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हवा हवाई महाराजा

बात पते की

 

हवा हवाई महाराजा

प्रीतीश नंदी



मैं कोई चीर-फाड़ करने वाला ऑडिटर नहीं हूं, इसलिए यह बताने की धृष्टता नहीं कर सकता कि एअर इंडिया की वित्त व्यवस्था के साथ क्या गड़बड़ियां हैं, लेकिन एक मुसाफिर के तौर पर मैं यह जरूर दावे से कह सकता हूं कि हमारी राष्ट्रीय एअरलाइन किस बीमारी से ग्रसित है. और यह बात मेरी तरह एअर इंडिया में अक्सर सफर करने वाले उस प्रत्येक व्यक्ति के लिए भी बिलकुल शीशे की तरह साफ है जो इससे प्यार करता है. आखिर यह वही एअरलाइन है, जिसके साथ हम बड़े हुए हैं.

सबसे पहले तो हमें यह स्वीकार करना ही होगा कि एअर इंडिया लंबे अरसे से कस्टमर फ्रेंडली नहीं रही है. आज यह ऐसी एअरलाइन है जो अपनी ट्रेड यूनियनों और अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने में ही ज्यादा व्यस्त है, जिन्होंने इसे पिछले सालों में जमीन पर ला पटका है. यह उनके हितों को साधने में ही लगी रहती है. मौजूदा संकट को लेकर इसके मंत्री ने पहली बात यही कही कि किसी भी कर्मचारी को अपनी नौकरी से हाथ नहीं धोना पड़ेगा.

मैं मानता हूं कि यह अच्छा विचार है, लेकिन जब कंपनियां गंभीर संकट में हों (जिस तरह फिलहाल एअर इंडिया है) तो सभी विकल्पों को खुला रखने में कोई हर्ज नहीं है. किसी भी विकल्प को इसके क्रियान्वयन के प्रभावों का आकलन किए बगैर खारिज नहीं किया जा सकता.

नौकरियों में छंटनी का विचार बिलकुल सीधा है - यदि आप 30 फीसदी लोगों को हटाकर 70 फीसदी लोगों की नौकरियां बचा सकते हैं तो यह बुरा विकल्प नहीं है, बशर्ते 30 फीसदी छंटनी किसी डर या पक्षपात के बगैर शुद्ध रूप से इस आधार पर हो कि एअरलाइन के लिए क्या बेहतर है. यह बात एअर इंडिया के 43 कार्यकारी निदेशकों के संदर्भ में भी लागू होनी चाहिए.

नौकरियों में छंटनी से लागत ही कम नहीं होती, इससे संस्थान को नए सिरे से व्यवस्थित करने में भी मदद मिलती है. प्रत्येक फर्म, खासकर एअर इंडिया जैसी सरकारी स्वामित्व वाली बड़ी संस्था में ऐसे कई नाकारा लोग होते हैं जिन पर तब तक कोई ध्यान नहीं देता, जब तक कि सब कुछ ठीकठाक चल रहा होता है. जब बाजार ध्वस्त होता है तो फिर नाकारा लोगों से पल्ला छुड़ाने के अलावा और कोई चारा नहीं रह जाता है, ताकि उनकी जगह नई प्रतिभा आएं और फर्म में नई ऊर्जा का संचार करें.

यदि नवीनीकरण की यह प्रक्रिया नहीं हो तो संस्थानों को मरने में समय नहीं लगता है. किसी ऐसी संसद की कल्पना करें जहां हर किसी की सीट सुरक्षित हो और उनके वेतन और अन्य सुविधाओं में बढ़ोतरी होती रहे. जो कंपनियां अपने कर्मचारियों के बारे में समय-समय पर समीक्षा करने और ऐसी समीक्षाओं के आधार पर सख्त फैसले लेने से डरती हैं, वे अपनी अक्षमता के अलावा और भी कुछ छिपा रही होती हैं.

जब एअर इंडिया जैसे किसी संस्थान को भारी घाटा होता है तो उसे अपनी समस्त संपत्तियों और परिचाल लागत पर नए सिरे से गौर करना पड़ता है. यह सड़क के किसी कोने में खड़ा होकर और हाथ में टोपी लेकर भीख नहीं मांग सकता. इसे आत्मसम्मान बरकरार रखते हुए अपने भीतर मौजूद समाधानों की तलाश करनी चाहिए. एअर इंडिया के बारे में दो बातें साफ नजर आती हैं.

मुझे बिलकुल नहीं लगता कि किंगफिशर या जेट जैसी कोई भी निजी एअरलाइन एयर इंडिया के लिए कोई गंभीर खतरा पेश कर सकती हैं. इसे खुद अपने भीतर से ही खतरा है.


पहली, यहां हर स्तर पर भारी-भरकम वेतन हैं जो अक्सर उत्पादकता से जुड़े इंसेटिव के नाम पर दिए जाते हैं. दूसरी, इसकी महाराजा जैसी लाइफ स्टाइल जो इस एअरलाइन में सफर करने वाले किसी भी शख्स को बेहद नागवार गुजरती है. मिसाल के तौर पर मेरे जैसे एक बिजनेस क्लास पैसेंजर को एअर इंडिया में यह देखकर बेहद कोफ्त होती है कि इसका टेक्नीकल स्टाफ विमान के समूचे फस्र्ट क्लास पर कब्जा कर उस पर इस तरह आराम फरमाए, जैसे यह उन्हीं की मिल्कियत हो.

सवाल यह है कि आखिर इसका विकल्प क्या है? संस्थान थोड़ा संयम बरते और इसके स्टाफ के लिए भी थोड़ी ज्यादा संयमित जीवनशैली हो. आज के समय में यही ज्यादा दूरदर्शी और सम्मानजनक कदम लग सकता है. कभी-कभार यात्रियों को उच्च स्तर की खाली पड़ी सीटों पर बैठाया जा सकता है, जैसा कि दूसरी एअरलाइंस अपने यात्रियों के साथ करती हैं, ताकि वे खुद को खास महसूस करें.

इससे ग्राहकों की संतुष्टि का स्तर बढ़ेगा, लेकिन इसके लिए उसे अंदरूनी स्टाफ की मांगों को संतुष्ट करना छोड़ना होगा जो फिलहाल एयर इंडिया की प्राथमिकता लगती है.

एक और विकल्प संपत्तियों में कमी करना भी हो सकता है. इसके लिए परिचालन संपत्तियों में कटौती करने की जरूरत नहीं है, जैसा कि प्रबंधन लीज पर लिए गए 45 विमानों को वापस करना चाहता है. लीज की उच्च निकासी लागत को देखते हुए यह कोई अच्छा विचार तो नहीं हो सकता. अपने कर्मियों पर भारी-भरकम खर्चे के मद्देनजर एअर इंडिया को 100 से भी कम विमानों के साथ उड़ते देखना बेहद दुखदायी होगा.

इन कर्मियों में तकरीबन 1000 कैंटीन कर्मी और ठेके पर काम करने वाले हजारों और लोग शामिल हैं. मैं यहां नरीमन प्वाइंट पर स्थित विशाल इमारत और इसके अधिकारियों की खातिर लिए गए आवास जैसी गैर-उत्पादक संपत्तियों की बात कर रहा हूं. मंदी के इस दौर में इस रीयल एस्टेट को बेचने से भी एयर इंडिया को मौजूदा नकदी संकट से बाहर निकलने के लिए पर्याप्त संसाधन मिल सकते हैं.

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एक बार ऐसा होने और एअरलाइन की स्थिति थोड़ी संवरने के बाद जब यह थोड़ी ज्यादा कस्टमर फ्रेंडली, चुस्त-दुरुस्त और संयमित दिखने लगे, तो ऐसी स्थिति में नए निवेशकों को आमंत्रित किया जा सकता है. एअर इंडिया पर स्वामित्व रखने के लिए सरकार को इसके सारे स्टॉक को अपने पास रखना जरूरी नहीं है. इसे इतना स्टॉक चाहिए जिससे इसका इस पर नियंत्रण बरकरार रहे और यह इसकी इक्विटी के बड़े हिस्से को बेचने के बाद भी हो सकता है.

इससे कारोबार को बढ़ाने के लिए नए सिरे से नकदी आएगी, साथ ही साथ जवाबदेही भी बढ़ेगी. एअर इंडिया में एक के बाद एक चेयरमैन आए और गए, लेकिन हर कोई इसकी संस्थागत काहिली और बाजार की नई परिस्थितियों के हिसाब से चलने के प्रति स्टाफ की अनिच्छा के आगे हार गया.

अब एक बार फिर नए व्यक्ति के हाथों में कमान है. हो सकता है कि उसे आत्मघाती राह पर चलने के बजाय कड़े फैसले लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाए. मुझे बिलकुल नहीं लगता कि किंगफिशर या जेट जैसी कोई भी निजी एअरलाइन एयर इंडिया के लिए कोई गंभीर खतरा पेश कर सकती हैं, जैसा कि कुछ विश्लेषकों की राय है. इसे खुद अपने भीतर से ही खतरा है. इसे उबारने का काम आसान भले न हो, लेकिन जो कोई भी इसे दुरुस्त तरीके से कर सकेगा, उसका नाम कारपोरेट के इतिहास में अमर हो जाएगा. अब यह क्या कोई कम बड़ा इंसेटिव होगा?

09.07.2009, 18.19 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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Abhijeet Sen (abhijeet4288@rediffmail.com) Raigarh

 
 Corporate management will be successful when it will be done with great transparency,wider vision for future as well as most comprehensive studies of globule market.  
   

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