीन गांवों के करीब दो सौ मजदूरों को 39.80 रुपए प्रतिदिन की दिहाड़ी से भुगतान देना तय किया गया. जब मजदूरों ने नरेगा के तहत न्यूनतम निर्धारित सौ रुपए प्रतिदिन की मजदूरी की मांग की तो उन्हें टरका दिया गया. मजदूरों के विरोध प्रदर्शन पर उनकी पिटाई की गई. पिटाई के अगले दिन मजदूरों के खातों में 42 रुपए की दर से भुगतान जमा करा दिया गया.

ऐसा लगता है कि शासन-प्रशासन ने शायद यह तय किया है कि मजदूरों के अधिकारों की मांग का जवाब मारपीट से दिया जाएगा. इसका कारण यह है कि उसके अंदर सूचना के अधिकार या सोशल आडिट का डर खत्म हो गया है. जो सरकारी मशीनरी इन कानूनी अधिकारों का अनुपालन सुनिश्चित कर सकती थी उसी का दुरुपयोग कर राजनीतिक तबका जनता का उत्पीड़न कर रहा है.

भारत के विभिन्न राज्यों में कई प्रशासनिक अधिकारियों ने एक सीमित दायरे में ही सही, सृजनात्मक पहल करते हुए राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम का लाभ गरीब मजदूर परिवारों तक पहुंचाने की कोशिश भी की है. इनमें ऐसे प्रावधान किए गए हैं जिनसे मजदूरों को काम और पूरी मजदूरी मिल सके, लेकिन सत्ता पक्ष के छोटे-बड़े नेताओं के सामने प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों के हाथ बंधे हुए हैं.

शासक वर्ग शायद मजदूरों के सशक्तीकरण से परेशान भी है, क्योंकि मजदूरों के मौलिक अधिकारों के इस संघर्ष की तार्किक परिणति अंतत: समतामूलक समाज ही है. इस बात को समाज का प्रभावशाली वर्ग आसानी से पचा नहीं पा रहा है. इसलिए जहां एक ओर हिंसक घटनाओं से मजदूरों के मौलिक अधिकारों को हासिल करने के प्रयासों को झटका लग रहा है, वहीं इन तेज होते संघर्षों में भविष्य के खतरे भी छुपे हैं.

रोजगार गारंटी ने मजदूरों को संगठित होने का एक अवसर प्रदान किया है. उम्मीद की जानी चाहिए कि मजदूरों के अधिकारों की लड़ाई को लोकतांत्रिक व्यवस्था में अभिव्यक्ति मिलेगी और उनकी समस्याओं का हल निकलेगा. यह प्रक्रिया मजदूरों की इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में और व्यापक भागीदारी सुनिश्चित करेगी.

 

23.06.2009, 13.07 (GMT+05:30) पर प्रकाशि

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

A.S.APPOLO,anand.appolo@gmail.com () delhi uni. ;mass com;llb

 
 संदीप पांडे जी ने इतने सुजूर एरिया में जा के जो सुचना जमा की है वो तारीफ के काबिल है, आज समाज में सामंतवादी प्रवृत्ति वाले लोग सोषितों के विकास को पचानहीं पा रहे हैं ये संदीप जी ने साबित कर दिया. जरूरत है कि हम अपने चारों ओर बदलाव में सहयोग बने तो ग्रामीण भारत का विकास होगा. 
   
 

Himanshu Sinha Noida

 
 The CAG's interim Draft Performance Audit report of the first year of NREGS' implementation has recently been circulated to various state governments; while this has not yet been made public, its contents have come to be known through the media. The Audit's findings vindicate is testimony to the sheer lack of political will of the state governments of every hue towards the question of employment, wages and rights of the rural poor.

Now, the UPA Government is playing down the implications of the CAG report, by claiming that the NREGS is "already a big success, and will be a huge success", and passing the buck for implementation to the States rather than the Centre.

Meanwhile sections of the corporate media and have taken the CAG findings as an opportunity to trash the very concept of employment guarantee for the rural poor.

The CAG Report is a voice from the horse's own mouth, from the establishment itself, that even the most well-intentioned observer cannot but deny the rampant corruption, the irregularities, the widespread subversion of the Act; exceptions exist, no doubt, but the credit for the exceptions invariably goes to militant mass struggles of the rural poor. For the most part, the NREGS has remained an illusory showpiece for the UPA regime and the ruling classes; whatever implementation of the Act has taken place has been wrested from reluctant and apathetic governments.
 
   
 

sujeet kumar singh Pave

 
 राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना से खिलवाड़ और गांधी परिवार के साथ शरारत का एक मामला मध्य प्रदेश के इंदौर जिले से आया है। जांच के घेरे में आए जिले के बावलिया खुर्द गांव के नरेगा मस्टर रोल के मुताबिक सोनिया, राहुल और प्रियंका ने 20 से 26 अप्रैल 2009 तक नरेगा के तहत गांव में कराए गए विकास कार्यक्रम में मजदूरी की। तीनों को 91 रुपये रोजाना की दर से सप्ताह भर का 637 रुपये का भुगतान भी तय किया गया था।

मस्टर रोल में तीनों के नाम के आगे उपनाम नहीं लिखा गया है लेकिन पिता या पति के कालम में 'राजीव' नाम दर्ज है। जांच में नकली पाए गए इस मस्टर रोल में गांधी परिवार के अलावा पूर्व केंद्रीय मंत्री मणिशंकर अय्यर, कुछ स्थानीय नेताओं और जिले के आला सरकारी अफसरों के नाम भी दर्ज हैं। इस सिलसिले में कुछ फर्जी जाब कार्ड भी बनाए गए थे।
 
   
 

saumya chaurasia pendra road bilaspur

 
 There are lacuna in every system. So is in this one also. But we must note that the amount of attention nrega is getting itself shows the new beginning has started. 
   

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