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ब्लैकमेलिंग की दुनिया

बात पते की

 

ब्लैकमेलिंग की दुनिया

प्रीतीश नंदी



आप जहां कहीं भी नजर डालें, ब्लैकमेलिंग आज दुनिया की सबसे शक्तिशाली करेंसी है. राजनीति में, धर्म में, कारोबार में और यहां तक कि आतंकवाद के खिलाफ जंग में भी.

जब पाकिस्तान आतंकवाद से लड़ने के नाम पर अमरीका से 5 अरब डॉलर ऐंठता है और अपने परमाणु जखीरे को सुरक्षित हाथों में रखने की बात करता है तो वास्तव में उसके कहने का आशय क्या होता है? उसके कहने का आशय यही है कि हमें पैसा दो अन्यथा हमारा देश तालिबान के हाथों संचालित हो सकता है. और यह तालिबान भी कितने मजबूत हैं? तकरीबन 2500 भटके हुए लोग, जिन्हें सालों तक आईएसआई ने पाला-पोसा.

अनुमान लगाएं कि कहां से वे अपने समस्त हथियार हासिल करते हैं? बिलकुल सही. खुद पाकिस्तान से ही. फिर क्यों अमरीका इस ब्लैकमेल के आगे झुक जाता है? खैर, क्या आपको लगता है कि उसके पास कोई विकल्प है? वह कब तक अपने युवाओं को अफगानिस्तान में ऐसी लड़ाई लड़ने के लिए भेजता रहेगा, जो कहीं से उसकी प्राथमिकता में नहीं है? इसके बजाय वह पाकिस्तान को पैसा देकर इसे आउटसोर्स कर सकता है. हालांकि वह जानता है और जैसा कि हम सब भी जानते हैं कि इस धन का ज्यादातर हिस्सा निजी स्विस बैंक के खातों में जाएगा.

हम क्यों शांत हैं? क्या वास्तव में हमारे पास कोई विकल्प है? आज की दूसरी कई अर्थव्यवस्थाओं की तरह हमारी अर्थव्यवस्था भी एक लचीले वैश्विक ढांचे का हिस्सा है, जो स्थिरता, विकास, अमेरिकी डॉलर और अंतरराष्ट्रीय व्यापार से चलती है. अमरीका की तरह हम भी जानते हैं कि पाकिस्तान दुनिया की सबसे खतरनाक जगह है, लेकिन हमारी उसके साथ एक साझा सीमा है और हम उसके बिगड़ते हालात के बीच अपनी अर्थव्यवस्था के बचे रहने की उम्मीद नहीं कर सकते.

यदि अमरीका पाकिस्तान से अपना समर्थन खींच लेता है और वहां नागरिक सरकार गिर जाती है तो हमारे लिए भी प्रतिकूल हालात पैदा हो सकते हैं. इसलिए वे सब जो पाकिस्तान से नफरत करते हैं और हमसे उस पर धावा बोलने की उम्मीद करते हैं, वास्तव में उन्हें इस तथ्य को समझना चाहिए कि पाकिस्तान पर किसी तरह का हमला हमारे क्षेत्र और हमारी अर्थव्यवस्था के लिए आत्मघाती है.

इसलिए अमरीका की तरह हमारे पास वहां जारी आतंकवाद के खिलाफ जंग का समर्थन करने और इसकी सफलता की कामना करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. भले ही हम जानते हैं कि यह ज्यादातर एक अबूझ पहेली की तरह है.

लेकिन पाकिस्तान के बारे में क्यों शिकायत करें? हम अपनी राजनीति पर भी तो निगाह डालें. यह पूरी तरह ब्लैकमेल और तुष्टीकरण पर आधारित है. हर वोट बैंक इसके बारे में जानता है और इसका फायदा उठाता है. इसमें अमीर और गरीब बराबर के दोषी हैं. अमीर लोग चुनाव से पहले अपनी तमाम सौदेबाजियां करते हैं और पार्टियों और उम्मीदवारों को धन देने के बदले जो कुछ भी अपने हितों के मुताबिक पा सकते हैं, वह पा लेते हैं. गरीब भी ऐसा ही करते हैं.

आज हमारी मुख्यधारा की पार्टियां भी राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने का दिखावा करते हुए ऐसे बेतुके, विभाजनकारी कदमों का समर्थन करती हैं.


समूची झुग्गियां बिकाऊ हैं. इसी तरह सभी समूहों के लोग भी वोट के आश्वासन के बदले में अपने लिए खास मदद और विशेष फायदे चाहते हैं. आज वोट बैंकों की खुलेआम खरीद-फरोख्त होती है. इसे सामूहिक मोलभाव कहा जाता है. जो कभी ट्रेड यूनियनों ने बोनस के समय पर किया, वही अलग-अलग धर्म, जाति, क्षेत्र इत्यादि का प्रतिनिधित्व करने वाले राजनीतिक गुट चुनाव के समय करते हैं. वे भूल जाते हैं कि भारत एक राष्ट्र है और यदि किसी एक समूह को फायदा पहुंचाया जाता है तो वह किसी दूसरे समूह की कीमत पर ही होगा.

अपने जीवन को देखें तो हमारे साथ एक के बाद एक सौदेबाजी होती है. हर सौदे से किसी को फायदा होता है तो कहीं दूसरे को नुकसान होता है. देखें कि हम अपने संस्थानों के साथ किस कदर छेड़छाड़ करते हैं. हम मीडिया का किस तरह फायदा उठाते हैं. हम अपने देश को किस तरह बांट रहे हैं. क्या गोरखालैंड को काटकर अलग करने से भारत मजबूत होगा? क्या तेलंगाना के बंटने से भारत को फायदा होगा?

क्या झारखंड और उत्तरांचल के अलग होने से किसी की जिंदगी में सुधार हुआ? या फिर इससे कुछेक राजनीतिक अवसरवादियों की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को ही मदद मिली? यहां तक कि आज हमारी मुख्यधारा की पार्टियां भी राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने का दिखावा करते हुए ऐसे बेतुके, विभाजनकारी कदमों का समर्थन करती हैं. वास्तव में इस तरह वह अपने वोट बैंक को साधने के लिए छोटे-छोटे राजनीतिक समूहों को आगे बढ़ा रही हैं.

खुद ही देखें कि आरक्षण की राजनीति ने हमारे शिक्षा तंत्र को कहां-से-कहां पहुंचा दिया है. यहां तक कि कांग्रेस को अर्जुन सिंह से पल्ला छुड़ाना पड़ा. जनता उस शख्स (अर्जुन सिंह) से नाराज थी, जिसने अपना आधार मजबूत करने के लिए शिक्षा व्यवस्था का राजनीतिकरण किया और इस प्रक्रिया में ऐसे हजारों युवाओं के सपनों पर कुठाराघात किया, जो मानते थे कि नए भारत में बेहतर करने के लिए योग्यता ही काफी है.

वीपी सिंह अपना गढ़ मजबूत करने के लिए देश को बांटते हुए पहले ही मंडल कमीशन का इस्तेमाल कर चुके थे. उनसे द्वेष रखने वाली कांग्रेस ने उन्हीं के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए जातिवाद की राजनीति को स्थायी बना दिया. आज लोग सिर्फ अपनी जाति के आधार पर ही आरक्षण नहीं मांग रहे हैं, बल्कि अपने मत, धर्म, लिंग के आधार पर भी इसकी मांग कर रहे हैं. ऐसे लोगों को विशेष लाभ देने के लिए सरकार को ब्लैकमेल करने का कोई भी कारण पर्याप्त है, जो चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सके.

आखिर में हम खुद अपनी जिंदगी पर भी निगाह डालें. हमारी कानून व्यवस्था का लगातार ऐसे लोगों द्वारा फायदा उठाया जा रहा है, जो इसके जरिए दूसरों को शर्मिदा करते हैं. पुलिस का भी यही हाल है. मीडिया भी ऐसा ही है और इसी तरह हमारे बाकी सभी संस्थान हैं. हम उन्हें खुलेआम खत्म होने दे रहे हैं.

मनमोहन सिंह के पिछले कार्यकाल के दौरान लेफ्ट ने उनके साथ जो किया, वह ब्लैकमेलिंग से कम नहीं था. अब देखिए कि ममता लेफ्ट के साथ क्या करती हैं. सत्ता में बैठे लोगों के पास दूसरों को ब्लैकमेल करने की क्षमता होती है.

इसके उलट जो लोग सत्ता में नहीं हैं, वे इन्हीं तरकीबों का इस्तेमाल सत्ता में बैठे लोगों पर लगाम कसने के लिए कर सकते हैं. हम इसे लोकतंत्र का नियंत्रण और संतुलन कहते हैं. त्रासदी यह है कि भारत को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है. हम अपनी एकजुट राष्ट्रीयता पर इतराते हैं, जबकि वास्तव में हम इसे तार-तार कर रहे हैं.

 

27.06.2009, 02.20 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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