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मनमोहन सिंह ने रखी नई भारत-पाकिस्तान रिश्तों की नींव

विचार

 

भारत-पाक रिश्तों की नई नींव

संदीप पांडे

 

जिस बात की हममें से कई लोगों को आशंका थी वह सच साबित हो रही है. पाकिस्तान के अंदर आम लोगों, राजनीतिज्ञों व मीडिया में यह बात प्रचारित है कि भारतीय खुफिया संस्था रिसर्च एण्ड एनालिसिस विंग या संक्षेप में जो 'RAW' के नाम से जानी जाती है पाकिस्तान के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप करती है. पहले सिंध प्रांत, खासकर करांची में इस हस्तक्षेप के बारे में बात होती थी. अब लोग कहते हैं कि बलूचिस्तान प्रांत में तो भारत की दखलंदाजी जग-जाहिर है और ऐसी भी आशंका व्यक्त की जा रही है कि उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में तहरीक-ए-तालिबान के नेता बैतुल्लाह मेहसूद को भी भारत का समर्थन मिल रहा हो.

 

अफगानिस्तान में भारत द्वारा सामान्य से कहीं अधिक संख्या में कई शहरों, खासकर पाकिस्तान की सीमा के निकट, उप-दूतावास खोलने पर चिंता व्यक्त की जा रही है. अफ-पाक इलाके में सी.आई.ए. व मोसाद, क्रमश: अमरीकी एवं इजराइली खुफिया संस्थाओं, की दखलंदाजी से भी इंकार नहीं किया जा सकता. लम्बे समय से हो रहे अमरीकी ड्रोन हवाई हमलों के बावजूद बैतुल्लाह मेहसूद का अभी तक बच पाना इस अफवाह को बल देता है कि किसी एक या एक से अधिक देशों की सेना और/अथवा खुफिया संस्था का समर्थन उसे प्राप्त हो.

असिफ अली जरदारी ने अब इस बात को खुल कर स्वीकारा है कि तालिबान को पैदा तो पाकिस्तान ने ही किया था. जिस आतंकवाद का पाकिस्तान पहले निर्यात करता था वही अब उसके लिए अंदरूनी मुसीबत खड़ी कर रहा है. जब तक यह उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत तक सीमित था तब तक तो इसे बड़ी समस्या के रूप में नहीं देखा गया. लेकिन जब जेहादियों ने इस्लामाबाद, रावलपिंडी व लाहौर को निशाना बनाना शुरू किया तो पाकिस्तानी सेना व खुफिया संस्था ने, जो अपने ही द्वारा प्रशिक्षित किए गए जेहादियों से पहले कतई लड़ने को तैयार नहीं थे, कुछ अमरीकी दबाव में तथा ज्यादा अपने लिए खतरा बनने के कारण अब जा कर, उनके खिलाफ कार्यवाही शुरू की है. जब जरदारी इस तरह का स्पष्ट स्वाकारोक्ति वाला बयान देते हैं तो जाहिर है कि सेना व आई. एस. आई. का समर्थन उन्हें प्राप्त है.

पाकिस्तान में जितने आतंकवादी संगठन हैं, चाहे वह अल-कायदा हो या लश्कर-ए-तोएबा या फिर तालिबान, उन्हें अमरीकी एवं पाकितानी सरकारों ने ही खड़ा किया है. उन्हें हथियार, पैसा व प्रशिक्षण बकायदा पेशेवर सरकारी लोगों से प्राप्त हुआ है. सैनिक शासन के दौरान तो पाकिस्तानी सरकार व जेहादियों में रिश्ते इतने प्रगाढ़ थे कि कई सेवा निवृत सैनिक आतंकवादी संगठनों का हिस्सा बन गए व आतंकवादियों ने सरकारी व्यवस्था में घुसपैठ कर ली. यदि पाकिस्तान में पंजाब प्रांत की सरकार या केन्द्रीय सरकार हाफिज सईद के खिलाफ कोई कार्यवाही करने से कतरा रही हैं तो उसकी एक वजह यह भी है कि हाफिज सईद कई ऐसी बातें उजागर कर सकते हैं जो पाकिस्तानी सरकार के लिए मुसीबत खड़ी कर सकती हैं.

किन्तु महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि अब जबकि पाकिस्तानी सरकार ने आतंकवादियों से लड़ने का मन बना लिया है तथा अमरीका लगातार पाकिस्तान जैसे स्वायत्त राष्ट्र की सीमा में घुस कर ड्रोन हवाई हमले कर रहा है आतंकवादी अभी तक मोर्चा कैसे जारी रखे हुए हैं? पाकिस्तान व अमरीका ने जिन जेहादियों को रूस के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार किया होगा वे तो अब नहीं लड़ रहे होंगे. यदि यह भी मान लिया जाए कि सऊदी अरब या अन्यत्र स्रोतों से अथवा नशीली दवाओं के व्यापार का पैसा प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो और मध्य एशिया, पाकिस्तान के दक्षिण पंजाब या दुनिया भर से युवा जेहाद में शामिल होने के लिए आ रहे हों तो भी सवाल उठता है कि इनको आधुनिक युद्ध कला-कौशल का प्रशिक्षण कौन दे रहा है? क्या सी. आई. ए. दोहरा खेल खेल रही है?

 

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इस इलाके में शान्ति स्थापित हो जाने के बाद यहां अमरीकी सेना की उपस्थिति को जायज ठहराना अमरीका के लिए मुश्किल हो जाएगा. यह बात तो साफ है कि अमरीका अफ-पाक इलाके में ही नहीं बल्कि कश्मीर में भी अपनी दखलंदाजी रखना चाहता है. हम लोग जार्ज बुश के अमरीका की बात नहीं कर रहे. हम लोग बराक ओबामा की बात कर रहे हैं जिसने चुनाव जीतने से पहले ही ऐलान कर दिया था कि वह कश्मीर मामलों के लिए एक सलाहकार नियुक्त करेंगे. आखिर एक नव-निर्वाचित अमरीकी राष्ट्रपति को अपने देश से ज्यादा कश्मीर की चिंता क्यों होती है?

कई मध्यम वर्गीय पढ़े-लिखे आत्म-स्वाभिमानी भारतीयों, जिन्होंने हमेशा भारत को एक शांतिपूर्ण देश एवं पाकिस्तान को ही समस्या की जड़ माना है, के गले के नीचे यह बात नहीं उतरेगी कि भारत भी पाकिस्तान के अंदर अस्थिरता पैदा करने की कोशिश करता रहा है. शर्म-अल-शेख़ से जो संयुक्त वक्तव्य जारी हुआ है उसमें बलूचिस्तान का जिक्र है. इसे पाकिस्तान में एक कूटनीतिक सफलता माना जा रहा है. भारत में कट्टरपंथी राष्ट्रवादी परेशान हैं. परन्तु प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने यह कहते हुए कि वे पाकिस्तान के साथ किसी भी मुद्दे पर बातचीत के लिए तैयार हैं अति साहस एवं समझदारी का परिचय दिया है.

 

उन्होंने पाकिस्तान को इस बात के लिए भी प्रेरित किया है कि वह 26 नवम्बर, 2008, के मुम्बई हादसे के दोषियों के खिलाफ कार्यवाही करने की बात को समग्र बातचीत दोबारा शुरू करने की प्रक्रिया से अलग करके देखे. इससे पाकिस्तान के ऊपर आंतरिक दबाव हल्का हो जाता है तथा वह ज्यादा ईमानदारी से मुम्बई कांड के दोषियों के खिलाफ कार्यवाही करेगा. लोकतंत्र का ज्यादा अनुभव रखने की दृष्टि से वरिष्ठ एवं ज्यादा बड़े देश होने के कारण यह मनमोहन सिंह से ही अपेक्षा की जा सकती थी कि वे दरियादिली दिखाएं. वे इस अपेक्षा पर खरे उतरे हैं. उन्होंने उस संर्कीण नजरिए से बाहर निकलने की कोशिश की है जिसकी वजह से अधिकारिक स्तर पर भारत-पाकिस्तान रिश्तों में सुधार की प्रक्रिया बाधित होती रही है.

मनमोहन सिंह ने तो सिर्फ उस बात को स्वीकारा है जो पाकिस्तान में आम जानकारी है. किन्तु पाकिस्तान को रॉ के बलूचिस्तान या अन्य स्थानों पर हस्तक्षेप के प्रमाण प्रस्तुत करने पड़ेंगे जिस तरह से भारत ने मुम्बई कांड में किया है. किन्तु यह बहुत बड़ी बात नहीं है. रॉ और आई. एस. आई. एक दसरे के मुल्कों में अस्थिरता पैदा करने में लगी हुई हैं यह अब एक खुला भेद है.

मनमोहन सिंह ने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए भारत-पाकिस्तान सम्बन्धों को पुनर्परिभाषित करने की जमीन तैयार की है. दोनों मुल्कों के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है कि दोनों देश शायद एक दूसरे का सहयोंग करते हुए काम करें. अमरीका ने भारत से पाकिस्तान की मदद करने का आह्वान करते हुए इस बात के संकेत दिए हैं. और ऐसा हो भी क्यों नहीं सकता? जब भारत पाकिस्तान को लांघ कर अफगानिस्तान की मदद कर सकता है, जिसमें आर्थिक मदद भी शामिल है, तथा पाकिस्तान आधी दुनिया लांघ कर अमरीका से मदद मांगने जाता है तो भारत पाकिस्तान, यदि अपने ऐतिहासिक पूर्वाग्रह छोड़ दें, मिल कर क्यों नहीं काम कर सकते?

 

पाकिस्तान जिसके लिए अमरीका से आर्थिक मदद लेना तो उसकी राष्ट्रीय नीति का हिस्सा हो गया है, भारत के साथ एक ज्यादा लोकतांत्रिक रिश्ता रख सकता है. क्या हम इसकी कल्पना कर सकते हैं कि रॉ व आई. एस. आई., जिस तरह सी. आई. ए. के साथ काम करती हैं, मिल कर दक्षिण एशिया से आतंकवाद का सफाया करें? पाकिस्तान, चूंकि दोनों में छोटा एवं ज्यादा असुरक्षित मुल्क है भारत के साथ मित्रता के बारे में तभी सोच सकता है जब उसे भारत के साथ सहजता महसूस होगी. दोनों देशों की लम्बी दुश्मनी की वजह से आपसी विश्वास का अभाव है. मनमोहन सिंह ने यूसुफ रजा गिलानी एवं पाकिस्तान को यह एहसास कराया है कि वे भारत पर भरोसा कर सकते हैं.

 

* यह लेख इसी महीने की पाकिस्तान यात्रा के बाद लिखा गया है.

 

29.07.2009, 19.07 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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