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मकोका, मालेगांव और साध्वी

विचार

 

मकोका, मालेगांव और साध्वी

राम पुनियानी

 

मालेगांव बम धमाकों के ग्यारह आरोपियों के खिलाफ मकोका नहीं लगेगा. इस मामले पर विचारण कर रही विशेष मकोका अदालत का कहना है कि पुलिस यह साबित करने में असफल रही है कि सभी आरोपी किसी एक संगठित आपराधिक गिरोह के सदस्य हैं. यह निर्णय 1 अगस्त को घोषित किया गया.

मकोका लगाने के लिए यह भी यह आवश्यक है कि आरोपियों में से कम से कम एक के खिलाफ किसी न किसी न्यायलय में पूर्व से ही दो आरोप पत्र दाखिल किए गए हों. चूंकि पुलिस यह आवश्यक शर्त भी पूरी नहीं कर सकी इसलिए मकोका के अंतर्गत आरोपियों पर मुकदमा चलाया जाना संभव नहीं होगा.

महाराष्ट्र पुलिस के आतंकवाद निरोधक दस्ते और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने यह घोषणा की है कि मकोका अदालत के निर्णय को उच्च न्यायलय में चुनौती दी जाएगी. इस घोषणा को अमल में लाया जाएगा या नहीं, यह कहना मुश्किल है क्योंकि पूर्व में भी कांग्रेस सरकार ने दोषियों को सजा दिलवाने के लिए गंभीरतापूर्वक प्रयास नहीं किए थे.

मकोका के हटाए जाने के निर्णय से आरोपियों को राहत मिली है. वैसे भी, पुलिस जांच में कई कमियां हैं और यदि अभियोजन पक्ष पर्याप्त मेहनत नहीं करेगा तो आरोपी सामान्य न्यायालय से भी बच निकलेगें. इस मामले के राजनैतिक पहलू भी हैं.

कुछ समय पहले तक, हर बम धमाके की जांच यह मानकर की जाती थी कि उसके पीछे मुसलमान आतंकी हैं. इस पूर्वाग्रह के दो नतीजे होते थे. पहला यह कि निर्दोष मुस्लिम युवक पकडे जाते थे और पुलिस के हाथों यंत्रणा पाते थे. दूसरा यह कि असली अपराधी इसलिए बच निकलते थे क्योंकि आतंकवाद के बारे में आम जनता एक गलत धारणा बना बैठी थी.

इस कुचक्र को स्वर्गीय श्री हेमन्त करकरे ने तोड़ा जब उन्होंने यह साबित कर दिया कि मालेगांव बम धमाकों में इस्तेमाल की गई मोटरसाईकिल साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की थी. इस सुराग के जरिए पुलिस कई लोगों और संगठनों तक पहुंची. इनमें शामिल थे स्वामी दयानंद पाण्डे, ले. कर्नल प्रसाद पुरोहित, सेवानिवृत्त मेजर रमेश उपाध्याय, राकेश धावड़े, अजय राहीरार व अन्य कई. षड़यंत्रकारियों के अभिनव भारत, हिंदू जागरण समिति, भोंसले मिलिट्री स्कूल (नागपुर एवं नासिक), सिंहगढ के आकांक्षा रिसोर्ट व कई सैनिक ठिकानों से सम्पर्कों का पता चला और धीरे-धीरे पूरा षडयंत्र सामने आ गया.

श्री हेमन्त करकरे मुंबई पर 26/11 के आतंकी हमले में मारे गए. उनकी हत्या के बारे में श्री ए. आर. अंतुले ने कई संदेह जाहिर किए थे. मालेगांव धमाकों की जांच के दौरान श्री करकरे पर हिंदू दक्षिणपंथी संगठनों का भारी दबाव था. बाल ठाकरे के अखबार सामना ने लिखा था कि वे करकरे जैसे राष्ट्र विरोधी के मुंह पर थूंकते हैं. कुछ अखबारों ने उन्हें देशद्रोही करार दिया था.

हम नहीं जानते कि करकरे के साथ जो कुछ हुआ उसका दायर किए गए आरोप पत्र को तैयार करने पर क्या प्रभाव पडा. सुश्री तीस्ता सीतलवाड ने कम्यूनलिज्म कोम्बेट के फरवरी 2009 के अंक में आरोप पत्र के बारे में कई गंभीर प्रश्न उठाए हैं, जो अब तक अनुत्तरित हैं.

हम सब को यह याद है कि अप्रैल 2006 में नांदेड़ में हुए धमाकों की जांच बहुत मंथर गति से चल रही थी और यदि मानवाधिकार कार्यकर्ता दबाव नहीं बनाते तो यह जांच कभी किसी नतीजे पर नहीं पहुंचती. मालेगांव धमाकों के एक आरोपी, राकेश धावडे ने यह स्वीकार किया है कि वह कुछ युवकों को बम बनाने और विस्फोट करने का प्रशिक्षण देने में शामिल था.

मकोका के प्रावधान न केवल जरूरत से ज्यादा कड़े हैं वरन् वह एक प्रजातांत्रिक, उदारवादी मूल्यों में विश्वास करने वाले देश के लिए उपयुक्त कानून नहीं है.


यह प्रशिक्षण पुणे के सिंहगढ किले के नजदीक एक स्थान पर जुलाई-अगस्त, 2003 में दिया गया था. इसके बावजूद पुलिस ने उसे जुलाई 2009 में पुरबिया मस्जिद धमाके के मामले में बरी हो जाने दिया. आतंकवाद निरोधक दस्ते का कहना है कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि स्थानीय पुलिस ने मजबूत आरोप पत्र तैयार नहीं किया. यह केवल समन्वय की कमी की वजह से हुआ या फिर उसके पीछे कोई और कारण था, यह नहीं कहा जा सकता.

यह समझ से परे है कि मालेगांव बम धमाकों के आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 125 (राज्य के विरुध्द युध्द करना) क्यों नहीं लगाई जा रही है. इस मामले में सेना के वर्तमान और पूर्व अधिकारियों की भूमिका की भी पर्याप्त जांच नहीं की गई. सैन्य अधिकारियों का हमले में शामिल होना अत्यंत गंभीर मसला है. ये सभी अधिकारी भोंसले मिलिट्री स्कूल के छात्र रहे थे. इस स्कूल का नियंत्रण आरएसएस के हाथों में है.

आरएसएस में पूर्व सैनिकों का एक अलग प्रकोष्ठ है और इसके सदस्यों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे कार्यरत सैन्य अधिकारियों से सतत सम्पर्क और संबंध बनाए रखें. पुरोहित द्वारा साठ किलो आरडीएक्स को सफलतापूर्वक चोरी कर लेना इस बात को दर्शाता है कि किसी राजनैतिक विचारधारा विशेष से प्रभावित पूर्व और कार्यरत सैन्य अधिकारी क्या-क्या कर सकते हैं. अपने नारको टेस्ट के दौरान पुरोहित ने यह खुलासा किया कि वो समझौता एक्सप्रेस में हुए धमाकों में शामिल था और शायद मक्का मस्जिद के धमाके में भी उसकी कुछ भूमिका थी.

इस मामले के कई पहलू हैं. मकोका के प्रावधान न केवल जरूरत से ज्यादा कड़े हैं वरन् वह एक प्रजातांत्रिक, उदारवादी मूल्यों में विश्वास करने वाले देश के लिए उपयुक्त कानून नहीं है. ऐसे कानूनों का एक नुकसान यह होता है कि पुलिस गहन जांच कर आरोपियों के खिलाफ सुबूत जुटाने की बजाए कानून के उन प्रावधानों का लाभ उठाने की कोशिश करती है जिनमें आरोपियों को संदेह का लाभ नहीं दिया जाता बल्कि उल्टे, उन्हें तब तक दोषी माना जाता है जब तक वे स्वयं को निर्दोष न सिध्द कर दें.

अगर हम नारको टेस्ट को विश्वसनीय न भी मानें तब भी मालेगांव बम धमाके के आरोपियों को उस आतंकी हमले से जोड़ने वाली कई कड़ियां मौजूद हैं. सवाल यह है कि उन कड़ियों को सिलसिलेवार जोड़ने के बजाए पुलिस और अभियोजन पक्ष मकोका के प्रावधानों और नारको टेस्ट पर निर्भर क्यों कर रहे हैं.

हमारे देश में राजनेताओं, नौकरशाहों और पुलिस ने ऐसी स्थिति बना दी है, मानो इस देश में दो न्याय व्यवस्थाएं हों. पहली है धनकुबेरों और प्रभावशाली लोगों के लिए जो कुछ भी कर कानून की नजर से बचे रहते हैं और दूसरी अल्पसंख्यकों सहित समाज के कमजोर वर्गों के लिए, जहां पुलिस जांच, आरोप पत्र और न्यायिक निर्णय-सभी पूर्वाग्रहों से प्रभावित रहते हैं.

इस तरह के निर्णयों से समाज के एक हिस्से को यह महसूस होता है कि उनका इस्तेमाल केवल वोट बैंक की तरह किया जाता है और उन्हें यह देश न्याय नहीं देता. अगर मालेगांव के आरोपियों के साथ इस आधार पर नरमी बरती जाती है कि उनकी हरकतें केवल बदला लेने की कार्यवाही थीं तो इससे बड़ा अन्याय कुछ नहीं हो सकता.

 

04.08.2009, 20.06 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

rohit pandey (aboutrohit@gmail.com) gorakhpur

 
 राम जी, लगता है आप 26/11 के समय किसी दूसरे ग्रह पर थे और अब भी वहीं हैं, वरना जब पूरा देश सरकारों से मुंबई के बाद आतंकवाद से निपटने के उपायों को जानना चाहता तब आपको मकोका कड़ा नज़र नहीं आया.

राम जी आप जनता की धारणाओं को पूर्वाग्रह बताते हैं. आपने आज तक मालेगांव के अलावा किस आतंकवादी घटना और आतंकवादियों के खिलाफ होंठ हिलाए हैं?
 
   
 

amal delhi

 
 आप की सोच इस वर्द विभाजन को लेकर तो सही है लेकिन रही बात साध्वी प्रज्ञा की, तो हमारे देश में साधु सन्यासियों को आज भी वही स्थान दिया जाता है जो सतयुग या त्रेतायुग में दिया जाता था. मेरा मानना है कि सच को आंच क्या...आखिर अंत में सत्य की विजय होती है और परिणाम सबके सामने है. 
   
 

Abhijeet Sen Raigarh

 
 Another greatepisode of the tale of two communities with good plot structure and script but not good for nation's health, bad for communal harmony,worse for nation growth and worst for futuristic approach towards life.
 
   
 

anwar suhail (anwarsuhail_09@yahoo.co.in) bijuri mp

 
 आखिर साध्वी पर charges prove नहीं ही हुए. क्या कर लिया हमने. सब दिखावा है. सोबराबुद्दीन को encounter करके मारा गया फिर उसके परिवार वालों को मुआवज़ा देने की घोषणा की गई. यही लोकतंत्र है. जय हो धर्मनिरपेक्षता की.  
   

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