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अरब औऱ फ्रांस का फर्क

बहस

 

अरब और फ्रांस का फर्क

राम पुनियानी



फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोज़ी ने बुरके के खिलाफ बयान देकर विश्वव्यापी बहस छेड़ दी है. उन्होंने कहा कि बुरका कतई धार्मिक प्रतीक नहीं है. वह तो दमन का प्रतीक है. उन्होंने यह भी कहा कि बुरके के लिए उनके देश में कोई जगह नहीं है.

फ्रांस में ही लगभग पांच वर्ष पहले, सिक्ख पगड़ी, यहूदी टोपी और सिर पर बांधे जाने वाले स्कार्फ सहित कई अन्य धार्मिक पहचान चिन्हों को स्कूलों में प्रतिबंधित कर दिया गया था. वहां कोई सरकारी कर्मचारी इन चिन्हों को सार्वजनिक स्थानों पर नहीं पहन सकता.

फ्रांस एक धर्मनिरपेक्ष देश है और वह इस तरह के प्रतिबंधों को धर्मनिरपेक्षता का हिस्सा मानता है. यही नीति तुर्की जैसे कुछ और देशों की भी है. इस बहस का एक और पहलू भी है. फ्रांस जिन देशों पर पूर्व में राज करता था, उन देशों से बड़ी संख्या में गरीब मुस्लिम फ्रांस आते हैं और वहां अमानवीय हालात में रहने के लिए मजबूर हैं. वे शहरों के गरीब इलाकों या दूरस्थ उपनगरों में आर्थिक तंगी में अपनी जिंदगी गुजारते हैं. कुछ वर्षों पहले, फ्रांस के परेशानहाल मुस्लिम युवकों ने जमकर हिंसा और तोड़फोड़ भी की थी. फ्रांस के मुस्लिम प्रवासियों और वहां के धनाढ़य वर्ग के बीच गहरी सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक खाई है.

इस विवाद से जो महत्वपूर्ण प्रश्न उभरकर सामने आता है, वह यह है कि आखिर धर्मनिरपेक्ष राज्य को किस तरह की नीतियां अपनाना चाहिए. एक रास्ता तो यह है कि सामाजिक बदलाव के जरिए समाज पर सामंती तत्वों का शिकंजा ढीला किया जाए और राज्य, सामाजिक व लैंगिक समानता लाने में समाज की मदद करे. इस रास्ते पर चलने से धीरे-धीरे लैंगिक भेदभाव के प्रतीक गायब हो जाएंगे. ऐसा होने में कई बार बहुत लंबा समय लगता है.

हमने देखा है कि किस तरह कई देशों के प्रजातंत्र बनने के दशकों बाद भी वहां सामंती परंपराएं जिंदा रहती हैं. इसमें भी कोई संदेह नहीं कि लैंगिक भेदभाव की कुछ परंपराओं को कानून के द्वारा हटाना भी आवश्यक हो जाता है. उदाहरणार्थ, भारत में सती प्रथा को अंग्रेजों के शासनकाल में कानून द्वारा प्रतिबंधित किया गया था.

कुरान, मुस्लिम स्त्रियों से अनिवार्य रूप से बुरका पहनने के लिए नहीं कहता. कुरान में जोर शिष्ट पहनावे पर है. इस्लाम के पहले की दुनिया में भी महिलाओं के पहनावे पर तरह-तरह के नियम-कानून लादे जाते थे. उनके सम्मान की रक्षा के नाम पर लादे वाले जाने वाले इन नियम-कानूनों का असली उद्देश्य उन पर नियंत्रण रखना रहता था. जानी-मानी इस्लामिक विद्वान डॉ ज़ीनत शौकत अली के अनुसार, इस्लाम के आने के पहले भी इराक, मेसोपोटामिया और दुनिया के कई अन्य भागों में महिलाओं को पर्दा करना पड़ता था और पुरूषों से अलग-थलग रहना पड़ता था.

जितना अधिक मुसलमान स्वयं को असुरक्षित महसूस करते हैं, उतना ही उन पर कठमुल्लों का प्रभाव बढ़ता है और इसके साथ ही बढ़ता है बुरके का प्रचलन.


सामंती दौर में धर्म के नाम पर समाज पर पितृसत्तात्मक मूल्य थोपे जाते थे. इन पितृसत्तात्मक मूल्यों के प्रतीकों को अलग-अलग संस्कृतियों और समाजों में महिलाओं पर जबरन लादा जाता था. जो समाज जितना अधिक पितृसत्तात्मक होता था और सामाजिक मामलों में पुरोहित वर्ग का जितना अधिक हस्तक्षेप रहता था, उस समाज में महिलाओं को उतने ही अधिक भेदभाव का सामना करना पड़ता था.

भारत में महिलाओं को घूंघट के भीतर रहने के लिए मजबूर किया जाता था. मुसलमानों में बुरका प्रचलन में था और कई अन्य संस्कृतियों में महिलाएं सिर पर स्कार्फ बांधे बगैर घर से बाहर नहीं निकल सकती थीं.

बीसवीं सदी की शुरूआत से महिलाओं की सामाजिक हैसियत बेहतर होनी शुरू हुई और वे धीरे-धीरे घर से बाहर निकलने लगीं. सन् 1980 के दशक तक कई मुस्लिम देशों में बुरके का प्रचलन बहुत कम हो गया था. कई मामलों में तो बुरका गायब ही हो गया था. आतंकवाद के खिलाफ ‘वैश्विक युद्ध’ ने पूरी दुनिया में और साम्प्रदायिक हिंसा के नए दौर ने भारत में इस प्रक्रिया को न केवल रोक दिया बल्कि उसकी दिशा भी बदल दी.

आतंकवाद के खिलाफ कथित लड़ाई ने पूरी दुनिया के मुसलमानों में डर और गुस्से का भाव पैदा किया और नतीजे में कठमुल्लों और दकियानूसी विचारों वाले धार्मिक नेताओं का समाज में बोलबाला बढ़ गया. तालिबान जैसे कई कट्टर संगठन अस्तित्व में आ गए जो बेसिर-पैर के फतवे और आदेश जारी करने लगे. तालिबान ने अपने आदेशों को अत्यंत क्रूरतापूर्ण और अमानवीय तरीके से लागू किया. असुरक्षा की भावना व अफगानिस्तान और इराक पर हमले ने मुस्लिम समुदाय के कट्टरपंथी तबके के हाथ मजबूत किए. यही वह तबका है जो महिलाओं पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगाता है. इस सबके बावजूद कई देशों में बुरके का प्रचलन कम होता गया, विशेषकर उन देशों में जहां महिलाओं को सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा प्राप्त थी.

अगर हम पूरी दुनिया पर नजर दौड़ाएं तो हम पाएंगे कि बुरके के इस्तेमाल के मामले में बहुत विविधताएं हैं. परंतु मोटे तौर पर हम यह कह सकते हैं कि जितना अधिक मुसलमान स्वयं को असुरक्षित महसूस करते हैं, उतना ही उन पर कठमुल्लों का प्रभाव बढ़ता है और इसके साथ ही बढ़ता है बुरके का प्रचलन.

भारत में भी अलग-अलग क्षेत्रों में बुरके का कम-ज्यादा प्रचलन है. केरल में बुरका बहुत कम दिखलाई पड़ता था और कश्मीर में तो बुरका था ही नहीं. केरल में 1980 के दशक से शुरू हुई साम्प्रदायिक हिंसा के साथ बुरके का उपयोग बढ़ने लगा. इसका एक कारण केरल से बड़े पैमाने पर मुस्लिम युवकों का खाड़ी देशों में काम करने जाना भी था. खाड़ी के देशों में वे लोग वहाबी इस्लाम से प्रभावित हुए.

कश्मीर में 1990 के बाद से अतिवाद के उदय और कश्मीर मुद्दे के साम्प्रदायिकीकरण के कारण कट्टरपंथियों का प्रभाव बढ़ने लगा और उन्होंने महिलाओं पर पर्दा लादने की कोशिश की. सौभाग्यवश, कश्मीर की महिलाओं ने इस कोशिश का भरसक विरोध किया परंतु फिर भी कश्मीर में बुरके का प्रचलन बढ़ा है.

किसी भी देश के समाज और वहां के निवासियों की सोच, वहां की सामाजिक-राजनैतिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है. महिलाओं पर कौन से प्रतिबंध लगाए जाएं और कौन से नहीं, इसका निर्णय अक्सर पुरूष करते हैं और सामाजिक दबाव के चलते महिलाएं इन प्रतिबंधों को न केवल स्वीकार कर लेती हैं वरन् कभी-कभी उन्हें उचित और सही भी मानने लगती हैं. सूफी इस्लाम ने कभी बुरके को प्रोत्साहन नहीं दिया.

किसी भी देश की सरकार को दो बातों का ख्याल रखना चाहिए. पहली यह कि स्वतंत्रता, प्रजातंत्र के मूल में है. सऊदी अरब में बुरका अनिवार्य है. फ्रांस, सरकारी आदेश के द्वारा बुरके को प्रतिबंधित करना चाहता है. दोनों में क्या फर्क है?

दूसरी यह कि आज यह आवश्यक हो गया है कि विश्व के स्तर पर और हर देश में भी अल्पसंख्यकों में सुरक्षा और विश्वास का भाव जगाया जाए. उन्हें यदि समान अवसर प्राप्त होंगे तो धार्मिक पहचान से जुड़े हुए विवाद अपने आप खत्म हो जाएंगे. मुसलमान चूंकि स्वयं को असुरक्षित पाते हैं और उन्हें आगे बढ़ने के वाजिब और पर्याप्त अवसर उपलब्ध नहीं हो पाते हैं, इसलिए वे अपनी अलग पहचान पर जोर देते हैं. सामाजिक यथार्थ को बदले बगैर धार्मिक पहचान के चिन्हों को प्रतिबंधित करना खोखली और अदूरदर्शी नीति है. इससे समस्या घटने के बजाए बढ़ेगी.

 

05.07.2009, 01.20 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Zaheera Begum (zairtc@yahoo.com)

 
 Everything is quoted without context...its clearly mentioned in quran to dress modestly both for men and women.....if somebody dont want to go by the scriptues they can act their own way dont try to impose wrong thoughts 
   
 

gulzar hussain (gulzar.mahanagar@yahoo.co.in) mumbai

 
 मैं पुनियानी जी के आलेख हमेशा पढ़ता हूं. इस बार उन्होंने बहुत अच्छा लिखा है. नई पीढ़ी अब धार्मिकता के प्रभाव से छुटकारा पाना चाहती है. धन्यवाद. 
   
 

नदीम अख्तर (nadeemjagran@gmail.com) रांची, झारखंड

 
 बहुत ही अच्छा लेख लिखा है पुनियानी साहब ने। मुझे ऐसा लगता है कि फोर्सफुल डिसीज़न हर मामले में गलत है। लेकिन जहां मर्यादा का उल्लंघन होने लगे, वहां आपको फोर्सफुल डिसीज़न लेना पड़ेगा। ऐसा नहीं कि बुर्का को बैन करो और नग्नता को छूट दे रखो। नग्नता से तो विकार ही आयेगा न। एक दायरा जरूर हो कि कौन कितने और कैसे कपड़े पहने, जिससे सामाजिक तानाबाना बरकरार रहे। 
   
 

anand (anand.appolo@gmail.com) delhi,bihar

 
 राम पुनियानी जी ने काफी समग्र रूप से चीजों को पेश कतिया है. सबसे बड़ी बात ये कि इसमें प्राब्लम को हिस्टरी से रिलेट किया है, भारत की हालत जान कर अच्छा लगा. अंतिम रिजल्ट काफी बेहतर है. धन्यवाद 
   
 

Mohd Zulmaariz Delhi

 
 I really liked the thought. I appreciate the writer for writing such a wonderful article. I can feel the same thing at my home also. I can see the muslims of India moving towards Burqa more aggressively and its against the women freedom rights 
   

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